फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

अब पछताये क्या होत, जब चिड़िया चुग गई खेत

अब पछताये क्या होत, जब चिड़िया चुग गई खेत
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June 28, 2021

अब पछताये क्या होत, जब चिड़िया चुग गई खेत


अपने कार्य के सिलसिले में मुझे अकसर कॉलेज के विद्यार्थियों से बातचीत करने का मौक़ा मिलता है। चाहे वह इंडक्शन प्रोग्राम के द्वारा हो या फिर कैम्पस इंटरव्यू या फिर कॉलेज द्वारा कराया गया सॉफ़्ट स्किल ड़ेवेलपमेंट प्रोग्राम। हर बार मैंने पाया है कि बहुत अच्छी शिक्षा लेने के बाद भी वे बाज़ार की ज़रूरतों के हिसाब से सीख नहीं पाते हैं। इसी समस्या के समाधान के रूप में आजकल कॉलेज बच्चों को हर सेमिस्टर में प्रोजेक्ट या इंटर्नशिप करने के लिए प्रेरित करते हैं।


मुंबई स्थित भारत के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में अध्ययनरत मेरी बिटिया दीक्षिता को भी उसके प्रोफ़ेसर द्वारा तीसरे सेमिस्टर से पूर्व 2-3 माह की इंटर्नशिप करने के लिए प्रेरित किया गया। बड़े जोश के साथ उसने कई कम्पनियों में आवेदन दिया। लेकिन उन कम्पनी में चर्चा के दौरान उसने पाया कि ज़्यादातर कम्पनियाँ इंटर्न को एक फ़्री या बहुत कम पैसे में मिले एक कर्मचारी के रूप में देखती है और उन्हें सिखाने के स्थान पर सेल्स के लिए काम में लेती हैं। वैसे ऐसा करने पर भी कुछ हद तक इंटर्नशिप का उद्देश्य तो पूरा होता है लेकिन मुझे फिर भी यह उचित नहीं लगता है।


इंटर्नशिप का उद्देश्य पूरा ना होते देख मैंने अपनी कम्पनी में कुछ बच्चों को इंटर्न के रूप में लेने का निर्णय लिया। लगभग 15 दिन तक कड़ी मेहनत करके मेरी टीम द्वारा सभी इंटर्न के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम बनाया गया, उसके बाद लगभग 10 बच्चों को इंटर्न के रूप में चुना और फिर शुरू हुई उनकी ट्रेनिंग। कुछ ही दिनों में मुझे एहसास होने लगा कि ज़्यादातर इंटर्न ट्रेनिंग के बाद मिलने वाले सर्टिफ़िकेट में ज़्यादा रुचि रखते हैं क्यूंकि उन्हें लगता है कि यह सर्टिफ़िकेट उन्हें इंटर्नशिप के पूरे नम्बर दिलवा देगा और अच्छे नम्बर व अनुभव प्रमाण पत्र उन्हें अच्छी नौकरी पाने में मदद करेंगे। मेरी नज़र में यह कोरी कल्पना से अधिक कुछ नहीं है क्यूँकि असल दुनिया काग़ज़ी प्रमाण पत्र से नहीं बल्कि ज्ञान, कौशल और वास्तविक अनुभव से चलती है। आइए इसे मैं आपको एक कहानी के माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ।


जंगल में एक शेर बहुत भूखा था उसे कई दिन से कोई शिकार नहीं मिला था। शिकार ढूँढने के चक्कर में वह थक अलग गया था। काफ़ी देर तक इधर-उधर भटकने के बाद उसे एक ख़रगोश नज़र आया। वह सोचने लगा यह ख़रगोश मेरा पेट तो नहीं भर सकता है इसका शिकार करने से क्या फ़ायदा। तभी उसके मन में विचार आया कि ख़रगोश भले ही मेरा पेट नहीं भर पाएगा पर कम से कम थोड़ी देर के लिए राहत तो दे ही देगा। यह विचार आते ही उसने थोड़ी झिझक के साथ ख़रगोश को पकड़ लिया।


शेर ख़रगोश को मारकर खाने ही वाला था कि उसकी नज़र पास से जाते हुए हिरण पर पड़ी। हिरण को देखते ही शेर के मन में लालच आ गया। वह सोचने लगा, ‘अगर मैं इस छोटे से ख़रगोश की जगह हिरण का शिकार कर लूँ तो मेरा पेट भी भर जाएगा और मेहनत भी एक ही बार करना पड़ेगी।’ उसने ख़रगोश को छोड़ दिया और हिरण का शिकार करने के लिए चल दिया। शेर को देख हिरण पूरी ताक़त से भागा और कुछ ही देर में जंगल में गायब हो गया। अब शेर के पास खाने के लिए ना तो ख़रगोश था और ना ही हिरण। हाँ, बस एक चीज़ उसके पास थी 'खरगोश को छोड़ देने का दुख और पछतावा।’ लेकिन इससे फ़र्क़ क्या पड़ना था? कुछ भी नहीं… इसीलिए तो कहा गया है, ‘अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।’


वैसे भी दोस्तों यह सिर्फ़ उन दस इंटर्न का नज़रिया नहीं है और ना ही सिर्फ़ बच्चों का, हम में से भी कई लोग लालच की वजह से हाथ आए मौक़ों को गँवा देते हैं। लालच हमें हमारे लिए क्या महत्वपूर्ण है यह सोचने और समझने का मौक़ा ही नहीं देता है। अगर आप स्वयं या किसी और को इस दुविधा से बचाना चाहते हैं तो तात्कालिक लाभ देखने के स्थान पर समय और ज़रूरत के अनुसार स्पष्ट लक्ष्य और प्राथमिकताएँ बनाना सीखें और सिखाएँ और उसके अनुसार निर्णय लें। याद रखिएगा, अगर अस्पष्ट लक्ष्य होंगे तो आप मानसिक रूप से सतर्क नहीं रह पाएँगे और बिना सतर्कता के मौक़ों को पहचानना असंभव ही रहेगा।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

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