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ख़ुशी चुराने वाली 5 आदतें - भाग 2

ख़ुशी चुराने वाली 5 आदतें - भाग 2
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June 20, 2021

ख़ुशी चुराने वाली 5 आदतें - भाग 2


दोस्तों अकसर हम जीवन में आने वाले दुःख या परेशानियों का ज़िम्मेदार परिस्थितियों, साधनों या लोगों को मानते हैं। लेकिन सोचकर देखिए क्या यह सम्भव है? शायद नहीं, मेरा यह मानना है कि दुःख हो या सुख, हमारे जीवन में घटने वाली हर घटना के लिए हम खुद ही ज़िम्मेदार हैं। जैसा की माक्र्स ऑरेलियस ने कहा है, ‘एक खुशहाल जीवन बनाने के लिए बहुत कम की जरूरत होती है और जिस चीज़ कि ज़रूरत होती है, वह हमारे भीतर है, हमारे सोचने के तरीके में।’ अर्थात् हम सिर्फ़ अपने सोचने के तरीक़े को बदलकर अपना जीवन बदल सकते हैं और सोच बदलना ही अपनी आदत बदलना है। इसीलिए तो कहते हैं, ‘खुश रहना या दुखी रहना हमारी आदतों पर निर्भर करता है।’


आईए दोस्तों कल सीखी ख़ुशियों को चुराकर ले जाने वाली पाँच में से प्रथम 2 आदतों को, आगे बढ़ने से पहले दोहरा लेते हैं-


पहली आदत - नकारात्मक माहौल में रहना 

अगर आप खुश रहना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने आस-पास का माहौल बदलें। इसके लिए निम्न तीन कार्य करें-

पहला कार्य - पिछले सप्ताह जिन 5 लोगों के साथ आपने सर्वाधिक समय बिताया है, उनके नाम लिखें।

दूसरा कार्य - पिछले सप्ताह जिन 5 समाचार पत्रों, टीवी, न्यूज़ चैनल, सोशल मीडिया ग्रुप, मूवी या सीरियल आदि जिनसे आपने स्वयं को अपडेट करा हो, उनके नाम लिखें।

तीसरा कार्य - उपरोक्त दोनों सूची में जिन कार्यों ने आपको सकारात्मक रूप से आगे बढ़ाया है उन्हें दोहराते रहें और जिन कार्यों ने आपके समय को बर्बाद करा है उन्हें तत्काल छोड़कर इस समय को सकारात्मक या प्रेरणादायी लोगों, किताबों, प्रवचन या विडियो देखने में लगाएँ।



दूसरी आदत - सही समय का इंतज़ार करना 

सही समय के इंतज़ार में बैठना, असल में अपनी ख़ुशियों से खुद दूर हो जाने के सामान है। इसके स्थान पर रोज़ छोटा सा कदम उठाए जो आपको अपने लक्ष्य की ओर ले जाता हो, जो आपको ख़ुशी देता हो।


आईए दोस्तों अब बात करते हैं ख़ुशियों को चुराने वाली अगली तीन आदतों के बारे में-


तीसरी आदत - आलोचना, निंदा, शिकायत एवं ईर्ष्या में अपना समय बर्बाद ना करें

याद रखें हर बार आलोचना या निंदा करने वाले लोगों की बातों का जवाब देना ज़रूरी नहीं है, इन्हें नज़रंदाज़ करें अन्यथा यह आत्म-संदेह के द्वारा आत्मबल को नुक़सान पहुँचाते है। संदेह ज़्यादा होने पर अनुभवी सलाहकार से राय लें और अगर आप सही हैं तो नज़रंदाज़ कर अपने लक्ष्य और उसे पाने की योजना पर ध्यान लगाए। इसी तरह अपना समय और शक्ति दूसरों के पास क्या है उससे तुलना करने में ना लगाए। ईर्ष्या करना नकारात्मकता को अपनी ओर आकर्षित करता है। याद रखें आप ईश्वर की  बनाई एक अनूठी कृति हैं, आपके जैसा दुनिया में कोई और है ही नहीं। अपनी तुलना सिर्फ़ अपने अतीत से करें। जो आपके पास है और जहाँ आप जाना या जो पाना चाहते हैं उस पर अपना ध्यान केंद्रित करें। स्वयं से बार-बार पूछें, ‘इस वक्त मैं जहाँ अपना समय और दिमाग़ लगा रहा हूँ, क्या यह कदम मुझे अपने लक्ष्य की ओर ले जाएगा? अगर जवाब ‘ना’ है तो तुरंत उस स्थिति से बाहर आए और एक नया, छोटा सा सकारात्मक कदम उठाए जिससे आपका समय, ध्यान, ऊर्जा और संसाधन खुद के लक्ष्य को पाने में लग सकें।



चौथी आदत - काम और आराम के संतुलन को बराबर ना बनाना और रोज़ एक जैसा कार्य करते रहना 

अत्यधिक व्यस्त रहते हुए कार्य करना, हमें अपनी आत्मा और आत्म संतुष्टि से दूर ले जाकर तनाव पैदा करता है। इसलिए हर एक घंटे बाद छोटा सा ‘एनर्जी ब्रेक’ लें और इस थोड़े से ब्रेक के समय को अपने पसंदीदा कार्य में लगाकर खुद को रिफ़्रेश करें।  


इसी तरह सुरक्षित और आरामदायक स्थिति में रहने के लिए नए प्रयोग बंद करना धीरे-धीरे रचनात्मकता खत्म कर खुद की ग्रोथ रोक देता है। इसके स्थान पर कुछ नया करें, वह चुने जिसके लिए सामान्यतः आप मना कर देते हैं। चाहे वह खाने में कुछ नया लेना हो, या फिर गाना गाना या डांस करना। जो डर की वजह से कभी ना करा हो वह ट्राई करें। ऐसा करना आपको अपने अंदर छिपी हुई क्षमता को पहचानने का मौक़ा देने के साथ-साथ रोमांचकारी अनुभव भी देगा।


पाँचवीं आदत - हर कार्य को अति गम्भीरता से लेते हुए, हर बार परफेक्ट तरीक़े से करना

हर कार्य को परफेक्ट तरीक़े से करने के चक्कर में हम गलती करने से डरने लगते हैं और खुद पर अत्यधिक और अनावश्यक दबाव बनाने लगते हैं। इसके स्थान पर अपने जीवन के हर पल का आनंद लेने का प्रयास करें। कई बार जो हो रहा है उसे होने देना और अपनी ग़लतियों पर खुद हँसना भी अपने आप में महत्वपूर्ण होता है। 


याद रखें दोस्तों, हमें जीवन को परफ़ेक्ट नहीं बनाना है बल्कि उसे 100% जीना है। इसलिए सहज रहते हुए जीवन का आनंद लें। उन लोगों के आस-पास रहें जो जीवन जीने को प्राथमिकता देते हों। याद रखिएगा दोस्तों खुद पर भी वही व्यक्ति हंस सकता है जिसे खुद पर, अपने ज्ञान और कौशल पर भरोसा हो। जब हम असफल होने का डर खत्म कर देते हैं तब हम रक्षात्मक होने के स्थान पर, खुद से प्यार करना और जीना शुरू कर देते हैं अर्थात् खुश रहना शुरू कर देते हैं।



-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

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