फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

सपनों का जीवन जिएँ, जी भरके

सपनों का जीवन जिएँ, जी भरके
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Oct 22, 2021

सपनों का जीवन जिएँ, जी भरके !!!


मेरे करीबी मित्र अपने बेटे अमित (बदला हुआ नाम) को कैरियर गाइडेंस के लिए मेरे पास लेकर आए। मैंने अमित से कहा, ‘तुमने तो आई॰आई॰एम॰ से एम॰बी॰ए॰ करने का लक्ष्य बना रखा था और तुम उसके लिए पिछले एक वर्ष से तैयारी कर रहे हो फिर अचानक मन में दुविधा कैसे आ गई?’ अमित ने पहले तो बात को घुमाने का प्रयास करा लेकिन थोड़ी देर में ही मैं उसे विश्वास दिलाने में सफल हो गया कि सच्चाई बताने में उसका ही फ़ायदा है। वह बोला, ‘सर, मैं पढ़-पढ़ कर पागल हो गया हूँ। यह पढ़ाई मुझे थका देती है और परिणाम कभी मनमाफ़िक नहीं मिलता। कितना भी पढ़ो, इस प्रतियोगी परीक्षा के लिहाज़ से कम ही लगता है। हर साल 2 लाख लोग इस परीक्षा में बैठते हैं और उनमें से मात्र 10000 लोग टॉप 50 कॉलेज में प्रवेश पा सकते हैं। मुझे अब लगने लगा है कि मैं अपना सपना अब कभी पूरा नहीं कर पाऊँगा।’ 


वैसे दोस्तों, यह अमित की अकेले की समस्या नहीं है बल्कि हर इंसान इस दौर से गुजरता है। फिर चाहे वह विद्यार्थी हो या नौकरीपेशा, व्यापारी हो या किसान, अमीर हो या गरीब, छोटा हो या बड़ा इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। हर किसी को अपने-अपने क्षेत्र में किसी ना किसी स्तर पर प्रतियोगिता और असफलता का सामना करना ही पड़ता है। 


मैंने मुस्कुराते हुए अमित को बीच में ही रोका और कहा, ‘फ़ॉर्म भरने वाले बच्चों की संख्या के आधार पर तुम्हारे आँकड़े सही हैं। लेकिन यह हक़ीक़त से कोसों दूर है। अगर तुम इसका विश्लेषण करके देखोगे तो पाओगे कि 2 लाख में से मात्र 50000 बच्चे सही मायने में परीक्षा की तैयारी करते हैं और इन पचास हज़ार में से दस हज़ार बच्चे टॉप 50 कॉलेज में प्रवेश पा पाते हैं। अगर तुम टॉप 15 कॉलेज में प्रवेश चाहते हो तो तुम्हें टॉप 2000 बच्चों में आना होगा और इसके लिए तुम्हें अपने सपने को डर से ज़्यादा बड़ा बनाना होगा।


शायद आप सभी अमित की ही तरह मेरी इस बात से सहमत होगे कि जीवन में हर व्यक्ति का एक सपना होता है, जीवन का एक लक्ष्य होता है। हर व्यक्ति हमारी ही तरह अपने सपनों को पूरा करना चाहता है, उसके लिए काम करता है। लेकिन इनमें से लगभग 98% लोग जीवन में कभी अपने सपनों को पूरा नहीं कर पाते, सपनों को हक़ीक़त में नहीं बदल पाते। जी हाँ मात्र 2% लोग होते हैं, जो अपने सपनों को हक़ीक़त में बदलकर वैसा जीवन जीते हैं, जैसा वे जीना चाहते हैं। 


उपरोक्त आँकड़े बताते हैं कि ज़्यादातर लोग अपने सपनों को पुरा नहीं कर पाते हैं। आख़िर इसकी वजह क्या है? क्या वे सपनों से जुड़े हुए नहीं होते? या यह सपने उनके खुद के नहीं है? दोनों ही बातें सही नहीं है। असल में सपनों को हक़ीक़त में बदलने का रास्ता कठिन है। इसके लिए हमें अपनी कई इच्छाओं, धारणाओं, सुविधाओं को छोड़कर असुविधा पूर्ण मार्ग पर चलते हुए जीवन जीना पड़ता है और हम इसके अभ्यस्त नहीं है। सब कुछ तुरंत और आसानी से पाने की चाह में हम अपनी इच्छाओं को अपने सपनों से बड़ा मान लेते है और भूल जाते हैं कि इच्छाएँ क्षणभंगुर है। इस तरह हम अपने सपनों को मार देते हैं।


बिना सपनों के जीवन जीना हमारे जीवन को नीरस बनाकर उसका रोमांच खत्म कर देता है। जब यही निरसता हमें ज़्यादा परेशान करती है तो एक दिन हम सब कुछ भूलकर, फिर से एक नए लक्ष्य के साथ, जीवन शुरू करते हैं। लेकिन फिर से हमारे रास्ते में नई बाधाएँ आती हैं, और हम फिर से रुक जाते हैं। असल में दोस्तों जीवन को सुंदर, अपने सपनों जैसा बनाने के लिए हम हर बार एक नए दिन का इंतज़ार करते हैं। लेकिन जब बार-बार अपनी कमियों की वजह से असफल होते हैं तो अपनी ही लाचारी पर क्रोध करते है, निराशा होते है।


इसके विपरीत अगर आप इस कुचक्र को तोड़, खुलकर, खुश रहकर जीवन जीना चाहते हैं तो सपनों को पूरा कर ख़ुशी के साथ जीवन जीने वाले दो प्रतिशत लोगों से सीखना होगा। वे अपनी सुविधाओं को छोड़कर कठिन रास्ते को चुनते है। वे वही कार्य करते हैं, जो उन्हें उनके सपनों के क़रीब ले जाता है।


याद रखिएगा जो हम चाहते हैं, जो हम मानते हैं, जो हम महसूस करते हैं, उसके लिए हमें लड़ना, कठिन और असुविधा पूर्ण रास्तों पर चलना सीखना होगा। इसके लिए सबसे पहले हार मानना छोड़ दें। इससे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप कितनी बार असफल हो चुके हैं, हार चुके हैं। बस फिर से एक बार लड़ने का निर्णय लें और अपनी पूरी ऊर्जा के साथ तैयारी में भिड़ जाएँ। याद रखिएगा दोस्तों, हमारे सबसे बड़े दुश्मन हमारे अंदर ही आलस्य, भय, संदेह, अनिर्णय जैसे भावों के रूप में छिपे हुए हैं। जीतने के लिए हमें इनसे और साथ ही विषमताओं, विपरीत परिस्थितियों से लड़ना, अपनी कमज़ोरियों को हराना और रोज़ खुद से बेहतर बनना सीखना होगा। जी हाँ, हम अपने सपनों के योद्धा, लक्ष्यों के शूरवीर और इच्छाओं के सिपाही बनकर ही सपनों का जीवन जी सकते हैं!


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

dreamsachieverspune@gmail.com

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