फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

सफलता - पैसा या खुश और शांत जीवन

सफलता - पैसा या खुश और शांत जीवन
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April 15, 2021
सफलता - पैसा या खुश और शांत जीवन?

दोस्तों आज के शो की शुरुआत हम पिछले दिनों घटी कुछ घटनाओं के साथ करते हैं। मंगलवार रात लगभग साढ़े ग्यारह बजे मेरे पास अपने एक मित्र का मैसेज आया की तुम्हारा फेसबुक अकाउंट हैक हो गया है, जल्दी चेक करो। हालाँकि तबियत ठीक ना होने की वजह से मैं सोने की तैयारी में था लेकिन तुरंत ही एक्शन में आना पड़ा। जैसे ही मैंने अपने फेसबुक अकाउंट पर लॉगिन किया मुझे अपने एक एफ़.बी. मित्र श्री अभय गोस्वामी जी का मैसेज मिला कि कोई उनसे मेरे नाम से 15000 रुपए दीपक कुमार नाम के पेटीएम एकाउंट नम्बर 919057116439 और आईएफ़एससी कोड PYTM123456 में जमा करने के लिए कह रहा है। एक अन्य मित्र यश ने तुरंत किसी एप कि मदद से उसका फ़ोन नम्बर वेरिफ़ाई किया और बताया कि पेटीएम 9057116439 फ़ोन नम्बर से चल रहा है। मैंने तुरंत  इस बात की शिकायत करी और अपने परिचितों को इस बारे में सूचना देकर आगाह किया।

दूसरी घटना जयपुर राजस्थान की है जहाँ एक सरकारी अस्पताल से वैक्सीन चोरी होने का मामला सामने आया है। शहर के शास्त्री नगर में स्थित कावंटिया अस्पताल से कोवैक्सिन टीके की 32 शीशियाँ  चोरी हो गई हैं। एक शीशी (वायल) में 10 डोज रहते हैं। इस लिहाज से कुल 320 डोज चोरी गए हैं। अस्पताल की तरफ से शास्त्री नगर थाने में वैक्सीन चोरी होने का केस दर्ज कराया गया है। जहाँ तक मुझे लगता है, दोस्तों यह देश में कोरोना वैक्सीन चोरी होने का पहला मामला होगा।

तीसरी घटना मध्यप्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर की है, जहाँ अमित नामक व्यक्ति को फेसबुक पर मैसेज मिला कि अगर उन्हें रेमेडिसिवर इंजेक्शन की ज़रूरत है तो वे सम्पर्क करें। अमित उस वक्त इंजेक्शन के लिए परेशान हो ही रहे थे तो उन्होंने तुरंत उस व्यक्ति से सम्पर्क करा। बातचीत करने पर अमित को एहसास हुआ कि वह व्यक्ति दवाई की कालाबाज़ारी कर रहा है। उस व्यक्ति ने एक अन्य इंजेक्शन टोसीलीजुमेब (टोसी) को भी एक लाख दो हज़ार रुपए में उपलब्ध करवाने की बात कही। अमित ने भी जागरूक नागरिक होने का फर्ज़ निभाते हुए इसकी शिकायत दर्ज करवाई।

दोस्तों अगर आप उपरोक्त तीनों प्रकरणों पर गौर करेंगे तो पाएँगे कि कुछ लोग इंसानियत को ताक पर रख कर, इस विकट परिस्थिति में भी लोगों की मजबूरी का फ़ायदा उठाकर रातों-रात पैसा कमाना चाह रहे हैं। मुझे लगता है समाज में अब ज़्यादातर लोग ‘सही क़ीमत’ के स्थान पर ‘किसी भी क़ीमत’ पर सफल होना चाहते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल आता है, समाज में यह परिवर्तन क्यों आ रहा है? चलिए इसे समझाने का प्रयास करता हूँ।

बच्चे का जन्म होते ही माता-पिता के मन में बच्चे के सुनहरे भविष्य को लेकर ढेर सारे सपने बनना शुरू हो जाते हैं। जैसे ही बच्चा लगभग एक-डेढ़ साल का होता है माता-पिता या परिवार वाले उसे नई-नई बातें सिखाना शुरू कर देते हैं और फिर थोड़े दिनों बात ही वह बच्चा स्कूल जाना शुरू कर देता है। स्कूल में प्रवेश कराते ही परिजनों और बच्चे की प्राथमिकताओं में अंतर आ जाता है। बच्चा तो बच्चा ही होता है, वह इतना समझदार तो होता नहीं है कि अपने जीवन की प्राथमिकताओं को समझ पाए। वह तो हमेशा वर्तमान में रहते हुए, मस्ती के मूड में रहता है और ज़्यादातर समय खेलने में उसे मज़ा आता है लेकिन इसके विपरीत परिवार वाले अब उसे सब अच्छे से सिखाने के स्थान पर क्लास में नम्बर वन लाने के फेर में पड़ जाते हैं।

कई बार वह दुविधा में होता है, जानने का प्रयास करता है कि जीवन का अर्थ क्या है? पढ़ाई इतनी ज़रूरी क्यों है? इतना पढ़ने से होगा क्या? बस तब उसे एक ही जवाब मिलता है, ‘अच्छा पढ़ोगे तो अच्छे नम्बर आएँगे, अच्छे नम्बर तो अच्छी नौकरी और अच्छी नौकरी तो ढेर सारे पैसे और ढेर सारे पैसे मतलब अब तुम सफल हो।’ अगर अभी भी उसके मन में कोई प्रश्न आता है तो उसे समझा दिया जाता है, ‘अभी तुम छोटे हो, तुम्हारे भले के लिए कह रहे हैं, इसलिए जैसा बोला है वैसा करो। जब बड़े हो जाओगे तब सब समझ में आ जाएगा।’

बस दोस्तों यहीं से गलती होना शुरू हो जाती है ।  बच्चे के भविष्य की नींव सुलझे विचारों की जगह प्रश्नों और आधी-अधूरी धारणाओं पर बनना शुरू हो जाती है। उसे सिर्फ़ एक बात समझ आती है कि ‘सफलता मतलब पैसा।’ वह बच्चा अपने मन में इस बात को गाँठ बाँध कर रख लेता है।

दोस्तों जीवन की धमाचौकड़ी में हम जैसे बड़े लोग भूल ही जाते हैं कि बच्चे को हमें जीवन का अर्थ समझाना है। उसकी सही प्राथमिकताएँ तय करवानी हैं। वैसे जो मैं उसे सिखाने की बात कर रहा हूँ, वह हममें से ही कई को पता नहीं है इसलिए तो हम उसके प्रश्नों को टाल जाते हैं, उसे चुप करते जाते हैं। दोस्तों नतीजा अब हमारे सामने है सोच कर देखिएगा हम किस और जा रहे हैं।

अगर दुनिया को अच्छा बनाए रखना है, तो बच्चों को इंसानियत का, मानवता का पाठ पढ़ाएँ। उसे ज्ञान के लिए पढ़ाएँ, नम्बर वन बनाने के लिए नहीं। उसे सिखाएँ कि सफलता का अर्थ पैसा नहीं शांत और खुश रहना है, दूसरों से बराबरी करने में, उससे आगे निकलने के लालच में तुम इसे खो दोगे। याद रखिएगा दोस्तों इस महामारी ने हमें हक़ीकत का बहुत अच्छे से एहसास करा दिया है। रखा हुआ पैसा, गाड़ियाँ, बंगले, ज़मीनें कुछ काम नहीं आ रही हैं। अगर किसी चीज़ ने हमें बचाया है तो वह है मानवता और कमाए हुए चंद रिश्ते।

-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर
dreamsachieverspune@gmail.com

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