फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

सुखी जीवन का राज

सुखी जीवन का राज
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Nov 21, 2021

सुखी जीवन का राज…


दोस्तों मुझसे सबसे ज़्यादा पूछे जाने वाले प्रश्नों में से एक प्रश्न है कि ‘सुखी जीवन जीने का रहस्य क्या है?’ आज भी यही प्रश्न एक सामूहिक चर्चा के दौरान मुझसे पूछ लिया गया। मैंने उन सज्जन से कहा, ‘सर, इंसानों की तरह जीवन जीना ही सुखी जीवन का रहस्य है।’ मेरा जवाब सुनते ही वे बोले, ‘माफ़ कीजिएगा सर, भागदौड़ वाली इस ज़िंदगी में सुखी रहना, सिवाय एक कोरी कल्पना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। वैसे भी इंसानों की तरह जीवन जीने से आपका अभिप्राय क्या है, मैं समझ नहीं पाया।’


मैंने उन सज्जन से कहा, ‘जिस तरह ईश्वर ने इस सृष्टि का निर्माण पत्थर, पेड़-पौधों, जानवरों और इंसानों को लेकर किया है। ठीक उसी तरह इंसान में भी यही चारों चीज़ें पाई जाती हैं। मतलब पहले तरह के इंसान वो हुए जिनके दिल पत्थर के होते हैं, अर्थात् वे इंसान जो सिर्फ़ खुद के बारे में सोच पाते हैं। दूसरी तरह के इंसान पेड़-पौधों के समान होते हैं, जो खुद और खुद के परिवार के बारे में सोचते हैं। तीसरी तरह के इंसान जानवरों के सामान होते हैं; वे मैं, मेरा परिवार और मेरा समाज तक ही सोचते हैं। लेकिन इंसानों में जो सर्वश्रेष्ठ होते हैं वे सिर्फ़ ‘मैं’ नहीं ‘हम’ अर्थात् सबके विकास में विश्वास रखते हैं। वे हमेशा स्वयं, अपने परिवार, अपने समाज से आगे बढ़कर इंसानियत के बारे में सोचते हैं। इसे मैं आपको एक सच्ची घटना से समझाने का प्रयास करता हूँ-


यह बात हिटलर के शासन काल की है, जब जर्मनी में नाज़ी बिना किसी कारण के बेदर्दी के साथ यहूदियों को तड़पा-तड़पा कर  मार दिया करते थे। कई बार तो उन्होंने यहूदियों को ऐसी जगह ले जाकर छोड़ दिया जहां उनके लिए ज़िंदा रहना ही नामुमकिन था। अर्थात् ऐसी जगह जहां उन्हें ना तो खाने के लिए कुछ मिले, ना ही पीने के लिए और ना ही कोई स्थान जहां वे सर छिपा सकें। स्थिति की भयावहता का अंदाज़ा आप इस घटना से लगा सकते हैं-


एक बार सर्दियों के दिन में नाज़ियों ने ऑशविट्ज़ जाने वाली ट्रेन में यहूदियों को भरा और रास्ते में पड़ने वाले सुनसान और बीहड़ से स्थान पर आधी रात को सर्दी से मरने के लिए पटरियों के किनारे पर उन्हें छोड़ दिया। उन यहूदियों के पास उस वक्त ना तो कम्बल थे और ना ही आग जलाकर गर्मी लेने का कोई साधन। बर्फीला इलाक़ा होने के कारण वहाँ हाड़ कँपाने वाली सर्दी थी। बर्फीली हवा शरीर को ऐसे भेद रही थी मानो थोड़ी देर में खून ही जमा देगी। 


भूखे-प्यासे, बिना गर्म कपड़ों और कम्बल के उन यहूदियों का बच पाना नामुमकिन था। इन्हीं यहूदियों में एक बच्चा भी था, अचानक से उस बच्चे का ध्यान सामने खड़े वृद्ध पर गया जो अत्यधिक सर्दी की वजह से सर से पाँव तक बुरी तरह काँप रहे थे। वह बच्चा उन्हें तुरंत पहचान गया क्यूँकि वे भी उसी के गाँव के थे। 


वृद्ध को इस तरह काँपते देख उस बच्चे ने वृद्ध को अपनी बाहों में जोर से जकड़ लिया, जिससे उसका शरीर गर्म हो सके। वह बच्चा कभी उस वृद्ध के हाथ, तो कभी पैर या फिर कभी उसके चेहरे तो कभी उसकी गर्दन को अपनी हथेलियों से रगड़ने लगा। इसके साथ ही बीच-बीच में वह बच्चा, उस वृद्ध को ज़िंदा रहने के लिए बार-बार प्रोत्साहित कर रहा था। उसका बच्चे का लक्ष्य सिर्फ़ एक था, किसी भी तरह वृद्ध के शरीर की गर्मी को बनाए रखना।


वृद्ध को बचाने के प्रयास में वह बच्चा खूब थक गया था, उसके पैर व उँगलियाँ ठंड की वजह से सुन्न पड़ गयी थी। उसकी हालत भी बहुत ख़राब थी। लेकिन इस सब के बावजूद भी उसने उस बूढ़े आदमी के शरीर को रगड़ना या मलना बंद नहीं किया। बचाने के इसी प्रयास में कब कुछ घंटे गुजर गए, उस बच्चे को पता ही नहीं चला। अब वह भयानक रात बीत चुकी थी और चमकते सूरज के साथ, एक नई सुबह उसके सामने थी। 

सूरज की गर्मी से कुछ राहत मिलने के बाद उस बच्चे ने अपने चारों ओर नज़र घुमाकर देखा। वहाँ का नजारा देख वह बच्चा डर गया था। उसके चारों ओर बर्फ़ में जमे हुए लोगों के मृत शरीर थे। यहूदियों के उस समूह में सिर्फ़ वह बच्चा और उसके गाँव के वह वृद्ध जीवित बचे थे जिनके शरीर को उसने पूरी रात गर्म रखने का प्रयास किया था।


द्वितीय विश्वयुद्ध के कई वर्षों बाद जर्मनी के क्राउन हाइट्स नामक कस्बे में बेकरी की दुकान चलाने वाले इस युवा, यांकेल, से जब इस विषय में पूछा गया तो उसने बताया कि, ‘वह वृद्ध इतनी सर्दी के बाद भी इसलिए बच गया था क्यूँकि मैंने उनके शरीर को रगड़-रगड़कर, मालिश कर गर्म रखा था और साथ ही मैं इसलिए बच गया क्योंकि जब मैं उस वृद्ध को रगड़-रगड़कर मालिश कर गरमाहट दे रहा था, तब मेरा शरीर भी खुद-ब-खुद गर्म हो रहा था।’ यांकेल इस घटना को बड़े गर्व के साथ लोगों को बताया करता था।


दोस्तों अगर आप वाक़ई जीवन में सुखी रहने का तरीक़ा खोज रहे हैं तो उपरोक्त कहानी को एक बार फिर से ध्यान से पढ़ लीजिएगा। इस दुनिया में सुखी रहने का सिर्फ़ एक तरीक़ा है दूसरों को सुखी बनाने का प्रयास करो। जब आप दूसरों को अच्छी फ़ीलिंग देते हैं, दिल से उनकी मदद करते हैं, उनके बारे में अच्छा सोचते हैं तब आप स्वयं अच्छा महसूस करते हैं।  ठीक इसी तरह जब आप दूसरों का समर्थन करते हैं, उन्हें प्रोत्साहित और प्रेरित करते हैं, तब आप अपने जीवन में भी समर्थन, प्रोत्साहन और प्रेरणा पाते हैं। 


याद रखिएगा दोस्तों, यही सुखी जीवन का रहस्य है। जब आप दूसरों के लिए अच्छे होते हैं, तब आप अपने लिए भी अच्छे होते हैं। इसी तरह, जब आप लोगों को खुश रखते हैं, तो लोग आपको खुश रखते हैं। जी हाँ दोस्तों, इस दुनिया को बेहतर बनाने के लिए हमें एक दूसरे का ध्यान रखना होगा और इस ईश्वरीय व्यवस्था को आगे बढ़ाना होगा। 


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

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