फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

सुनें सिर्फ़ वही, जो कानों के लिए नहीं बल्कि जीवन के लिए हो सही

सुनें सिर्फ़ वही, जो कानों के लिए नहीं बल्कि जीवन के लिए हो सही
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Nov 9, 2021

सुनें सिर्फ़ वही, जो कानों के लिए नहीं बल्कि जीवन के लिए हो सही 


हाल ही में एक समूह के साथ व्यवसायिक कंसलटेंसी के संदर्भ में कार्य करने का मौक़ा मिला। कार्य के दौरान मैंने वहाँ हर किसी को सिर्फ़ ‘जी सर’, ‘आप की वजह से ही यह सम्भव हुआ है’, ‘आप का तो जवाब नहीं’ जैसे मीठे बोल, बोलते हुए पाया। फिर चाहे वह व्यक्ति चपरासी हो या मैनेजर या कोई अन्य वरिष्ठ अधिकारी। किसी को भी कम्पनी के हित अथवा सही क्या है से कोई मतलब नहीं था हर कोई सिर्फ़ मीठी-मीठी बातों से वरिष्ठों का प्रिय बना रहना चाहता था।


दोस्तों, कई बार व्यक्तिगत जीवन में भी हम इस तरह के चापलूस लोगों से घिर जाते हैं और जब तक हमें इस बात का एहसास होता है, तब तक हम अपना बड़ा नुक़सान कर चुके होते हैं या अपने जीवन की राह को कठिन बना चुके होते हैं। चलिए इसे हम एक कहानी के माध्यम से समझते हैं-


सुंदरवन जंगल में सभी जानवर बड़े प्यार के साथ एक दूसरे के साथ रहा करते थे लेकिन वहाँ का राजा शेर बड़ा शक्तिशाली और क्रूर शिकारी था। इसलिए सभी जानवर उससे डरा भी करते थे। इसी जंगल में ख़रगोश, कछुआ, बंदर और हिरन, चार बहुत पक्के और सच्चे दोस्त भी रहा करते थे। लोग इनकी दोस्ती की मिसालें दिया करते थे। 


शेर से बचकर जीने के लिए सभी जानवरों ने एक फ़ैसला लिया कि हर दिन एक जानवर स्वेच्छा से शेर का भोजन बन ज़ाया करेगा जिससे बाक़ी लोग शांति के साथ जी सकेंगे। शेर को भी यह विचार पसंद आ गया। भेड़िए को जब इस बारे में पता चला तो वह अपनी जान हमेशा के लिए बचाने हेतु कुछ युक्ति सोचने लगा।


एक दिन अचानक उस चालाक भेड़िये के मन में विचार आया कि अगर वह किसी तरह शेर से मित्रता करके, उसका हितैषी बन जाए या किसी तरह उसका दिल जीत ले तो उसकी जान बच सकती है। वह तुरंत सुंदरवन के राजा की गुफा में पहुँच गया और उन्हें प्रणाम करते हुए बोला, ‘राजा पशुलोक के देवता आपके एक दिन में एक जानवर को मारकर खाने के निर्णय से बहुत खुश हैं और उन्होंने मुझे वहाँ से विशेष रूप से आपकी सेवा करने के लिए भेजा है। अब मैं जंगल में जाकर चुनकर आपके लिए शिकार लाया करूँगा।’ राजा भेड़िए की बातों में आ गया।


अगले दिन भेड़िए ने जंगल में ढिंढोरा पिटवाया कि मैं पशुलोक के देवता के आदेश से राजा शेर का सेवक बनकर इस जंगल में आया हूँ। कल से जंगल का कोई एक जानवर मेरे साथ राजा की भूख मिटाने के लिए चलेगा। जंगल के सभी जानवर भी उसकी बातों में आ गए और अगले दिन से उसके साथ राजा का शिकार बनने के लिए जाने लगे। एक दिन शेर का भोजन बनने की बारी ख़रगोश की आई। भेड़िया उसके पास पहुँचा और उसे शेर के पास चलने के लिए बोलने लगा, तभी उसके तीनों दोस्त हिरण, बंदर और कछुआ भी वहाँ पहुँच गए और भेड़िए से ज़िद करने लगे कि वो उसके दोस्त को ना लेकर जाए। लेकिन भेड़िया भी कहाँ मानने वाला था, वह भी ख़रगोश को ले जाने के लिए अड़ गया। भेड़िए के ना करते ही तीनों जानवर भी अपने दोस्त ख़रगोश के साथ शेर की गुफा की ओर चल दिए।


शेर भेड़िए के साथ चार जानवरों को देख चौंक गया और उससे इसका कारण पूछने लगा। भेड़िए ने शेर को अपनी बातों में उलझाना चाहा लेकिन तब तक उन चारों दोस्तों में से कछुआ बोला, ‘राजा जी! ख़रगोश मेरा परम मित्र है आप इस छोड़ कर मेरा शिकार कर लो। वैसे भी मेरी उम्र काफ़ी हो गई है’ कछुए के समान ही बंदर ने भी शेर से ऐसा ही कहा। दोनों की बात सुनते ही हिरण बोला, ‘महाराज ये तीनों बड़े छोटे हैं। इनको मारकर खाने से आपकी भूख पूरी तरह मिट नहीं पाएगी, इनके स्थान पर आप मुझे भोजन के रूप में स्वीकार कर लीजिए।’


शेर उनके आपसी प्यार और दोस्ती को देख अभिभूत था। तभी चालाक भेड़िया अचानक से बोल पड़ा, ‘महाराज आप इनकी चिकनी-चुपड़ी बातों में ना आएँ आप तो आज चारों को ही अपना शिकार बनाकर खा जाएँ।’ भेड़िए की बात सुनते ही शेर को सच्चाई का एहसास हुआ उसने चारों दोस्तों की ओर देखते हुए कहा, ‘मैं तुम चारों की दोस्ती को देख अभिभूत हूँ। तुम एक दूसरे की सलामती के लिए अपना बलिदान देने के लिए भी तैयार हो। तुम्हारी सच्ची एकता, मित्रता और त्याग देख मैं बहुत खुश हुआ

हूँ। जाओ मैं तुम चारों की जान बख़्शता हूँ।’ बात पूरी होते ही शेर ने अपना पंजा जोर से भेड़िए के ऊपर मारा और उसका शिकार कर खा गया और बोला, ‘मुझे तेरे जैसे मौक़ापरस्त का साथ नहीं चाहिए।’


जी हाँ दोस्तों, किसी भी कार्य में सफलता पाने और उससे इतिहास रचने के लिए आपको सुनी हुई बातों, या चापलूसों द्वारा बोली मीठी बातों से बचकर तथ्यों पर काम करना होगा। अपनी टीम में चापलूसों के स्थान पर उन चारों जानवरों जैसे सच्चे साथियों को चुनना होगा। जो अपने दोस्तों को बचाने के लिए अपनी जान देने के लिए भी राज़ी थे। यह तभी सम्भव हो सकता है जब रिश्ते स्नेह और विश्वास के आधार पर बनें हों ना कि अपने-अपने हित या लाभ पर।


याद रखिएगा, अगर आप सिर्फ़ वही सुनना चाहते हैं जो आपके कानों को पसंद है, तो यह भी हो सकता है कि आप सफल हो जाएँ और आप अपने लक्ष्य पा लें, लेकिन एक बात तय है, आने वाली पीढ़ियों के लिए आप कभी भी ऐसे पदचिन्ह नहीं छोड़ पाएँगे जो उन्हें जीवन जीने का सही मार्ग सिखा सके।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर 

dreamsachieverspune@gmail.com

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