फिर भी ज़िंदगी हसीन हैं...

स्वयं लिखें अपनी क़िस्मत

स्वयं लिखें अपनी क़िस्मत
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Mar 5, 2021
स्वयं लिखें अपनी क़िस्मत…

मैं एक परिचित व्यवसायी की दुकान पर सामान लेने गया, वे अपने गल्ले पर बड़े मायूस से बैठे हुए थे। मैंने उनसे इसका कारण जानना चाहा तो वे बोले, ‘सर क्या करूँ क़िस्मत ही फूटी हुई है।’ मैंने पूछा, भाई ऐसा क्या हो गया जो क़िस्मत को दोष दे रहे हो? व्यापारी बोला, ‘सर 2020 की शुरुआत में मैंने वास्तु के अनुरूप दुकान में पूरा फ़र्निचर वापस बनवाया लेकिन काम पूरा होने के एक-डेढ़ माह बाद ही लॉकडाउन लग गया। लॉकडाउन हटने के बाद भी धंधा एकदम मंदा चल रहा है। मैंने उन्हें थोड़ा दिलासा देते हुए सामान की लिस्ट थमा दी। कुछ ही देर में उन्होंने सामान पेक़ कर देते हुए कहा, ‘सर इसमें से कुछ सामान मेरे पास नहीं था वह मैंने छोड़ दिया।’ मैंने उन्हें भुगतान करा और वापस घर आ गया, घर पर जब मैंने सामान को लिस्ट से मिलाया तो मुझे आश्चर्य हुआ कि जो सामान दुकानदार नहीं दे पाया था वह सब इस बदलते मौसम में लोगों की ज़रूरत का था। मैंने उन्हें तुरंत फ़ोन करा और यह कहानी सुनाई… 

नदी किनारे रहने वाले पंडित जी बड़ी धार्मिक प्रवृति के प्रभु भक्त थे, सुबह-शाम पूजा-पाठ करना उनकी नियमित दिनचर्या का हिस्सा था। पंडित जी ईश्वर पर अटूट विश्वास किया करते थे इसीलिए गाँव में उनकी बड़ी इज्जत थी, हर कोई उनके व्यवहार और भक्ति की प्रशंसा किया करता था।

एक दिन सरकारी अधिकारियों द्वारा गाँव में मुनादी पिटवाई गई कि अत्यधिक बारिश की वजह से बाढ़ आने की सम्भावना है, इसलिए सभी गाँव वाले अपना-अपना घर ख़ाली कर दें। कुछ गाँव वालों ने अपना सामान समेटा और गाँव छोड़कर जाने लगे, उन्हीं में से कुछ लोग पंडित जी के पास गए और उनसे भी गाँव छोड़ने का निवेदन किया। पंडित जी ने कहा मुझे तो नहीं लगता कि अभी बाढ़ आएगी लेकिन अगर आ भी गई तो मुझे तो मेरे प्रभू बचाएँगे। गाँव वालों ने कहा पंडित जी जैसी आपकी मर्ज़ी और वे आगे बढ़ गए।

रात भर तेज़ बारिश की वजह से गाँव में अगले दिन बाढ़ का पानी भरने लगा। गाँव में बचे हुए लोगों ने जल्दी-जल्दी गाँव छोड़ना शुरू कर दिया। पंडित जी के पास में रहने वाले एक व्यक्ति ने उन्हें भी भागकर जान बचाने की सलाह दी तो पंडित जी बोले, ‘अरे आप चिंता मत कीजिए मुझे तो मेरा प्रभु बचाएगा, देखना अभी थोड़ी ही देर में पानी उतर जाएगा।’ और पंडित जी अपनी पूजा-पाठ में व्यस्त हो गए।

धीरे-धीर पानी का स्तर बढ़ते हुए पंडित जी के घर के अंदर तक आगया। अब सरकार द्वारा लोगों को बचाने के लिए गाँव में नाव भेजी गई। एक नाविक लोगों की जान बचाते हुए पंडित जी के घर के सामने से निकला। उसने पंडित जी को जब पानी के बीच फँसे हुए देखा तो उन्हें नाव में बैठने की सलाह दी लेकिन पंडित जी ने मानने से इनकार कर दिया और कहा, ‘तुम बाक़ी सभी लोगों की जान बचाओ, मुझे तो मेरा भगवान बचाएगा।’ नाव वाले ने काफ़ी प्रयास करा लेकिन पंडित जी ज़रा भी सुनने के लिए राज़ी नहीं थे।

नाव वाला आगे बढ़ गया और इधर पंडित जी अपनी पूजा का सभी सामान लेकर घर की छत पर चढ़ गए और अगरबत्ती वगिरह जलाकर पूजा करने लगे। इधर बाढ़ विकराल होती जा रही थी, उसका पानी बढ़ते-बढ़ते पंडित जी की छत तक आ गया और पंडित जी अपनी कमर तक उसमें डूब गए। तभी वहाँ एक हेलिकॉप्टर आया और पंडित जी के सामने रस्सी की सीढ़ी लटकाई और उससे चढ़कर ऊपर आने का आग्रह करने लगा। लेकिन पंडित जी एक बार फिर हठ पकड़कर बैठ गए और बोले, ‘मैं इस रस्सी के सहारे ऊपर नहीं आऊँगा, जिस तरह प्रभु ने मुझे अभी तक बचा रखा है उसी तरह वे आगे भी मेरी जान बचाएँगे।

बचाव दल उनके सामने मिन्नतें कर रहा था लेकिन पंडित जी कुछ मानने को राज़ी ही नहीं थे। हेलिकॉप्टर के बचाव दल ने बाढ़ में फँसे दूसरे लोगों की जान बचाने लिए वहाँ से आगे जाने का निर्णय लिया। उनके जाते ही बाढ़ के तेज़ वेग में पंडित जी का मकान बह गया और पंडित जी की भी जान चली गयी।

मरने के बाद पंडित जी स्वर्ग में अपनी आँखों के सामने प्रभु को देखते ही बोले, ‘हे प्रभु मैंने अपनी पूरी श्रद्धा, क्षमता और लगन के साथ आपकी पूजा-अर्चना की, तपस्या करी। आप पर पूरा भरोसा किया, उसके बाद भी जब मैं बाढ़ के पानी में फँस गया था, जब उसमें डूब रहा था तब आप मुझे बचाने क्यूँ नहीं आए?  प्रभु मैं आपकी इस लीला को समझ नहीं पाया।’

हल्की मुस्कुराहट और शांत भाव के साथ प्रभु बोले, ‘मैं तुम्हारी रक्षा करने एक बार नहीं कई बार आया, पर तुम खुद ही मेरे साथ चलने के लिए तैयार नहीं थे।’ प्रभु का जवाब सुनते ही पंडित जी बोले, ‘वह कैसे प्रभु? मैं समझ नहीं पाया।’ प्रभु बोले, ‘देखो पहली बार मैं ग्रामीणों के रूप में, उसके बाद पड़ोसी के रूप में, फिर नाविक और अंत में बचाव दल के रुप में तुम्हारी जान बचाने के लिए आया लेकिन तुम उन अवसरों को पहचान ही नहीं पाए। अब बताओं इसमें मेरी क्या गलती है।

कहानी पूरी करने के बाद मैंने व्यापारी से कहा एक बाद याद रखना वास्तु, कुंडली, क़िस्मत आदि भी तब कार्य करेंगे जब तुम कार्य करोगे। व्यापार दुकान पर बैठने से नहीं बल्कि आगे रहकर लोगों की बदलती आवश्यकताओं, ज़रूरतों, समस्याओं को पहचानकर उनका समाधान उपलब्ध करवाने से बढ़ता है। उनका जीवन आसान बनाने से बढ़ता है।

जी हाँ दोस्तों, ईश्वर ने हम सभी के लिए समान अवसर बनाए हैं बस कई बार हम सतर्क नहीं रह पाते हैं कि सामने से गुजरते हुए मौक़ों को पहचान पाएँ। अगर आप वर्तमान में रहना सीख लें तो आप अवसर को पहचानकर अपनी क़िस्मत लिखना सीख जाएँगे।

-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर
dreamsachieverspune@gmail.com

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