दैनिक भास्कर - मैनजमेंट फ़ंडा    
एन. रघुरामन, मैनजमेंट गुरु 

बच्चों को भी पेशेवर बनना सिखा सकते हैं

बच्चों को भी पेशेवर बनना सिखा सकते हैं
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Oct 20, 2021

बच्चों को भी पेशेवर बनना सिखा सकते हैं


कल्पना कीजिए, आपकी पत्नी ऑफिस में है, काम वाली छुट्‌टी पर है और तीन वर्षीय बच्ची को संभालने की जिम्मेदारी आप पर है क्योंकि आप घर से काम कर रहे हैं। लेकिन बॉस ने आपको अर्जेंट प्रोजेक्ट दिया है, जिसे 3 बजे तक पूरा करना है और आप लैपटॉप पर व्यस्त हैं।


आपकी एक नजर बच्ची पर है, जो खिलौने वाले किचन सेट से खेलते हुए कुछ पीने के लिए बना रही है। वह रसोई की ओर जाकर पानी लाती है। आप खुश हैं कि वह आपको परेशान नहीं कर रही। अचानक वह आपको छोटे से कप में कुछ पीने देती है, जिसमें दो चम्मच पानी भी नहीं बनता। आप चुपचाप वह पानी पी लेते हैं और सराहना करने के लिए कहते हैं, ‘आपकी चाय तो बहुत बढ़िया है, मम्मी से भी अच्छी।’ बच्ची फिर खेल में लग जाती है और थोड़ी देर बाद एक और कप पानी लाती है। आप फिर उसकी सराहना करते हुए पी लेते हैं। खेल चलता रहता है। जब तक आपकी पत्नी लौटती है, आप सात कप पी चुके हैं।


बच्ची मां से कहती है कि उसने घर का अच्छे से काम किया और पिता को खिलाया-पिलाया। पत्नी उसका माथा चूमते हुए कहती हैं, ‘वाह, शाबाश मेरी बच्ची।’ फिर कहती है, ‘अच्छा एक कप मम्मी के लिए भी बना दो, मैं मुंह धोकर आती हूं।’ पत्नी बाथरूम में जाती है तो आपको चीख सुनाई पड़ती है। आप लैपटॉप रखकर दौड़ते हैं। पत्नी कहती है, ‘क्या तुम्हें अंदाजा है कि घर में इतनी छोटी बच्ची पानी कहां से ला सकती है?’ आप चुप रहते हैं। वह चीखती है, ‘टॉयलेट से! तुम एक घंटे से टॉयलेट का पानी पी रहे हो।’ आप हैरान खड़े रहते हैं!


बहुत पहले जब 1999 के अंत में आईटी उद्योग तेजी से बढ़ रहा था, मैंने सुना था कि मेरे एक दोस्त के साथ ऐसा हुआ। मुझे यह कल याद आया, जब मैंने वर्ल्ड फूड डे (अक्टूबर 16) पर आई एक घंटे लंबी डॉक्यूमेंट्री देखी, जो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी।

‘नवारीवु’ नाम की मलयालम डॉक्यूमेंट्री में 20 व्यंजन थे, जिनमें मूंगदाल डोसा, कठहल अडा, ड्रमस्टिक-चावल की सब्जी, गुड़हल (जवाकुसुम) की चाय और कद्दू के पत्तों का थोरन शामिल थे। दिलचस्प है कि दूसरी से दसवीं कक्षा तक के छात्रों ने इन पुराने व्यंजनों को बनाने में हिस्सा लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य छात्रों को घर में व्यस्त रखना था क्योंकि स्कूल नहीं खुले थे। उन्हें पहले अपने दादा-दादी/नाना-नानी से चुना गया व्यंजन बनाना सीखने और फिर पकाते हुए वीडियो बनाने कहा गया। कुछ ने शेफ के कॉस्ट्यूम पहनकर पेशेवर कुकरी शो जैसे वीडियो भी बनाए। हर छात्र को चार मिनट का समय दिया गया। इन वीडियो को एक संस्थान में भेजा गया, जिसने इन्हें एडिट किया और कमेंट्री से रोचक बनाया। बच्चों द्वारा भूले-बिसरे व्यंजनों को फिर बनाने की इस गतिविधि को इस हफ्ते केरल सरकार और सेलिब्रिटी शेफ्स ने भी सराहा।


जब आप बच्चों को किसी गतिविधि की स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (मानक परिचालन प्रक्रिया) सिखाते हैं, तो बेशक उनका प्रदर्शन बेहतर होता है और समय के साथ वे अपनी पसंद के क्षेत्र में पेशेवर बनकर उभरते हैं। दरअसल पेशेवर होने से वह निपुणता (पर्फेक्शन) आती है, जिसकी तलाश बाहरी दुनिया को होती है।


फंडा यह है कि पेशेवर दक्षता कोई सिद्धांत नहीं है, यह जीने और रोजमर्रा के कार्यों को करने का तरीका है। यहां तक कि बच्चों के गेम भी पेशेवर हो सकते हैं। इसे उनका बचपन छीनना न समझें।

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