दैनिक भास्कर - मैनजमेंट फ़ंडा    
एन. रघुरामन, मैनजमेंट गुरु 

बाहर निकलने से अंदर की बात पता चलती है

बाहर निकलने से अंदर की बात पता चलती है
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June 26, 2021

बाहर निकलने से अंदर की बात पता चलती है


इस हफ्ते मैं नागपुर में मेरे स्कूल की एक सहपाठी के घर सुबह 6.30 बजे कॉफी पीने के लिए पहुंचा। स्वाभाविक है कि पहले से बताकर गया था। नागपुर एयरपोर्ट से मैं सीधे उसके घर पहुंचा। मैं उससे मिलना चाहता था क्योंकि हाल ही में उसने हार्ट अटैक की वजह से अपने पति को खोया था। मुझे उसके लिए बुरा लगा क्योंकि महामारी से पहले ही उसने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी, ताकि अपने रिटायर पति के साथ दुनिया घूमते हुए अच्छा वक्त बिता सके। लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था।


उस सुबह पक्षी चहक रहे थे और कुछ आवारा कुत्ते मुझे ऐसे देख रहे थे, जैसे कह रहे हों, ‘ये नींद खराब कौन कर रहा है?’ मैं उसका घर तलाश रहा था। नए बंगलों से शहर बदल गया था। अपने स्कूल के दिनों के बाद, मैं 45 साल बाद वहां पहुंचा था। मैंने एक बंगले के गेट पर खड़े दूधवाले को देखा जो इत्मिनान से साइकिल की घंटी बजा रहा था। कार में बैठे-बैठे मैंने उससे पता पूछा। जवाब देने की बजाय उसने मेरा स्वागत करते हुए कहा, ‘आइए, आप ही का इंतजार था।’ पहले मुझे लगा कि वह तंज कर रहा है। मुझे गुस्सा आया क्योंकि मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दूधवाला सड़क पर मेरा यूं स्वागत करेगा। जब मैंने जोर देकर कहा, ‘भाईसाहब मैं पता पूछ रहा हूं’ तो उसने हाथ से रुकने का इशारा करते हुए कहा, ‘हां, समझ गया। यही वो घर है। मुझे पता है आज आप कॉफी पीने आए हैं।’


मैं हक्का-बक्का रह गया कि दूधवाले को मेरे आने के बारे में कैसे पता है। जब तक मैं खुद को संभालता, मेरी दोस्त मेन गेट पर आ गई। दूधवाला जोर से बोला, ‘आपके दोस्त आ गए, एक्स्ट्रा दूध डाल दिया है।’ और मेरी तरफ देखकर बोला, ‘आते रहिएगा, मैडम अकेली रहती हैं।’ उन शब्दों से उसने मैडम के प्रति अपनी चिंता व्यक्त की, जिसके दोनों बेटे नागपुर से दूर काम करते हैं। उन शब्दों से मुझे अहसास हुआ कि वह अलग व्यक्ति था।


दरअसल, जबसे मेरी दोस्त के पति गुजरे थे, तबसे दूधवाला गेट के पीछे बंधे थैले में दूध के पैकेट डालकर यूं ही नहीं चला जाता। बल्कि तब तक रुकता है, जब तक मेरी दोस्त पैकेट ले नहीं जाती। ऐसा इसलिए क्योंकि वह अकेली थी और दूधवाला हर सुबह सुनिश्चित करता था कि मैडम ठीक हैं। अगर उसे दरवाजा खोलने में समय लगता है तो दूधवाला बाकी घरों में दूध देकर, लौटते वक्त देखता है कि मैडम ने पैकेट उठाए या नहीं। मेरी दोस्त ने उसे एक रात पहले मेरे आने की जानकारी देकर अतिरिक्त दूध देने कहा था।

मैं दक्षिण के अपने घर में एक दूधवाले को जानता हूं, जिसने जिंदगी बचाई थी। जब देर तक घंटी बजाने पर कोई नहीं आया तो उसने पड़ोसी की मदद से दरवाजा खोला, जिसके पास एक और चाबी थी और समय पर वहां रह रहे बुजुर्ग को हॉस्पिटल लेकर गया।

दूधवाले, डाकिया, सब्जी वाले आदि, आपके दरवाजे पर रोज आने वाले ये लोग सिर्फ काम निपटाने नहीं आते। वे समुदाय को जोड़कर लोगों का हित करने वाले लोग हैं।


फंडा यह है कि बहुत कम लोग खुशकिस्मत होते हैं, जिन्हें इंसानों से संपर्क करने वाला काम मिलता है।  बीच-बीच में उनका हाल-चाल पूछते रहिए क्योंकि वे वाकई चाहते हैं कि आप सुरक्षित रहें।

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