अकूत संपत्ति का रहस्य…

Oct 19, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आज मैं आप सभी को धन के विषय में एक मजेदार बात बताता हूँ। आपने देखा होगा दुनिया के सबसे अमीर लोग अपने जीवन का आधा हिस्सा धन जुटाने में और बाकी आधा हिस्सा उसे बाँटने में बिताते हैं। याने इंसान अपने जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से में अर्जित की गई अरबों की संपत्ति दान कर देता है। क्या आपको यह विरोधाभासी नहीं लगता? या आपने इस विषय में कभी सोचा है, वो ऐसा क्यों करता है? दरअसल वह यह नहीं जानता है कि सच्ची संपत्ति का रहस्य “अधिक पाने” में नहीं, बल्कि कम चाहने और दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने में छिपा है।
दोस्तों, हम सब भी जीवन में पैसा, सम्मान, प्रेम, सुरक्षा या सफलता जैसी किसी न किसी चीज़ के पीछे भाग रहे हैं और जैसे-जैसे यह हमें मिलता जाता है, वैसे-वैसे हमारी चाहत बढ़ती जाती है और जितनी चाहत बढ़ती है, उतनी ही ज़्यादा अशांति हमारे भीतर बढ़ती जाती है। थोड़ा और स्पष्ट कहूँ तो हर चाह, हर इच्छा हमें अपने भीतर अपूर्ण महसूस कराती है। बीतते समय के साथ हम सोचने लगते हैं, “थोड़ा और मिल जाए, तो मैं खुश हो जाऊँगा।” पर वह “थोड़ा और” कभी ख़त्म नहीं होता। दोस्तों, यही वह जाल है, जिसमें हम जीवनभर उलझे रहते हैं।
एक हिंदी फ़िल्म में इसकी महत्ता को बताते हुए कहा था, “मेरे ज़मीर में दम है क्योंकि मेरी चाहत कम है!” वैसे मेरा मानना है, “जिसे कम की जरूरत होती है, वही सबसे अमीर होता है।” एक बात और, जिसे कुछ चाहिए ही नहीं, उससे कोई कुछ छीन भी नहीं सकता। वह भीतर से स्वतंत्र है। वह जीवन को पाने नहीं, जीने के लिए जीता है।
दोस्तों, जब हम अपनी ज़रूरतों को कम करते हैं, तब हमारे भीतर एक नया संतोष का प्रकाश जल उठता है। वह प्रकाश हमें सिखाता है कि असली समृद्धि मन की अवस्था है, जेब की नहीं। याद रखियेगा, जब हम ईश्वर पर विश्वास और स्वयं पर भरोसा रखते हैं, तब जीवन में किसी चीज की कमी नहीं रहती है। दोस्तों, बात गहरी है क्योंकि जब हम विश्वास और आस्था से भरे होते हैं, तब हमारी इच्छाएँ अपने आप शांत हो जाती हैं। फिर हमें जीवन का सौंदर्य वस्तुओं में नहीं, भावनाओं में नजर आता है और फिर हमें इस बात का एहसास होता है कि हमारे पास जो भी है, वह पर्याप्त है।
दोस्तों, लेकिन हमारा समाज अक्सर इस मान्यता के विरुद्ध चलता है। वह उन्हें ही धनवान मानता है, जिनके पास बहुत सारा पैसा होता है। पर इतिहास इस बात का भी गवाह है कि जीवन में सबसे ज्यादा सुख उन लोगों को मिला है, जिन्होंने देना सीखा है। वे जानते हैं कि धन बाँटने से घटता नहीं, बढ़ता है। प्रेम बाँटने से कम नहीं होता, बल्कि और गहरा हो जाता है।
दोस्तों, सच्ची संपन्नता तब आती है जब हम यह समझते हैं कि “जीवन का उद्देश्य संग्रह नहीं, सेवा है।” जब हमारे भीतर कृतज्ञता और निस्वार्थता का भाव होता है, तो ईश्वर का अनुग्रह हमारे चारों ओर एक ऐसा वातावरण बना देता है जहाँ लोभ, भय और स्वार्थ स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
धनतेरस से भाईदूज तक चलने वाले दीपावली के इस महापर्व पर आप यदि सच में अमीर बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले यह जानिए और सीखिए कि वास्तव में आपको किसकी जरूरत है और साथ ही समझने का प्रयास कीजिए कि क्या आप बिना किसी चाह के भी मुस्कुरा सकते हैं? दोस्तों, इसके बिना आपका अकूत संपत्ति का मालिक बनना संभव नहीं है क्योंकि जिसे कम की आवश्यकता है, वही अनमोल संपत्ति का स्वामी है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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