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अच्छी संगत से बनाएँ सुनहरा भविष्य…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jan 12, 2024
  • 1 min read

Jan 12, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

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आईए दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत एक कहानी से करते हैं। राजपुर गाँव में नंदराम सेठ रहा करते थे। जिन्हें लोग प्यार से नंदू सेठ कह कर बुलाया करते थे। एक बार नंदू सेठ मेला घूमने गए, वहाँ उन्हें १२-१३ साल का भोला नाम का एक अनाथ बच्चा भीख माँगता हुआ दिखा। जब नंदू सेठ ने भोला से बात करी, तो उन्हें पता चला कि उसके माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों का देहांत एक एक्सीडेंट में हो गया था और अब इस दुनिया में उसका कोई है ही नहीं। नंदू सेठ उस अनाथ को अपने साथ ले आए, अब वह बच्चा नंदू सेठ के यहाँ ही रहने लगा और रोज़मर्रा के कामों में हाथ बँटाने लगा। जैसे, गाय-बछड़ों को चराने ले जाना, बाज़ार से सामान लाना, खेत और घर का ध्यान रखना आदि। इसके एवज़ में उसे रहने-खाने की सुविधा और हाथ खर्च के लिए कुछ पैसे मिल जाया करते थे।


एक दिन दोपहर में खेत से थक-हार कर भोला घर पहुँचा और घर की नौकरानी से विनम्रता पूर्वक भोजन देने का निवेदन करने लगा। नौकरानी ने आलस वश भोला को ठंडी-बासी रोटियाँ खाने के लिए दे दीं। थके हारे भोला ने उससे निवेदन किया कि अगर साथ में छाछ, दही या राबड़ी मिल जाये तो अच्छा रहेगा। भोला की बात सुनते ही नौकरानी चिढ़ते हुए बोली, ‘तू कब से इतना लाट साहब हो गया है कि तुझे खाने के लिए मैं राबड़ी बना कर दूँ? चुपचाप जो मिला है उसे खाले और नहीं खाना हो तो भाग यहाँ से। मैं यहाँ तेरे नखरे उठाने के लिए काम नहीं करती हूँ।’


भोला को नौकरानी की बात का बहुत बुरा लगा, उसने रोज़-रोज़ तिरस्कार सहने के स्थान पर घर छोड़ने का निर्णय लिया और उसी पल वहाँ से चला गया। कुछ देर पश्चात, जब वह गाँव के बाहरी जंगली इलाक़े से गुजर रहा था तब उसे संतों की मंडली मिल गई। संतों ने पहले तो भोला को भोजन करवाया फिर उससे बातें करने लगे। भोला को संतों के साथ इतना अच्छा लगा कि उसने संतों के साथ ही जीवन गुज़ारने का निर्णय ले लिया और उन्हें अपने मन की बात बता दी। संत भोला को अपने साथ काशी ले आए और उसका दाख़िला एक गुरुकुल में करवा दिया।


गुरुकुल से अच्छे से शिक्षा पूर्ण कर भोला जल्द ही विद्वान बन गया। उसके ज्ञान को देख संतों ने उसे भी अपना जीवन संत के भाँति समाज सेवा में लगाने के लिए राज़ी कर लिया। कुछ ही सालों में अपनी मेहनत और ज्ञान के बल पर भोला महामण्डलेश्वर बन गया और उसे भोला स्वामी के नाम से जाना जाने लगा। एक दिन महामण्डलेश्वर भोला स्वामी को उसी शहर में प्रवचन देने के लिए आमंत्रित किया गया जहाँ वह बचपन में नंदू सेठ के यहाँ काम किया करता था। हालाँकि नंदू सेठ अब काफ़ी बूढ़े हो गए थे लेकिन उसके बाद भी भोला स्वामी का सत्संग सुनने के लिए प्रवचन पांडाल में आए।


उस दिन का प्रवचन सुन नंदू सेठ सहित वहाँ मौजूद सभी लोग एकदम मंत्रमुग्ध हो गए। प्रवचन के पश्चात नंदू सेठ भोला स्वामी के पास पहुँचे और उनसे प्रार्थना करने लगे कि स्वामी जी एक बार हमारी कुटिया में पधारो जिससे वह पवित्र हो जाए। भोला स्वामी ने नंदू सेठ का निमंत्रण स्वीकार कर लिया और तय समय पर उनके यहाँ पहुँच गए। सामान्य धर्म आधारित चर्चा के पश्चात नंदू सेठ ने भोला स्वामी के साथ पधारे सभी संतों के लिए भोजन का प्रबंध किया। फिर भोला स्वामी सहित अन्य संतों के सामने एक तख़्त लगाकर तरह-तरह के पकवान रखे। उसके पश्चात सभी संतों ने भोजन मंत्र का पाठ किया और फिर भोजन रूपी प्रसाद खाना शुरू कर दिया।


भोजन के अंत में नंदू सेठ अपनी उसी नौकरानी के साथ बादाम का हलवा लेकर आए और मनुहार कर-कर के भोला स्वामी और अन्य संतों को देने लगे। उन्हें ऐसा करते देख भोला स्वामी ज़ोर से हंसने लगे। नंदू सेठ के लिए भोला स्वामी का इस तरह हँसना किसी आश्चर्य से कम नहीं था। वे हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और भोला स्वामी से पूछने लगे कि मुझसे कोई गलती तो नहीं हो गई है? नंदू स्वामी एकदम गंभीर मुद्रा में आ गए और फिर बड़े ही संयमित शब्दों में बोले, ‘सेठ, आपके घर पर एक बच्चा नौकर के रूप में कार्य किया करता था। आजकल वह कहाँ है?’ नंदू सेठ आश्चर्य मिश्रित स्वर में बोले, ‘स्वामी, वह तो सालों पहले एक दिन अचानक घर छोड़ कर चला गया था। लेकिन आप उसे कैसे जानते हैं?’ भोला स्वामी हल्की मुस्कुराहट के साथ बोले, ‘सेठ मैं ही वह लड़का हूँ। इसी घर में एक दिन खाना खाते समय राबड़ी माँगने पर भोजन पकाने वाली सहायिका द्वारा मुझे अपनी स्थिति का भान करवाते हुए, राबड़ी देने से इनकार कर दिया था। इसलिए मैं यहाँ से रुष्ट होकर चला गया था। रास्ते मैं मुझे संत मंडली मिल गई। बस उनके साथ ने मुझसे समय के साथ शिक्षित और ज्ञानी बना दिया गया और आज मैं महामण्डलेश्वर बन गया। मैं भी वही हूँ, आप भी वही है, घर-आँगन भी वही है। उस दिन भूखा होने पर भी मुझे भोजन नहीं मिल पाया और आज भूख ना होने पर भी आप मुझे और हलवा खाने के लिए मनुहार कर रहे हैं। संतों की शरण लेने मात्र से इतना परिवर्तन आ गया है। बस यही याद करके मैं हंस रहा था।’


दोस्तों, भोला स्वामी द्वारा कही गई बात सुनने में तो एकदम साधारण सी थी लेकिन अगर आप उसपर गंभीरता पूर्वक विचार करेंगे तो उसमें छिपे जीवन को बदल देने वाले संदेश को पहचान पाएँगे कि संगत को देख ही रंगत बदलती है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो आप आज किन लोगों के बीच में अपना समय बिता रहे हैं यह ही तय करेगा कि आपका भविष्य कैसा होगा। एक बार विचार कर देखियेगा ज़रूर।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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