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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

अच्छे से निभाएँ अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी…

Nov 23, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

आइए दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत एक क़िस्से से करते हैं। बात कई साल पुरानी है, एक राज्य में महामारी फेल गई। राजा ने महामारी से बचाव के लिए अपनी ओर से कई जतन किए, लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ और लोग मरते रहे। एक दिन राजा ने इससे बचाव के रास्ते जानने के लिए अपने मंत्रियों के साथ मंत्रणा करी। मंत्रणा के दौरान एक मंत्री बोला, ‘महाराज, गुस्ताखी माफ़ कीजियेगा, मेरी नज़र में आप अपनी ओर से पूरा प्रयास कर चुके हैं। हम सब लोगों ने अपने-अपने तरीक़े से इससे बचाव का प्रयास करा, लेकिन हम में से कोई भी अभी तक सफल नहीं हुआ है। ऐसे में मेरा सुझाव है कि हमें ईश्वर की शरण में जाना चाहिये और हमारे राज पुरोहित और गुरुजी से इससे बचने का रास्ता पूछना चाहिए।


राजा को मंत्री का सुझाव पसंद आया और वे उसी दिन राज पुरोहित और राज गुरु से मिलने पहुँच गए। राज गुरु ने सारी स्थिति को सुनने के बाद राजा को सुझाव दिया कि अगर अमावस की रात को सभी गाँव वाले एक बड़े पतीले में एक-एक लोटा दूध डालेंगे और उस दूध से अगर आप भगवान शिव का अभिषेक करेंगे तो उसी दिन महामारी ख़त्म हो जाएगी। राज ने अमावस के पहले राज्य के बीच में एक बड़ा पतीला रखवा दिया और राज्य के सभी लोगों को अमावस की रात, उसमें एक-एक लोटा दूध डालने का आदेश दे दिया।


अमावस की रात जब सब लोग अंधेरे में रखे उस बड़े पतीले में दूध डाल रहे थे, तभी उसी राज्य में रहने वाली एक लालची औरत ने सोचा, अगर में पतीले में एक लोटा पानी डाल दूँ तो किसी को क्या पता चलेगा। विचार आते ही कंजूस औरत ने ऐसा ही किया। अगले दिन सुबह राजा जब अपने सैनिकों के साथ पतीले का दूध शिव मंदिर में चढ़ाने के लिए गए तो यह देख हैरान रह गए कि पूरे पतीले में सिर्फ़ पानी ही पानी भरा हुआ है। राजा ने जब इस विषय में पता करा कि ऐसा क्यों हुआ तो पता चला कि जो विचार उस औरत के मन में आया था, वही विचार पूरे राज्य के लोगों के मन में आ गया और किसी ने भी पतीले में दूध नहीं डाला।


दोस्तों, उक्त कहानी मुझे उस वक़्त याद आई जब मेरे एक परिचित ने अपनी आदतानुसार पूरी सरकार, सिस्टम और सरकारी कर्मचारियों को अपने एक छोटे से कार्य के ना हो पाने के कारण, निकम्मा बताते हुए कोसते हुए कहा, ‘इन सब को तो नौकरी से निकाल देना चाहिए।’ मैंने उन्हें शांत करते हुए पूछा, ‘आप किसकी बात कर रहे हैं?’ तो वे उसी लहजे में एक सरकारी विभाग का नाम लेते हुए बोले, ‘पिछले तीन माह से एक छोटे से कार्य के लिए इनके चक्कर खा रहा हूँ। कभी कोई छुट्टी पर चला जाता है, तो कभी इनके पास कोई नया बहाना आ जाता है। साले, सब के सब मक्कार हैं। इनको तो बस हराम की कमाई चाहिए।’


दोस्तों, जैसा उपरोक्त परिचित के साथ हुआ, ऐसा ही हमने अपने या अपनों के साथ होते हुए देखा है या इस विषय में लोगों की बातों को सुना है। याने जिस भी कार्य को बहुत सारे लोगों को मिलकर करना होता है, उसमें अक्सर लोग अपनी ज़िम्मेदारियों से यह सोच कर पीछे हट जाते हैं कि ‘मैं इसे नहीं भी करूँगा तो कौन सा तूफ़ान आ जाएगा।’, या फिर यह सोचने लगते हैं कि ‘मैं नहीं करूँगा तो भी इसे कोई ना कोई तो कर ही देगा।’ और अक्सर इसी सोच की वजह से स्थितियाँ वैसी ही बनी रहती हैं।


वैसे उपरोक्त शिकायत करने वाले मेरे परिचित जो स्वयं भी एक सरकारी क्षेत्र के उपक्रम में काम करते हैं, इसी नज़रिए के साथ अपनी ज़िम्मेदारियों को पूर्ण करते हैं। दोस्तों, इस समस्या से निजात पाने का एक ही उपाय है दूसरों की परवाह किये बिना अपने हिस्से की जिम्मेदारी अच्छे से निभाना। अगर इसी तरह का परिवर्तन हम सब अपने नज़रिए में लाने लगें तो पूरे देश में ऐसा बदलाव आ सकता है, जिसकी हमें आज ज़रूरत है…


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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