• Nirmal Bhatnagar

अति सर्वत्र वर्जयेत् !!!

July 12, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, ज़रूरत से ज़्यादा घमंड, अहंकार, अभिमान जैसे भावों का होना अक्सर आपको नुक़सान ही पहुँचाता है। जी हाँ, अपनी किसी विशेषता, उपलब्धि अथवा योग्यता पर गर्व होना, एक बात है। लेकिन यह विशेषता सिर्फ़ मुझमें है, का भाव हर पल अपने मन में रखना, उसका प्रदर्शन अपने व्यवहार से करने को कहीं से भी सही नहीं ठहराया जा सकता। वैसे किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा इसे सही या ग़लत ठहराने से कोई फ़र्क़ भी नहीं पड़ता है क्यूँकि इस भाव की अधिकता हर हाल में आपको नुक़सान पहुँचाने ही वाली है। चलिए इसे मैं आपको सूर्य और पवन की एक बोध कथा से समझाने का प्रयास करता हूँ।


एक बार सूर्य और हवा दोनों आपस में बहस कर बैठे कि दोनों में से कौन शक्तिशाली है। सूर्य का मानना था कि हम दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में बेहतर और शक्तिशाली हैं। लेकिन हवा अर्थात् वायु, जो पहले से ही ज़िद्दी और घमंडी स्वभाव की थी, मानने के लिए राज़ी ही नहीं थी। उसका मानना था कि मुझसे ज़्यादा कोई और शक्तिशाली हो ही नहीं सकता है क्यूँकि अगर मैं चाहूँ तो अपने वेग से बड़े-बड़े पेड़ों को गिरा सकती हूँ। पेड़ों पर मौजूद आर्द्रता, नदियों और झीलों के पानी को भी जमा सकती हूँ। कुल मिला कर कहूँ तो अपने झोंके से में किसी को भी हिला सकती हूँ तुम्हें बादलों के पीछे छिपने को मजबूर कर सकती हूँ।’


सूर्य ने हवा की बात को मानने से इनकार करते हुए पहले तो अपनी बात दोहराई और बोला, ‘देखो कभी भी अपने पर घमंड नहीं करना चाहिए।’ सूर्य अपनी बात पूर्ण कर पाता उससे पहले ही हवा चिढ़ गई और बोली, ‘देखो, मैं तुमसे ज़्यादा शक्तिशाली हूँ। मैं चाहूँ तो कुछ भी कर सकती हूँ।’ हवा की दम्भ भारी बात सुनकर सूर्य थोड़ा चिढ़ गया और उसे चुनौती देते हुए बोला, ‘देखो हम दोनों में से जो भी सामने से आ रहे उस इंसान को कोट उतारने को मजबूर कर देगा, वह ज़्यादा शक्तिशाली माना जाएगा।’


वायु को सूर्य को चुनौती बहुत आसान लगी। उसे पूरा विश्वास था कि वह उसके तेज़ वेग से इंसान का कोट उतरवा देगी। वायु ने तुरंत सूर्य से कहा, ‘मुझे तुम्हारी चुनौती मंज़ूर है। पहले मैं अपनी ओर से प्रयास करती हूँ, तब तक तुम बादलों के पीछे छुप जाओ।’ इतना कह कर वायु ने धीमी गति से बहना शुरू कर दिया। लेकिन इसका असर उस इंसान पर बिलकुल भी नहीं पड़ा। हवा को लगा कि अब उसे अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना ही पड़ेगा और उसने तेज़ गति से बहना शुरू कर दिया।


हवा तेज़ होने से उस इंसान को सर्दी लगने लगी उसने अपने कोट को अपने शरीर पर कस कर अच्छे से लपेट लिया। हवा बहुत देर तक प्रयास करती रही, लेकिन उसे कोट उतरवाने में सफलता नहीं मिली। अंत में उसने हार मानते हुए अपनी गति को धीमा कर लिया और सूर्य की ओर देखते हुए बोली, ‘चलो अब तुम्हारी बारी है, स्वयं को शक्तिशाली सिद्ध करके दिखाओ।’


हवा से इशारा पाते ही सूर्य बादलों के पीछे से निकाला और हल्की धूप के साथ चमकने लगा। धूप लगते ही उस इंसान के शरीर में गरमाहट आयी और उसने कोट को ढीला छोड़ दिया। कुछ पलों बाद ही सूर्य ने अपने तेज़ को और बढ़ा दिया जिससे मौसम का तापमान तेज़ी से बढ़ने लगा और उसकी वजह से उस इंसान को गर्मी लगने लगी। थोड़ी ही देर में वह शख़्स गर्मी और पसीने से परेशान होने लगा और उसने अपने कोट को उतार दिया।


जब हवा ने इस घटना को देखा तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने सूर्य के समक्ष हार को स्वीकार कर लिया। हवा को पश्चाताप करते देख, सूर्य पूरी नम्रता के साथ बोला, ‘बहन, इतनी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। हम दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में विशेष हैं। हमें अपनी विशेषता पर गर्व होना चाहिए लेकिन अगर यह गर्व घमंड में बदल जाए, तो हर हाल में नुक़सानदायी रहता है।’ सूर्य की बात सही भी है दोस्तों, खुद की योग्यता पर घमंड, अहंकार या अति में अभिमान होना अंततः हार का कारण ही बनता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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