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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

अध्यात्म है सही…

Jan 22, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


जय श्री राम दोस्तों, अगर आप अपनी संस्कृति से जुड़े रहना चाहते हैं, तो अपने गर्वीले इतिहास को याद करते रहिए। जी हाँ दोस्तों, गर्व का भाव हमें ना सिर्फ़ हमारी जड़ों से जोड़ता है बल्कि हमें गर्व आधारित जीवन जीने का मौक़ा भी देता है। वैसे दोस्तों, अगर आप मुझसे मेरे मन की बात पूछेंगे तो मैं कहूँगा कि शर्म आधारित राष्ट्रवाद के स्थान पर अगर आप गर्व आधारित राष्ट्रवाद खड़ा करना चाहते हैं तो भी गर्वीले इतिहास को याद कर उससे प्रेरणा लेना शुरू कर दीजिए। दोस्तों, आज हम सभी ऐसी ही एक घटना के साक्षी बनने जा रहे हैं। इसलिए सर्वप्रथम तो आप सभी को राम मंदिर बनने की हार्दिक शुभकामनाएँ।

आप भी सोच रहे होंगे कि आज मैंने इस लहजे में कैसे इस लेख की शुरुआत की है तो मैं आपको बता दूँ कि अध्यात्म के बिना हमारे देश भारत की कल्पना भी अधूरी है। इसीलिए अध्यात्म को भारत की महानतम संपत्ति या उसकी रीढ़ की हड्डी माना जाता है। वैसे अगर आप इसे मानवता की रीढ़ की हड्डी कहें तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि हमारे यहाँ हर इंसान अपना जीवन इसी के आधार पर जीता है। अर्थात् हमारे जीवन की अगणित समस्याओं को हल करने और सुख, शांति व संतुष्टि के साथ जीवन जीने का यही एकमात्र आधार है।


दोस्तों, अगर आप इतिहास को भी उठा कर देखेंगे तो पायेंगे कि जब-जब इंसान ने इसकी उपेक्षा की है तब-तब वह पतन और विनाश की ओर गया है। वैसे अगर आप मेरी बात से सहमत ना हों तो जरा अपने आस-पास ध्यान से देख लीजियेगा आपको दोनों ही तरह की जीवनशैली पर आधारित जीवन जीने वाले लोग मिल जाएँगे। दूसरे शब्दों में कहूँ तो जिसने अध्यात्म आधारित जीवन जिया वह सुखी, संतुष्ट और शांतिपूर्ण जीवन जी रहा है और जिसने इसकी लगातार उपेक्षा करी वह दुख, दारिद्र्य, शोक और संताप का अनुभव करता हुआ जीवन जी रहा है। कुल मिलाकर कहा जाए तो इसकी उपेक्षा कर इंसान अपना जीवन अंधकारमय ही बनाता है।


इसीलिए दोस्तों मेरा मानना है कि अगर आप अपने जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग करना चाहते हैं तो अध्यात्म को अपनाइए क्योंकि यह मानव जीवन के श्रेष्ठतम सदुपयोग की एकमात्र वैज्ञानिक पद्धति है। इसे आप जीवन जीने की विद्या या कला भी मान सकते हैं, जिसके पालन से जीवन के अंतिम उद्देश्य को पाया जा सकता है। अपनी क्षमताओं का अधिकतम उपयोग किया जा सकता है। याद रखियेगा, जिस तरह कोई भी उद्योग नियम, क़ानून और एसओपी का पालन किए बिना चल नहीं सकता है, ठीक उसी तरह ईश्वर प्रदत्त इस सर्वोत्कृष्ट वरदान याने इस जीवन को नियमबद्ध रहकर ही जिया जा सकता है। जी हाँ दोस्तों, अध्यात्म के नियमों पर चलकर ही हम ईश्वर द्वारा दी गई विशेष क्षमताओं को पहचान सकते हैं; उनसे अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं।


शायद आपमें से कुछ लोगों को मेरी बात अतिशयोक्ति पूर्ण लग रही होगी और आप सोच रहे होंगे कि आध्यात्मिकता का हमारे सुखी और संतोष पूर्ण जीवन से क्या लेना देना। तो चलिए अपनी बात को मैं आपको एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ। मान लीजिए, किसी इंसान के पास असीम क्षमता और संसाधन हैं, लेकिन वो उनका उपयोग अस्त-व्यस्त ढंग से बिना नियमों का पालन करे करता है, तो उसके ऐसे कार्य का अंतिम परिणाम क्या होगा? आप कहेंगे निश्चित तौर पर नुक़सानदायक।

अर्थात् अगर यह इंसान नियमबद्ध तरीक़े से अपनी क्षमता और संसाधन का उपयोग करता तो लाभ में रहता। दूसरे शब्दों में कहूँ तो पूर्व में तय पद्धति या प्रणाली का उपयोग कर मनचाहा परिणाम पाया जा सकता है। इसी आधार पर कहा जाए तो ईश्वर द्वारा दिये गये इस मनुष्य रूपी सर्वोत्कृष्ट जीवन को उसके विज्ञान और विधान को जानकर आनंद के साथ जिया जा सकता है। तो आइए साथियों, आज के पावन दिन हम संकल्प लेते हैं कि अपने जीवन को अध्यात्म के नियमों के आधार पर जीकर सफल बनायेंगे।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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