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अपने मूल स्वभाव के साथ जीना…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jun 25, 2023
  • 2 min read

June 27, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, सामान्यत: हममें से ज़्यादातर लोग खुश रहने के लिए अपने जीवन में कोई ना कोई भौतिक लक्ष्य याने एक्सटर्नल गोल रखते हैं। जैसे पद, पैसा, प्रतिष्ठा, प्रॉपर्टी, बैंक बैलेन्स आदि पाना। लेकिन अक्सर आपने देखा होगा लोग, इन्हें पाने के बाद भी अपने मुख्य लक्ष्य, याने, हर हाल में खुश रहना को नहीं पा पाते हैं। इसकी मुख्य वजह आंतरिक लक्ष्यों से पहले बाहरी या भौतिक लक्ष्यों को पाने की चाह रखना है, जो किसी भी हाल में सम्भव नहीं है।


जी हाँ दोस्तों, अगर आपका मुख्य लक्ष्य ‘हर हाल में खुश रहना है’ तो आपको बाहरी लक्ष्यों के पहले अपने अंदर झांक कर आंतरिक लक्ष्यों को एक बार फिर खोजना होगा। आंतरिक लक्ष्य याने हमारी वह विशेषताएँ हैं जो हम जन्म से ही अपने साथ लेकर आते हैं। जैसे, प्यार, मस्ती, शांति, साहस, उल्लास एवं उत्सव के माहौल में रहना, सहानुभूति, समानुभूति, विनम्रता, सत्यता आदि के साथ जीना। लेकिन रोज़मर्रा के जीवन में मिले तमाम अनुभवों के कारण कहीं ना कहीं हम इन्हें भूल जाते हैं और क्रोध, चिड़चिड़ाहट, ज़िद्द, भय, अशांति भरा असामान्य जीवन जीना शुरू कर देते हैं।


सोच कर देखिएगा, अगर उपरोक्त स्थिति के विपरीत हम हमेशा अपने आंतरिक लक्ष्यों याने मूलभूत भावों के साथ होते, तो क्या होता? निश्चित तौर पर हमारे लिए दुनिया से मिले तमाम नकारात्मक अनुभवों के बाद भी खुश रहना सम्भव होता। जिस तरह आप पानी को कितना भी गर्म कर लें वह थोड़ी देर बाद अपने मूल स्वभाव में आकर शीतल हो जाता है। ठीक उसी प्रकार अगर आप अपने आंतरिक भावों के साथ होते हैं तो भौतिक लक्ष्यों को पाने के दौरान मिलने वाले नकारात्मक भावों से डील करना या उसके प्रभाव से मुक्त होकर मूल स्वभाव में लौट आना आसान हो जाता है। जैसे क्रोध, अशांति या भय के बाद भी बोध की वजह से निर्भयता और प्रसन्नता में लौट आना। वैसे भी यही हमारा मूल स्वभाव है।


दोस्तों उपरोक्त बात को याद दिलाने की भी एक प्रमुख वजह है। आज ज़्यादातर लोग भौतिक लक्ष्यों की चाह में कहीं ना कहीं ईश्वर द्वारा दिए गए ऊर्जा पूर्ण जीवन को भूल गए हैं। जिसमें स्वयं की तो छोड़िए हज़ारों लोगों के जीवन को बदलने की शक्ति थी। इस आधार पर कहा जाए तो अपने मूल स्वभाव याने वृत्ति को भूलना ही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी बाधा है। जी हाँ, इसे भूलने के कारण ही हम थोड़ी सी ही विपरीत परिस्थितियों में अपने घुटने टेक देते हैं और नकारात्मक भावों को अपने ऊपर हावी कर लेते हैं।


याद रखिएगा दोस्तों, ग़लत लोगों के साथ, असफलता, विपरीत स्थितियों या किन्ही बातों के प्रभाव में आकार निराश हो जाना, अपनी ऊर्जा खो देना एक संयोग जन्य स्थिति है। ऐसी स्थितियों में आवश्यकता है खुद को स्वयं की शक्तियों और स्वभाव को याद दिलाने की। तो आईए दोस्तों, आज नहीं अभी से ही हम खुद के अंदर मौजूद भावों याने प्यार, मस्ती, शांति, साहस, उल्लास एवं उत्सव के माहौल में रहना हमें सहानुभूति, समानुभूति, विनम्रता, सत्यता आदि की याद दिलाते हैं और हम आनंद , प्रसन्नता, उत्साह, उल्लास और सात्विकता के साथ जीवन जीते हैं क्योंकि यही हमारा मूल स्वभाव और निज स्वरूप है। विचार कीजिएगा!


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर


 
 
 

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