• Nirmal Bhatnagar

अमीर मरने से बेहतर है खुल कर जीना - भाग 2

Sep 10, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, निवेश और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा के विषय में भावनात्मक निर्णय लेना या भावनात्मक निवेश करना कहीं से ठीक नहीं है। इस बात का एहसास अपने क़रीबियों को खोने के बाद मुझे तब हुआ, जब परिवार द्वारा उनके द्वारा किए गए निवेशों पर निर्णय लिए गए। जब मैंने गहराई से इस विषय में सोचा तो मुझे एहसास हुआ की हममें से ज़्यादातर लोग सारी मेहनत अमीर बन कर मरने के लिए कर रहे हैं। मेरी बात को समझने के लिए आप आम भारतीय की जीवनशैली को ध्यान से देखेंगे तो पाएँगे अधिकांश भारतीय अपने पूरे जीवन को तो ग़रीबी में, समझौता करते हुए जीते हैं, लेकिन वे मरते अमीर हैं अर्थात् वे अपनी मृत्यु के बाद अपनी अगली पीढ़ी के लिए पैसे, प्रॉपर्टी या अन्य कई रूप में काफ़ी पूँजी छोड़कर जाते हैं। सोच कर देखिएगा खुद के जीवन को कष्टप्रद बनाकर, भावी पीढ़ी को सुरक्षित करना कितना उचित है। मेरा तो मानना है निवेश का मुख्य उद्देश्य खुद के जीवन को आरामदायक बनाना है। कल हमने पाँच में से दो ऐसे भावनात्मक निवेशों के बारे में चर्चा करी थी जो जीवन के उत्तरार्ध में आम भारतीय के जीवन को कष्टप्रद बनाते हैं। आईए आगे बढ़ने से पहले संक्षेप में उन्हें दोहरा लेते हैं-


1) प्रॉपर्टी में निवेश

बेहतर रिटर्न के साथ सुरक्षित होने की वजह से आम भारतीय सबसे ज़्यादा इसी क्षेत्र में निवेश करता है और वह ना सिर्फ़ खुद के अपितु अपने उन बच्चों के लिए भी बड़ा घर, फार्म या अन्य प्रॉपर्टी बना लेता है जो विदेश या दूसरे राज्यों में जाकर बस गए हैं। अक्सर देखा जाता है की इन लोगों के इस दुनिया से जाने के बाद, ऐसी प्रॉपर्टी को उनके बच्चों द्वारा बेच दिया जाता है। ज़रा सोच कर देखिए, जिनके लिए बड़ी सम्पत्ति बनाई जा रही है क्या उनके पास उसे देखने के लिए समय है? अगर नहीं तो फिर खुद के आज के सुख को क़ुर्बान करके, अपने जीवन को इसके लिए बर्बाद करने से क्या फ़ायदा? मेरा तो मानना है कि सम्पत्ति में उतना निवेश अच्छा है जितने में आप अपना सर छुपा सकें और खुद के जीवन को सुरक्षित बना सकें।


2) गहनों में निवेश

भारतीयों का दूसरा प्रिय निवेश है सोने-चाँदी या अन्य धातुओं के गहनों को लेना। वैसे मैं इसे भावनात्मक निवेश में पहले नम्बर पर रखता हूँ क्यूँकि इसे हम सिर्फ़ अपने ही नहीं बल्कि अपने परिवार के हर सदस्य के जीवन के हर महत्वपूर्ण पड़ाव या पल से जोड़कर रखते हैं। जैसे, जन्म, मुंडन, जन्मदिन, सगाई, शादी आदि। लेकिन अगर आप देखेंगे तो पायेंगे कि नई पीढ़ी का लगाव इन गहनों से भी नहीं है क्यूँकि उन्हें इनकी डिज़ाइन पुराने जमाने की लगती है और दूसरी बात वे रिस्क को देखते हुए नक़ली गहने पहनना ज़्यादा पसंद करते हैं। हालाँकि मैं इस निवेश के ख़िलाफ़ नहीं हूँ पर मेरा मानना है कि हमें इसमें निवेश अपनी भविष्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए, शुद्ध धातु के रूप में करना चाहिए ना की गहनों के रूप में।


चलिए दोस्तों, अब हम अगले दो भावनात्मक निवेश के बारे में समझने का प्रयास करते हैं-


3) बच्चों की उच्च शिक्षा

अक्सर आप देखेंगे की परिवार के वरिष्ठ लोग अपनी ज़रूरतों, अपने शौक़ में सिर्फ़ इसलिए कटौती करते हैं क्यूँकि वे चाहते हैं की उनके बच्चे अच्छी उच्च शिक्षा लेकर अपना भविष्य बेहतर और सुरक्षित बना सकें। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे अपने जीवन के उत्तरार्ध में बड़ा क़र्ज़ ले लेते हैं। हालाँकि उच्च शिक्षा के ऋण को बच्चों को स्वयं चुकाना होता है लेकिन कई मामलों में इसकी ज़िम्मेदारी परिवार के वरिष्ठ लोगों पर ही आ जाती है जो अंततः उनकी रिटायरमेंट प्लानिंग को गड़बड़ा देती है। वैसे कुछ लोग इससे भी आगे जाकर अपने पोते-पोतियों की शिक्षा के लिए भी अपनी पूँजी का निवेश करते हैं। चलो बच्चों की शिक्षा तक तो समझ में आता है लेकिन बच्चों के बच्चों की शिक्षा के लिए निवेश करना क्या उचित है? वो भी तब जब बच्चे स्वयं अपने बच्चों की शिक्षा के लिए एस॰आई॰पी॰ आदि में निवेश करना शुरू कर चुके हैं।


4) जीवन बीमा में निवेश

जीवन बीमा को निवेश मान कर अपनी बचत के बड़े हिस्से का इसमें निवेश करना, एक बड़ी सामान्य सी चूक है, जो ज़्यादातर भारतीय करते हैं। हमें समझना होगा की जीवन बीमा और निवेश दो अलग-अलग चीज़ें हैं। निवेश हमेशा अपनी भविष्य की ज़रूरतों को ध्यान में रख कर किया जाता है जबकि जीवन बीमा अपने परिवार को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से लिया जाता है। जीवन बीमा लेने का मुख्य आधार अपने जोखिम और परिवार की ज़रूरतों को बनाएँ।


आज के लिए इतना ही दोस्तों, कल हम अंतिम भावनात्मक निवेश के बारे में समझने का प्रयास करेंगे।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com


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