• Nirmal Bhatnagar

अमीर मरने से बेहतर है खुल कर जीना - भाग 3

Sep 9, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

अपनों के जाने के बाद परिवार के सदस्यों द्वारा उनके निवेश पर लिए गए निर्णयों से मुझे एहसास हुआ कि भावनात्मक निवेश किसी भी सूरत में लाभदायक नहीं होते हैं क्यूँकि यह ना तो आपके भविष्य को सुरक्षित बनाते हैं और ना ही परिवार के सदस्य आपके जाने के बाद आपकी भावनाओं की कद्र कर पाते हैं। मेरी नज़र में भावनात्मक निवेश आपको अथाह मेहनत के बाद अमीर बन मरने के लिए तैयार करते हैं। अगर आप आम भारतीय की जीवनशैली को ध्यान से देखेंगे तो पाएँगे अधिकांश भारतीय अपने पूरे जीवन को तो ग़रीबी में, समझौता करते हुए जीते हैं, लेकिन वे मरते अमीर हैं अर्थात् वे अपने जीवन में इकट्ठी की गई पूँजी का उपयोग या उपभोग किए बिना ही इस दुनिया से चले जाते हैं। सोचकर देखिएगा खुद के जीवन को कष्टप्रद बनाकर, भावी पीढ़ी को सुरक्षित करना कितना उचित है? मेरा तो मानना है निवेश का मुख्य उद्देश्य खुद के जीवन को आरामदायक बनाना है। पिछले दो दिनों में हमने पाँच भावनात्मक निवेशों में से चार भावनात्मक निवेशों के बारे में समझा था। आइए आगे बढ़ने से पहले उन्हें संक्षेप में दोहरा लेते हैं-


1) प्रॉपर्टी में निवेश

लम्बे समय से बेहतर और सुरक्षित रिटर्न के कारण प्रॉपर्टी में निवेश आम भारतीय की पहली पसंद है। लेकिन दूसरे राज्यों या देशों में बसे बच्चों के लौटने की आस में बड़ा घर, फार्म या अन्य प्रॉपर्टी बनाना मुझे तो उचित नहीं लगता है। ऐसा में दो कारणों से कह रहा हूँ। पहला, खुद के आज के सुख को क़ुर्बान करके ऐसी प्रॉपर्टी क्यूँ बनाना जिसको बनाने में जीवन के महत्वपूर्ण साल खत्म हो जाएँ और उसकी देखभाल करने में बुढ़ापा, बच्चों या परिवार से दूर रहते हुए बीते। दूसरा, सामान्यतः देखा गया है ऐसी प्रॉपर्टी को बनाने वाले के इस दुनिया से जाने के बाद उत्तराधिकारियों द्वारा बेच दिया जाता है। मेरा तो मानना है कि सम्पत्ति में उतना निवेश अच्छा है जितने में आप अपना सर छुपा सकें और खुद के जीवन को सुरक्षित बना सकें।


2) गहनों में निवेश

भारतीयों का दूसरा प्रिय निवेश है सोने-चाँदी या अन्य धातुओं के गहनों को लेना। वैसे मैं इसे भावनात्मक निवेश में पहले नम्बर पर रखता हूँ क्यूँकि इसे हम सिर्फ़ अपने ही नहीं बल्कि अपने परिवार के हर सदस्य के जीवन के हर महत्वपूर्ण पड़ाव या पल से जोड़कर रखते हैं। जैसे, जन्म, मुंडन, जन्मदिन, सगाई, शादी आदि। लेकिन अगर आप देखेंगे तो पायेंगे कि नई पीढ़ी का लगाव इन गहनों से भी नहीं है क्यूँकि उन्हें इनकी डिज़ाइन पुराने जमाने की लगती है और दूसरी बात वे रिस्क को देखते हुए नक़ली गहने पहनना ज़्यादा पसंद करते हैं। हालाँकि मैं इस निवेश के ख़िलाफ़ नहीं हूँ पर मेरा मानना है कि हमें इसमें निवेश अपनी भविष्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए, शुद्ध धातु के रूप में करना चाहिए ना की गहनों के रूप में।


3) बच्चों की उच्च शिक्षा

जीवन के महत्वपूर्ण वर्षों को लगाकर बनाई गई पूँजी को बच्चों की शिक्षा में लगाना तो समझ आता है। लेकिन जीवन के उत्तरार्ध में इस उद्देश्य के लिए क्षमता से अधिक ऋण लेना कई बार दुखदायी हो जाता है। कई बार वरिष्ठ लोग एक कदम और आगे बढ़कर, भावनाओं में आकर पोते-पोतियों की शिक्षा में भी अपनी पूँजी को खत्म करने लगते हैं, वह भी तब जब उन बच्चों के माता-पिता ने उनकी शिक्षा के लिए पहले से ही एस॰आई॰पी॰ आदि में निवेश करा हुआ है।


4) जीवन बीमा में निवेश

जीवन बीमा और लाभ के लिए पूँजी का निवेश दो अलग-अलग चीज़ें हैं। निवेश हमेशा उच्च लाभ और जोखिम को बैलेंस करते हुए भविष्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर किया जाता है। जबकि जीवन बीमा अपने परिवार को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से लिया जाता है। जीवन बीमा लेने का मुख्य आधार अपने जोखिम और परिवार की ज़रूरतों को बनाएँ।


चलिए दोस्तों, अब हम अंतिम भावनात्मक निवेश के बारे में समझने का प्रयास करते हैं-


5) रिश्तों में भौतिक निवेश करना

यह एक ऐसा निवेश है जो अपने भविष्य को सुरक्षित करने की आपके द्वारा जीवन भर की गई तैयारी को शून्य बना सकता है। जी हाँ साथियों, रिश्तों में भावनाओं का निवेश जहाँ जीवन को सुखमय और बेहतर बनाता है वहीं रिश्तों में भौतिक निवेश जीवन के उत्तरार्ध को परेशानी में डाल सकता है। चलिए रिश्तों में भौतिक निवेश होता क्या है इसे थोड़ा समझ लेते हैं। अक्सर आपने देखा होगा कई भारतीय अपने जीवन भर की पूँजी या निवेश को जैसे अपनी प्रॉपर्टी, शेयर, एफ़॰डी॰ आदि को अपने जीते जी अगली पीढ़ी को सौंप देते हैं। वहीं अगली पीढ़ी आपके भविष्य को सुरक्षित रखने वाले निवेश को खुद के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए उपयोग करने लगती है। ऐसी स्थिति में उनके द्वारा लिया गया एक भी ग़लत निर्णय आपके भविष्य को अनिश्चय की स्थिति में पहुँचा सकता है।


असल में दोस्तों, अगर आप गहराई से देखेंगे तो पाएँगे कि निवेश, आर्थिक चीजों को लेकर हमारी मानसिकता ही विचित्र है। हम अपने विवाहित बच्चों से तो किसी तरह की आर्थिक मदद माँगना नहीं चाहते। लेकिन अपने पोते-पोतियों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपने निवेश को दांव पर लगाने के लिए तैयार रहते हैं। आप स्वयं सोचिए खुद के बारे में सोचना छोड़कर पहले तो जीवन भर बच्चों के लिए कार्य करना और फिर बुढ़ापे में पोते-पोतियों के बारे में सोचना क्या उचित है?


इस विषय में निर्णय लेने के पहले याद रखिएगा, एक ओर जहाँ बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षित जीवनशैली अपनाने की वजह से अब जीवनकाल बढ़ रहा है। वहीं दूसरी ओर महंगाई की वजह से अपनी जीवनशैली को बरकरार रखने की लागत भी बढ़ रही है। ऐसी स्थिति में दूसरों के विषय में सोचते हुए खुद के जीवन को परेशानी में डालना या खुद की ख़ुशियों को भूल जाना मेरी नज़र में उचित नहीं है। यह जीवन हमारा है इसलिए हमें अपने लिए जीना सीखना होगा।


इसलिए मेरा सुझाव है कि अधिकांश भारतीयों की तरह अपना पूरा जीवन कंजूसी में बिताकर आनेवाली पीढ़ी को धनवान बनाने के स्थान पर अपना जीवन अच्छे से जिएँ। अपने शौक़ पर खर्च करें, अपनी इच्छाओं की सूची बनाकर उसे पूरा करें ताकि आप अपना जीवन अमीरी से जिएँ ना की अमीर मरें।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com


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