• Nirmal Bhatnagar

अयोग्य के हाथ शक्ति मतलब बंटाधार…


May 9, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों एक बहुत ही पुरानी कहावत है, ‘बंदरों के हाथ उस्तरा लगना…’ अर्थात् अयोग्य व्यक्ति के हाथ में शक्ति आ जाना या उसे अचानक ही अधिकार मिल जाना। यह स्थिति समाज, संस्था, परिवार, रिश्ते सभी के लिए नुक़सानदायक होती है क्यूँकि जब मूर्ख या अयोग्य व्यक्ति के हाथ शक्ति आती है तो वह अनजाने में उसका दुरुपयोग करना शुरू कर देता है। इस स्थिति को मैं आपको एक कहानी से समझाने का प्रयास करता हूँ-


शहर के बाहरी छोर पर एक बहुत पहुंचे हुए संत रहते थे। पूरा इलाक़ा संत को चमत्कारी मानता था क्यूँकि वक्त ज़रूरत वे अपने चमत्कारों से शिष्यों का भला किया करते थे। एक दिन पास के ही गाँव में रहने वाला एक युवा उनके पास पहुँचा और संत से स्वयं को शिष्य के रूप में स्वीकारने की विनती करने लगा। संत काफ़ी देर तक तो उसे मना करते रहे, लेकिन अंत में उसकी ज़िद के आगे हार गए।


उसी दिन से संत ने अपने शिष्य को शिक्षा देना शुरू कर दिया हालाँकि शिष्य काफ़ी चंचल स्वभाव का था और उसका मन भगवान की सेवा, पूजन, ध्यान में कम ही लगता था लेकिन फिर भी शिक्षण के बाद बचे समय में पूरी लगन के साथ गुरु की सेवा कर उसने गुरु का दिल जीत लिया था।


एक दिन चेले ने गुरुजी से कहा, ‘गुरुजी, मैं आपसे चमत्कारी विद्या सीखना चाहता हूँ। जिससे मैं भी आपके समान समाज की सेवा कर सकूँ।’ संत अपने चेले की सेवा से तो पहले से ही प्रसन्न थे, उसके मुँह से समाज सेवा की बात सुन उन्हें लगा कि शायद ईश्वर ने उसे सदबुद्धी दे दी है। उन्होंने अपने झोले से एक चमत्कारी शीशा निकालकर शिष्य को देते हुए कहा, ‘वत्स, इस चमत्कारी काँच की मदद से तुम जिस किसी इंसान की ओर देखोगे तुम उसी पल उस इंसान के अंदर मौजूद बुराइयों और कमियों को पहचान जाओगे। अगर तुम इसका प्रयोग समाज सेवा के लिए करोगे तो यह तुम्हें प्रसिद्धि देगा लेकिन अगर तुम इसे लोगों को प्रभावित करने का साधन मानोगे, तो अंत में सिर्फ़ और सिर्फ़ पछताओगे।’


हालाँकि संत ने उसे बहुत स्पष्ट शब्दों में समझाया था लेकिन शिष्य इसका उपयोग कभी खेल तो कभी दिखावे की वस्तु के रूप में करने लगा। वह आश्रम में जो भी आता उसकी ओर काँच कर देता और फिर उनकी कमियाँ और बुराइयाँ पहचानकर उसका दुष्प्रचार करने लगता। एक दिन तो उसने हद ही कर दी, उस काँच का मुँह गुरुजी की ओर ही कर दिया और उनकी कमियाँ और बुराइयों को पहचान गया। अब उसे गुरु भी किसी साधारण मनुष्य की भाँति ही लगे थे। अब उसका मन उनकी सेवा या उनकी बताई बातों में नहीं लगता था।


जल्द ही गुरुजी को सारा माजरा समझ में आ गया। उन्होंने तुरंत अपने शिष्य को उसी काँच के साथ बुलवाया और उसमें अपनी खुद की शक्ल देखने के लिए कहा। शिष्य ने उसी पल गुरु की आज्ञा का पालन करा और खुद का मुँह उस काँच में देखने लगा। उसके ऐसा करते से ही काँच के ऊपर एक बड़ी सी सूची के रूप में उसके अंदर मौजूद दोषों की सूची बनकर आ गई। जिसकी झलक अब साफ़-साफ़ उसके चेहरे पर भी नज़र आ रही थी। अब उसका सिर शर्म और ग्लानि के साथ झुका हुआ था, उसे अपनी भूल समझ आ गई थी।


वैसे तो दोस्तों, आप मेरा अभिप्राय समझ ही गए होंगे। लेकिन फिर भी एक बार इसे मैं आपको मेरे नज़रिए से समझा देता हूँ। किसी भी समाज, संस्था, संगठन, विभाग, परिवार, रिश्ते अथवा शासन में सर्वोच्च पद पर जब भी कोई अपरिपक्व या अदूरदर्शी व्यक्ति चुन लिया जाता है तो उसके द्वारा लिए गए निर्णय, किए गए कार्य सब का भला करने के स्थान पर नुक़सानदायी ही सिद्ध होते हैं। बिज़नेस कंसलटेंसी के अपने कार्य के दौरान मैंने अक्सर पारिवारिक व्यापार के बड़ा ना हो पाने की वजह भी यही पाई है।


दोस्तों अगर आप किसी भी संस्था या संगठन को बेहतर चलता हुआ या आगे बढ़ता हुआ देखना चाहते हैं तो किसी को पॉवर या शक्ति देने के पहले उसे परखना शुरू करें और अगर किसी भी वजह से अयोग्य को ही शक्ति देना ज़रूरी लग रहा हो तो उसे सर्वप्रथम किसी योग्य गुरु या कोच के साथ रखें, जिससे बड़े नुक़सान से बचा जा सके।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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