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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

असफलता, सदलता की नींव है…

June 4, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, हालाँकि बात नकारात्मक है, लेकिन कई बार समाज हित में आपको उस पर भी बात करना आवश्यक हो जाता है। पिछले कुछ दिनों या यूँ कहूँ पिछले कुछ वर्षों में युवाओं द्वारा आत्महत्या की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है, जो निश्चित तौर पर चिंता का विषय है। बच्चे कम उम्र में ही तनाव, अवसाद, दबाव का शिकार हो रहे हैं। आप कह सकते हैं कि इसकी एक वजह उन पर हमेशा अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव हो सकता है। मैं भी इससे पूरी तरह ना नहीं करूँगा लेकिन वर्तमान परिवेश में बच्चों के लालन-पालन याने पेरेंटिंग में मुझे सबसे बड़ी कोई समस्या नज़र आती है तो वह है, उन्हें असफलता के लिए तैयार ना करना। उन्हें जीवन, लोगों, वस्तुओं आदि के सही मूल्य या उपयोग के बारे में जागरूक ना करना। उन्हें पता ही नहीं है कि उनके लिए क्या महत्वपूर्ण है; जीवन, लोग या संसाधन।


जी हाँ, असफलता का स्वाद ना चखने देना और उन्हें किसी भी चीज़ की कमी महसूस ना होने देना, इस समस्या का एक मूल कारण है। हो सकता है, आप में से कुछ लोगों को मेरी बात अटपटी लग रही होगी, लेकिन इस विषय में कोई भी धारणा बनाने से पहले ज़रा अपने बचपन को याद करके देख लीजिएगा, आप पाएँगे कि बचपन में मिली छोटी-मोटी असफलताओं और सीमित संसाधनों ने हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाए थे। उदाहरण के लिए पिता का एक चॉकलेट लाकर बड़े भाई या बहन को इस निर्देश के साथ देना कि ‘इसे अपने छोटे भाई-बहनों के साथ बराबर बाँट कर खाना!’, बड़े भाई या बहन को अपने छोटे भाई-बहनों का ध्यान रखना, उनकी केयर करना और साथ ही शेयरिंग करना सिखाता था। इतना ही नहीं यह भाई-बहनों में आपसी प्यार को बढ़ाकर उन्हें सीमित संसाधनों में मिल बाँटकर रहना/खाना भी सिखाता है।


इसी तरह जब आप एक साइकिल, वह भी किराए की, से साइकिल चलाना सीखते थे, तो आप 15 मिनिट या आधे घंटे की क़ीमत भी समझ जाते थे और तो और सीमित पैसों में शिक्षा, शौक़, खेल और अपनी सब इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास आपको पैसों का मूल्य और जीवन में प्राथमिकताएँ बनाना सिखा देता था। इसके साथ ही यह आप के अंदर छूट गई चीजों को पाने की भूख भी जगाता था। याने आप जाने-अनजाने में ही लक्ष्य लेकर जीवन में आगे बढ़ना सीख जाते थे।


ऐसे ही रोज़मर्रा के जीवन में सामाजिक स्तर पर शिक्षकों, परिचितों, रिश्तेदारों, दोस्तों, पड़ोसियों आदि द्वारा की गई छोटी-मोटी बातें, ना सिर्फ़ बच्चों को भविष्य के लिए तैयार कर देती थी, अपितु उन्हें देश का एक अच्छा, संस्कारी नागरिक भी बनाती थी, समाज को एक अच्छा इंसान देती थी। इसे हम समाज द्वारा एक संस्था के रूप में बच्चों का पालन-पोषण या पेरेंटिंग करना भी कह सकते हैं। जो बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करने के साथ-साथ उन्हें एक अच्छा इंसान बनने में भी मदद करता था, जो आजकल प्राय: लुप्त सा हो गया है। इतना ही नहीं, अगर कोई व्यक्तिगत स्तर पर या सामाजिक स्तर पर प्रयास भी करता है तो उसे यह कहकर रोक दिया जाता है कि ‘अपने काम से काम रखो!’ या ‘मेरे बच्चे को कुछ कहने का अधिकार आपको किसने दिया।’


मैं मानता हूँ ऐसा कहने की आपकी अपनी वजह; अपने डर हो सकते हैं। लेकिन दोस्तों, यक़ीन मानिएगा सामाजिक स्तर पर सामूहिक पेरेंटिंग का ना होना भी इस समस्या की मुख्य वजह है। इसके साथ ही आजकल पेरेंट्स द्वारा बच्चों को सब-कुछ रेडीमेड देना; विपरीत स्थितियों का सामना ना करने देना उन्हें जाने-अनजाने में पंगु बना रहा है। जब वे लम्बे समय तक जीवन की हक़ीक़त, विपरीत स्थितियों-परिस्थितियों का सामना नहीं करते; असफलताओं को डील करना नहीं सीखते, तब तक वे जीवन के लिए तैयार नहीं हो पाते हैं। अगर दोस्तों, आप अपने बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं, उन्हें भविष्य के लिए तैयार करना चाहते हैं तो उन्हें ज़िम्मेदार बनाइए, विषम परिस्थितियों में निर्णय लेना, असफलताओं को डील करना सिखाइए।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर


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