आत्म-एक्य के बिना उत्कृष्ट बनना संभव नहीं…
- Nirmal Bhatnagar

- May 12, 2025
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May 12, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, अपने कार्यक्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ बनने याने जीवन में उत्कृष्टता की चाह हर व्यक्ति में होती है। अर्थात् इस दुनिया का हर इंसान चाहता है कि उसके कार्यों को लोगों द्वारा पहचाना और सराहा जाए। जिससे वह समाज में प्रेरणास्पद स्थान बना सके। लेकिन दोस्तों, यह पहचान केवल बाह्य कौशल या बाहरी दिखावे से नहीं मिलती; इसके लिए तो इंसान को अपने विषय या क्षेत्र विशेष के साथ आत्म-एक्य यानी पूर्ण एकात्मकता लाना होती है। चलिए इस गंभीर विषय को एक कहानी के माध्यम से समझने का प्रयास करते हैं, जो हमें बताती है कि किसी कार्य या कौशल को पूरी तरह आत्मसात किए बिना हम उसमें विशेषज्ञता और प्रामाणिकता नहीं ला सकते हैं।
कई सौ साल पहले चीन के सम्राट ने अपने राज्य की मोहर बदलने का निर्णय लिया और अपने सभासदों से कहा कि वे सर्वश्रेष्ठ कलाकारों से बोलते हुए मुर्गे का चित्र बनवायें। सभी चित्रों में से सर्वश्रेष्ठ चित्र को चुनकर उसे राज्य की मोहर के रूप में अपनाया जायेगा और उसे बनाने वाले कलाकार को पुरस्कृत किया जायेगा। राजा के द्वारा घोषणा करते ही उस राज्य के सभी कलाकारों ने नाम और दाम याने पुरुस्कार की चाह में सुंदर चित्र बनाने प्रारंभ कर दिए।
राजा ने सर्वश्रेष्ठ चित्र चुनने की जिम्मेदारी राज्य के सबसे बुजुर्ग कलाकार को देने का निर्णय लिया क्योंकि यह प्रतियोगिता सिर्फ़ कलात्मक चुनौती नहीं थी। इसके माध्यम से राजा सत्य की गहराई को पकड़ने की क्षमता को भी जाँचना चाहता था। परिणाम वाले दिन बुजुर्ग कलाकार एक मुर्गे को साथ लेकर राजमहल पहुँच गया और एक बंद कमरे में चित्रों की जाँच करने लगा। कई घंटे चित्रों के साथ बिताने के बाद बुजुर्ग कलाकार ने जब इस विषय में गहराई से बताने के लिए कहा तो उसने कहा, “राजन, मैंने केवल बाहरी सुंदरता को नहीं, बल्कि चित्र की सजीवता को मापदंड बनाया था। इन सभी चित्रों में मुर्गे के भीतर के भाव और उसकी चेतना मौजूद नहीं है। अर्थात् सभी चित्र मुर्गे के जीवंत भावों को प्रतिबिंबित नहीं कर रहे हैं।”
बुजुर्ग कलाकार की बात ने राजा की उलझन को बढ़ा दिया। उसने बुजुर्ग कलाकार से अगला प्रश्न करते हुए पूछा कि वह मुर्गे के भावों को कैसे पहचान पा रहा है। इसपर वह बोला, “महाराज, मैं तो सभी भावों को पहचानने में सक्षम नहीं हूँ। इसलिए मैंने इस मुर्गे की मदद ली थी। अगर यह चित्र आत्मा या भावों के साथ होते तो यह मुर्गा तत्काल समझ जाता।” बुजुर्ग कलाकार का जवाब उलझन वाला था। इसलिए राजा ने उसे ही बोलते हुए मुर्गे का जीवंत चित्र बनाने की जिम्मेदारी सौंपी। इसपर बुजुर्ग कलाकार बोला, “महाराज मैं यह चित्र मुर्ग़े को बाहर से देखकर नहीं बना सकता हूँ। उसके लिए तो मुझे ही मुर्गा होना पड़ेगा। अर्थात् मुझे मुर्गे के स्वभाव, व्यवहार, चाल-ढाल, भावना और चेतना को पूरी तरह जीना होगा। जब तक मैं मुर्गे को आत्मसात नहीं करूँगा, तब तक अपना सर्वश्रेष्ठ दे नहीं पाऊँगा।”
इसके पश्चात राजा की आज्ञा से बुजुर्ग कलाकार तीन वर्षों तक एक घने जंगल में मुर्गों के बीच रहा। हक़ीक़त में यह मुर्गे को आत्मसात करने की प्रक्रिया का हिस्सा था। कुल मिलाकर कहा जाये तो मुर्गे को आत्मसात करना एक प्रकार की साधना ही थी। यह उस अंतर्यात्रा का प्रमाण था जिसमें कलाकार ने स्वयं को मिटाकर अपने विषय से एकता स्थापित की। तीन वर्षों के पश्चात जब उस बुजुर्ग कलाकार ने चित्र बनाया, तो वह इतना सजीव था कि असली मुर्गे भी उसे देखकर भ्रमित हो गए।
दोस्तों, यह कहानी हमें यह सिखाती है कि “सच्ची प्रतिभा बाहरी प्रदर्शन में नहीं है, बल्कि वह तो विषय के साथ एकात्म हो जाने में है।” यही दर्शन जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है। शिक्षक तभी महान होता है जब वह छात्रों के मनोविज्ञान को आत्मसात करे। नेतृत्व तभी प्रभावी होता है, जब नेता जनता के दर्द को भीतर से महसूस करे और किसी भी पेशे में सफलता तब ही मिलती है जब व्यक्ति उसमें खुद को खोकर, उसे जीना शुरू कर दे।
आज की तेज रफ़्तार दुनिया में जहाँ लोग सफलता के शॉर्टकट ढूंढते हैं, वहीं यह कहानी हमें बताती है कि सच्ची सफलता और सम्मान का मार्ग आत्मसात से होकर जाता है। यह मार्ग कठिन है, समय लेता है, लेकिन एक बार जब हम उस गहराई को पा लेते हैं, तो हमारे कार्य केवल कार्य नहीं रहते — वे जीवंत अभिव्यक्तियाँ बन जाते हैं।
अतः यदि आप अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ बनना चाहते हैं तो केवल जानकारी मत लीजिए, उस ज्ञान को जी लीजिए। केवल कार्य मत करिए, उसमें खुद को झोंक दीजिए। तभी आप अपने जीवन और कार्य में वह जादू ला पाएंगे, जिसे देखकर लोग नहीं, खुद जीवन भी आपको पहचानने लगेगा। यही आत्म-एक्य है, यही सफलता का मूल है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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