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आपका होना ही ईश्वर के होने का प्रमाण है…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jun 9, 2024
  • 3 min read

June 9, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, हाल ही में गिरते जीवन मूल्यों और ग़लत कार्य को दबाव से करवाने के रवैये के ऊपर एक समूह आपस में चर्चा कर रहा था। जिसका मूल मक़सद एक ईमानदार आदमी को यह समझाना था कि वह ईमानदारी से काम करके ख़ुद का ही नुक़सान कर रहा है क्योंकि उसकी ईमानदारी के कारण कार्यालय के उच्च अधिकारी के साथ-साथ, अधीनस्थ और साथी कर्मचारी भी परेशान है और वे उसे ‘सबक़’ सिखाने का मौक़ा ढूँढ रहे हैं। लगभग आधे घंटे की माथा-पच्ची के बाद उस ईमानदार कर्मचारी का एक साथी बोला, ‘देख तेरी फ़ालतू की हरकतों के कारण नाराज़ अधिकारी ने आज तक तो तेरे ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही नहीं करी है। लेकिन सोच अगर तू बार-बार उनसे पंगे लेगा तो कार्यालय में तेरी रक्षा और कौन करेगा?’ ईमानदार व्यक्ति मुस्कुराते हुए बोला, ‘ यार यह सब बातें छोड़। तेरी और मेरी सोच पूरी तरह अलग है। चल मैं तुझे महाभारत का एक क़िस्सा सुनाता हूँ। कौरव और पांडवों दोनों की सेना युद्ध मैदान में, एक दूसरे के सामने, लड़ने के लिए एकदम तैयार खड़ी थी।


महाभारत युद्ध मैदान के बीच में एक चिड़िया ने अंडे दे रखे थे। चिड़िया दोनों ओर सेना को देख रोने लगी। वो सोच रही थी कि अगर दोनों सेनायें आपस में टकराएँगी तो यह अंडे तो फूट जाएँगे और मेरे बच्चे इस संसार में आने के पहले ही ख़त्म हो जाएँगे। दुख की इस घड़ी में चिड़िया को भगवान याद आए। उसने उनसे विनती करते हुए कहा, ‘हे प्रभु ! जिसकी कोई नहीं सुनता, उसकी तो आप सुनते हो। अब मेरे बच्चों का भविष्य आपके हाथों में है। अब आप ही रक्षा कीजिए उनकी।’


चिड़िया की प्रार्थना के दौरान ही युद्ध शुरू होने का शंखनाद हुआ और दोनों सेनायें आपस में टकराई। आप अंदाज़ा लगा ही सकते हैं कि जिस युद्ध में पाण्डवों, कौरवों, कर्ण, गुरु द्रोण, आदि जैसे योद्धाओं हों वह युद्ध कितना भयंकर होगा। दोनों सेनायें आपस में टकराई; बड़े-बड़े महारथी युद्ध में मारे गये। चारों तरफ़ सैनिकों की लाशों के ढेर थे।


महाभारत युद्ध में पाण्डवों की जीत के उपरांत भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के रथ को लेकर कुरुक्षेत्र की भूमि से निकलकर जा रहे थे, तभी उनकी नज़र ज़मीन पर पर पड़े रथ के घंटे के ऊपर पड़ी। भगवान श्री कृष्ण ने हाथ में पकड़े चाबुक से से घंटे को जोर से इस तरह मारा, मानो वे उसे वहाँ से हटा देना चाहते हैं। चाबुक की मार पड़ते ही जैसे ही घंटा पलटा उसके अंदर से चिड़िया के नन्हे बच्चे फुदकते हुए बाहर निकले और कुछ ही पलों में उड़ गये।


चिड़िया के बच्चों को पहले फुदकते और फिर उड़ते देख अर्जुन को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे भगवान श्री कृष्ण की ओर देखते हुए बोले, ‘केशव! ये क्या देख रहा हूँ मैं? इतना भीषण युद्ध जो ना तो पहले कभी हुआ और ना ही शायद आगे कभी होगा, जिसमें भीष्म पितामह, गुरु द्रोण, कर्ण, दुर्योधन आदि जैसे कई बलशाली योद्धा नहीं बच पाए, ऐसे भीषण संग्राम में इन चिड़ियों के बच्चों की रक्षा किसने की?’ प्रश्न सुन भगवान श्री कृष्ण मुस्कुराए और फिर अर्जुन की आँखों में आँखें डालकर बोले, ‘अर्जुन, इतनी सी बात अभी तक नहीं समझा? अरे पगले जिसने तुझे बचाया है, उसने ही तो इन चिड़ियों के बच्चों को बचाया है !!!


कहानी पूरी होते-होते वहाँ पूरी तरह शांति छा गई थी। अभी तक जो बेईमान लोग ईमानदार के बचे रहने को अधिकारी की विशेष कृपा बता रहे थे, उन्हें सच्चाई का अहसास हो चुका था। वे जान चुके थे कि ईमानदार व्यक्ति के ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास ने ही उसके ज़मीर को मरने से बचा रखा है। तो आईए दोस्तों, इसी बात को अपने जीवन का उसूल बनाते हैं और जीवन मूल्य आधारित जीवनशैली अपनाते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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