• Nirmal Bhatnagar

आरामदायक शाख़ - रखें या काटें

Sep 13, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

इस रविवार, एक काउन्सलिंग के दौरान बच्चे के पिता मुझसे बोले, ‘सर, आज के बच्चे पैसों की अहमियत, उसकी क़ीमत बिलकुल भी नहीं समझते। उन्हें बढ़िया नौकरी, बढ़िया पैकेज तो चाहिए लेकिन वे काम आराम से करना चाहते हैं। अब आप ही बताइए यह कैसे सम्भव है?’ अभी वे अपनी बात कह ही रहे थे कि उनके पुत्र ने अपनी माँ को आवाज़ लगाते हुए पानी देने के लिए कहा। कुछ मिनिटों बाद जब मैंने उस युवा को एक ब्लैंक पेज पर कुछ लिख कर दिखाने के लिए कहा तो उसने एक बार फिर अपनी माँ को आवाज़ लगाई और उनसे पेन और एक कोरा पेज लाकर देने के लिए कहा। माँ ने इस बार भी तुरंत बिना एक भी पल गँवाए उसकी ज़रूरत पूरी कर दी। आगे बढ़ने से पहले मैं आपको बता दूँ कि बच्चे से कोरे पेज पर कुछ लिखवाने का मेरा उद्देश्य ग्राफोलॉजी की मदद से उसकी सोच का अंदाज़ा लगाना था। ख़ैर, अगर सामान्य तौर पर भी देखा जाए तो उन सज्जन की युवाओं के लिए बनाई गई धारणा देखने में तो आजकल बिलकुल सही प्रतीत होती है। पर मुझे इसमें गलती बच्चों की नहीं, अपितु पालकों की नज़र आती है। इसे विस्तार में बताने से पहले मैं आपको एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ-


एक बार पशु-पक्षी प्रेमी राजा राघवेंद्र को पड़ौसी राज्य के राजा ने उनके जन्मदिन पर 2 बाज उपहार स्वरूप दिए। राजा ने अपने पक्षी प्रेम के कारण इसे अमूल्य मानते हुए अपने राज्य के पक्षी प्रशिक्षक को बुलवाया और दोनों बाजों को ट्रेंड करने के लिए कहा। प्रशिक्षक दोनों बाजों को राजा के उस बगीचे में ले गया जहाँ वे अपने प्रिय पक्षी या पशुओं को रखा करते थे और उन्हें प्रशिक्षण देने लगा।


लगभग 6 माह बाद राजा को बाज को उड़ते हुए देखने की इच्छा हुई क्यूँकि उन्होंने अन्य दरबारियों से सुना था कि आजकल बाज नई ऊँचाइयों को छूते हुए, बहुत तेज़ उड़ने लगे हैं। राजा ने तुरंत पक्षी प्रशिक्षक को बुलाया और बाज की उड़ान दिखाने के लिए कहा। प्रशिक्षक दो बाजों में से एक को राजा के समक्ष लेकर आया और उसकी ज़बरदस्त उड़ान का प्रदर्शन किया। राजा बाज की उड़ान देखकर बहुत खुश हुआ उसने प्रशिक्षक को ईनाम देते हुए दूसरे बाज की उड़ान दिखाने के लिए कहा।


राजा का नया आदेश पा प्रशिक्षक थोड़ा सा परेशान हो गया और राजा से हाथ जोड़ते हुए बोला, ‘महाराज, माफ़ कीजिएगा मुझे अभी तक दूसरे बाज को प्रशिक्षित करने में सफलता नहीं मिली है। शुरुआती दिनों में जब मैंने बाजों को जलवायु के प्रतिकूल बनाने और साथ ही उन्हें हमारे देश में सहज महसूस कराने के उद्देश्य से आरामदायक परिस्थितियों में रखा था, तब ही से वह बाज पेड़ की एक शाख़ पर बैठा हुआ है। मैंने हर तरह से प्रयास किया पर वह वहाँ से हिलता ही नहीं है।


राजा ने मुस्कुराते हुए प्रशिक्षक को राज्य के वरिष्ठ पक्षी प्रशिक्षक की सलाह लेने के लिए कहा और वे वहाँ से चले गए। लगभग एक माह बाद राजा वापस उस पक्षियों के बगीचे में पहुंचे और प्रशिक्षक को उन खूबसूरत बाजों की उड़ान दिखाने के लिए कहा।राजा का आदेश पा प्रशिक्षक ने वैसा ही करा। इस बार राजा बाजों की उड़ान देख हतप्रभ थे क्यूँकि इस बार दोनों बाज एक साथ, एक समान उड़ रहे थे। राजा ने तुरंत वरिष्ठ पक्षी प्रशिक्षक को ईनाम दिया और पूछा, ‘प्रशिक्षक महोदय, आपने इस दूसरे बाज पर ऐसा क्या जादू किया कि यह इतनी जल्दी, इतनी कुशलता से उड़ना सीख गया?’ प्रशिक्षक ने राजा को प्रणाम करते हुए कहा, ‘महाराज, बाज स्वाभाविक रूप से ऊँचाइयों पर उड़ना जानता है, पर अनुकूल परिस्थितियों को पा इसने उड़ना छोड़ दिया था। मैंने यहाँ आते ही सबसे पहले पेड़ की उस शाख़ को काट दिया जिस पर यह बाज बैठा करता था। शाख़ के कटते ही इसने फिर से उड़ना प्रारम्भ कर दिया।’


कहानी पूर्ण होते ही मैंने उन सज्जन से कहा, ‘सर, वैसे तो आप इस कहानी से समझ ही गए होंगे कि पालक के रूप में हम आजकल क्या गलती कर रहे हैं लेकिन फिर भी संक्षेप में हम इस पर चर्चा कर लेते हैं। जिस तरह बाज ने बैठे-बैठे सुविधाएँ मिलने के कारण उड़ना छोड़ दिया था ठीक उसी तरह की गलती आजकल बच्चों के लालन-पालन में हम कर रहे हैं। बच्चों के जीवन को आसान बनाने, उन्हें तकलीफ़ और विपरीत परिस्थितियों से बचाने के लिए आजकल हम उसे सारी सुविधाएँ बचपन से ही देने लगते हैं। थोड़ा बड़े होने पर यही बच्चे इन सुविधाओं को अपना अधिकार मान लेते हैं और इसमें ज़रा सा भी ख़लल पड़ते ही पूरे घर को सिर पर उठा लेते हैं और उस वक्त परिवार के अन्य सदस्य घर की शांति बनाए रखने के लिए एक बार फिर उनकी मांग, मान लेते हैं। जिसकी वजह से यह सभी बच्चे इसके आदि हो जाते हैं और वे मिलने वाली सुख-सुविधाओं के पीछे की मेहनत और उसकी क़ीमत का सही अंदाज़ा कभी लगा ही नहीं पाते हैं। इसके साथ ही वे यह भी भूल जाते हैं की ईश्वर ने उन्हें विशिष्ट शक्तियों के साथ इस दुनिया में भेजा है, जिनके प्रयोग से वे अपने जीवन को मनचाहा रूप दे सकते हैं। इस स्थिति से बचने का मेरी नज़र में सबसे आसान उपाय समय रहते ‘बैठने वाली शाख़ को काट देना है’ अर्थात् समय रहते उन्हें दुनिया और जीवन की हक़ीक़त का सामना कराना है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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