top of page
  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

इंसानियत के नज़रिए से बनाए प्रोसेस…

Nov 20, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आज एक बड़े ही अजीब से प्रश्न से अपने कॉलम की शुरुआत करना चाहूँगा। आपकी नज़र में किसी भी संस्था के कस्टमर केयर विभाग का कार्य क्या होता है? आप भी सोच रहे होंगे, मैं कैसा बेतुका सवाल पूछ रहा हूँ क्योंकि प्रश्न में ही उत्तर भी छुपा हुआ है। याने कस्टमर केयर विभाग का कार्य अपने कस्टमर का ध्यान रखना है। चलिए, एक और बेतुका सा सवाल पूछ लेता हूँ। अगर कस्टमर केयर विभाग का कार्य अपने कस्टमर का ध्यान रखना है तो उसे पॉलिसी किसे ध्यान में रख कर बनाना चाहिए, कस्टमर को या फिर कंपनी को? निश्चित तौर पर आप कहेंगे कि कस्टमर को। लेकिन दोस्तों, इस मशीनी युग में ऐसा हो नहीं रहा है। आज ज़्यादातर संस्थाओं में कस्टमर केयर का कार्य आउटसोर्स्ड है या फिर चैटबॉट द्वारा किया जा रहा है। ऐसे में तकनीक या आउटसोर्स्ड व्यक्ति पूर्व में निर्धारित की गई पॉलिसी के आधार पर निर्णय लेता है जो सामान्यतः इस विभाग की कार्यप्रणाली पर ही प्रश्न चिन्ह लगा देता है और अंततः: पूरी संस्था की इमेज को ख़राब करता है। अपनी बात को मैं आपको पिछले दो दिनों में मेरे साथ घटी दो घटनाओं से समझाने का प्रयास करता हूँ।


पहली घटना : अपने व्यवसायिक कमिटमेंट को निभाने के लिए इस शनिवार मुझे इंडिगो की फ्लाइट संख्या ६ई७६९९ से इंदौर से जयपुर जाना था। उक्त फ्लाइट में अपने कम्फर्ट को देखते हुए मैंने अतिरिक्त पैसे देकर अपनी पसंद की सीट बुक करी थी। तय शैड्यूल से एक दिन पूर्व याने शुक्रवार को मेरे पास इंडिगो से मेसेज आया कि तकनीकी कारणों से उक्त फ्लाइट कैंसिल कर दी गई है और मैं मेसेज में दी गई लिंक पर क्लिक करके प्लान B के तहत या तो रिफ़ंड ले सकता हूँ या फिर अन्य उपलब्ध फ्लाइट विकल्पों में से किसी एक को चुन सकता हूँ। अपने व्यवसायिक कमिटमेंट को निभाने के उद्देश्य से मैंने तीन घंटे के लेऑवर वाली फ्लाइट के विकल्प को चुना जिसके कारण मेरी एक घंटा २५ मिनिट की यात्रा पाँच घंटे से अधिक की हो गई। ख़ैर इसे आप मेरा निर्णय मान सकते हैं, मेरी असली दिक्क्त तो उस वक़्त शुरू हुई जब मैंने चेकइन करते समय मेकमायट्रिप और इंडिगो से अपनी पसंद की सीट माँगी, इस पर एयरलाइन कर्मचारी ने मुझसे कहा, ‘सर, आपने पिछली फ्लाइट में पसंदीदा सीट के लिए ढाई सौ रू दिये थे और अब आप जो नई फ्लाइट बुक कर रहे हैं इसमें वही सीट साढ़े सात सौ की है। इसलिए हमारे लिए आपको वह सीट देना संभव नहीं है।’ मैंने जब इस विषय में उनसे थोड़े और तर्कों के साथ बात करी तो वे बोले, ‘सर हमें थोड़ा वक़्त दीजिए मैं अपने सीनियर से चर्चा कर आपको बताता हूँ।’ इसके पश्चात मेरे पास ना तो मेकमायट्रिप से कॉल आया और ना ही इंडिगो से। रात्रि लगभग ११ बजे जब मैंने वापस मेकमायट्रिप को कॉल किया तो उन्होंने उपलब्ध सीट के अनुसार चेकइन कर बोर्डिंग पास उपलब्ध करवा दिया। अब मेरा प्रश्न है चलिए, आप मुझे ढाई सौ में साढ़े सात सौ वाली सीट नहीं दे सकते हैं तो कोई बात नहीं, लेकिन यह तो बता दीजिए मेरे ढाईसाऊ रुपये का क्या हुआ?


दूसरी घटना : जयपुर की इसी इवेंट में भाग लेने के लिए मेरे साथी मुंबई से एयर इंडिया एक्सप्रेस की फ्लाइट संख्या आई५-६७९ जो मुंबई से दोपहर तीन बजकर पचास मिनिट पर चलती से जयपुर आ रहे थे। दोपहर १२:५४ पर मेरे पास एयर इंडिया एक्सप्रेस से मेसेज आया कि आपकी फ्लाइट अब ६बजकर २० मिनिट पर जाएगी। अर्थात् फ्लाइट ढाई घंटे देरी से चलेगी। फ्लाइट के समय में आए इस बदलाव के कारण हमारे लिए प्रोग्राम के तय समय पर पहुँचना संभव नहीं था इसलिए हमने इस टिकट को कैंसिल कर, दूसरा टिकट बुक करने का निर्णय लिया। जब मैंने इस संदर्भ में मेकमायट्रिप से संपर्क करा और उन्हें टिकट कैंसल करने का कहा तो उन्होंने बताया कि हमें शून्य रिफ़ंड मिलेगा। जब मैंने उनसे इसका कारण पूछा तो उनका कहना था चूँकि फ्लाइट के शेड्यूल डिपार्चर में अब चार घंटे से कम बचे हैं, इसलिए टिकट कैंसिल करने पर आपको कुछ भी रिफ़ंड नहीं मिलेगा। जब मैंने उन्हें बताया कि चार घंटे पहले तो आपने भी नहीं बताया था तो मैं टिकिट कैंसिल कैसे करता? इस पर कस्टमर केयर अधिकारी बोले, ‘यही एयरलाइन की पालिसी है।’ अब आप ही बताइये दोस्तों, अगर आपको ही चार घंटे पहले नहीं पता है कि फ्लाइट देरी से चलने वाली है तो आप किस तरह अपना टिकट कैंसिल करने का निर्णय चार घंटे पहले लेंगे?


दोस्तों, कहीं ना कहीं आजकल हम प्रोसेस बनाने के नाम पर लोगों को इंसानियत या मानवता या यूँ कहूँ इंसानियत के नज़रिए से दूर कर मशीनी बनाते जा रहे हैं, जो कहीं ना कहीं व्यापार और ब्रांड को नुक़सान ही पहुँचाता है। अगर आप अपने व्यवसाय में वाक़ई कस्टमर को प्राथमिकता देते हैं या देना चाहते हैं, तो एक बात हमेशा याद रखियेगा प्रोसेस या सिस्टम भी इंसानियत के नज़रिए और समय के साथ ही बेहतर काम करते हैं। इसके बिना ग्राहक को ‘वॉओ’ फीलिंग देना संभव नहीं है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

6 views0 comments

Comentários


bottom of page