इंसान का चरित्र बाहरी दिखावे से नहीं बल्कि आचरण से बनता है…
- Nirmal Bhatnagar

- Aug 21, 2025
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Aug 21, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, इंसान का चरित्र बाहरी दिखावे याने व्यवहार, वस्त्र या दैनिक जीवन में पाले जाने वाले नियमों से नहीं, बल्कि भीतरी आचरण याने अंतर्मन में चलने वाले विचारों और भावनाओं से पहचाना जाता है। लेकिन अक्सर लोग यह समझ ही नहीं पाते हैं कि इंसानियत, मानवता या आत्मिक जीवन का आधार बाहरी दिखावा नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन होता है। चलिए इसी बात को हम एक किस्से से समझने का प्रयास करते हैं।
एक बार दो संन्यासी तीर्थयात्रा पर निकले। इनमें से एक संन्यासी बुज़ुर्ग थे और दूसरे युवा। तीर्थयात्रा पूर्ण कर लौटते वक्त उन्हें रास्ते में एक नदी मिली, जिसके किनारे पर एक स्त्री खड़ी थी। उसे देख साफ़ समझ आ रहा था कि वो किसी दुविधा में है। दोनों संन्यासी कुछ समझ पाते उससे पहले ही स्त्री बुजुर्ग संन्यासी के पास पहुँची और बोली, “महात्मन, इस वक्त नदी का बहाव तेज है और मुझे तैरना नहीं आता है। कृपया नदी को पार करने में मेरी मदद करें।”
बुज़ुर्ग संन्यासी ने स्त्री के निवेदन को यह सोचकर इंकार कर दिया कि स्त्री का स्पर्श कहीं उनकी तपस्या को भंग न कर दे। लेकिन इसके ठीक विपरीत युवा संन्यासी ने बिना कुछ सोचे-समझे, करुणा के भाव से उसे नदी पार करवाई और तुरंत आगे बढ़ गए। इस घटना के बाद बुजुर्ग संन्यासी ने युवा संन्यासी से कुछ भी बात नहीं करी। आश्रम पहुँचने तक बुजुर्ग संन्यासी के मन में लगातार वही घटना घूमती रही। जिसके कारण उनके भीतर क्रोध, दुख और असंतोष पनपता गया। इसके विपरीत युवा संन्यासी शांत थे, क्योंकि वे मन के बंधन से आजाद थे। उनका मानना था कि मानवता का धर्म सबसे बड़ा है। अर्थात् असहाय की सहायता करना ही सच्चा धर्म है।
बुजुर्ग संत के अप्रिय और असहज व्यवहार को देख एक दिन युवा संन्यासी ने बुजुर्ग संन्यासी से इसकी वजह पूछी तो उन्होंने उससे चिढ़ते हुए नाराज स्वर में कहा, “तुमने संन्यासी धर्म या आचरण के विरुद्ध कार्य किया है।” इसपर युवा संन्यासी ने अनभिज्ञता जताते हुए विस्तार से इस विषय में बताने के लिए कहा, तो बुजुर्ग संन्यासी ने स्त्री को नदी पार करवाने वाली घटना सुना दी। इसपर युवा संन्यासी मुस्कुराते हूँ बोला, “मैंने मानवता के नाते मदद करते हुए स्त्री को नदी पार कराकर छोड़ दिया था, पर आप उसे अब तक अपने मन में ढो रहे हैं।”
दोस्तों, युवा संन्यासी की बात बड़ी गहरी थी। बुजुर्ग संन्यासी के मन में ब्रह्मचर्य या संन्यास का अर्थ केवल शारीरिक संयम था। इसके विपरीत युवा संन्यासी ने सिद्ध किया कि केवल स्त्री का स्पर्श ब्रह्मचर्य और सन्यासी के नियमों को नहीं तोड़ता क्योंकि ब्रह्मचर्य का स्थान शारीरिक संयम में नहीं बल्कि मन को संयमित रखने याने मन को क्रोध, मोह और अहंकार से बचाने में है। इसका अर्थ हुआ कि संन्यास का अर्थ असलियत में हर बंधन से मुक्ति है। फिर चाहे वह बंधन काम, क्रोध या अहंकार का ही क्यों ना हो क्योंकि मनुष्य जीवन में ज्यादातर बंधन बाहर की परिस्थितियों से नहीं, बल्कि हमारे भीतर की पकड़ से बनते हैं।
दोस्तों, आज के समय में हममें से कई लोग परंपराओं, नियमों या दिखावे में तो बहुत सख्त होते हैं, लेकिन भीतर से हम क्रोध, ईर्ष्या और नकारात्मकता को ढोते रहते हैं। इसलिए अनावश्यक ही क्रोध, दुख और असंतोष के शिकार हो जाते हैं। उदाहरण के लिए हम दूसरों की मदद करने से पहले सोचते हैं, “लोग क्या कहेंगे?” किसी के द्वारा जाने-अनजाने में हुई छोटी-सी बात को वर्षों तक मन में रखते हैं और इसीलिए उनसे रिश्ते ख़राब कर लेते हैं। कुल मिलाकर कहूँ तो बाहरी छवि पर ज़ोर देना कहीं ना कहीं हमारी आंतरिक शांति को ख़त्म कर देता है।
दोस्तों, अगर सच में मुक्त होना है तो भीतर के बोझ को छोड़ना सीखो और इसके लिए सेवा को सर्वोच्च धर्म मानो; परिस्थितियों को मन में ढोना बंद करें और संयम को नियम बनाने की बजाय, भीतर के आचरण को ठीक करो। याद रखिएगा, जिस दिन हम अपने भीतर से क्रोध, ईर्ष्या और मोह छोड़ देंगे, उसी दिन से हम सच्चे संन्यासी बन जाएंगे।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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