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ईश्वर चढ़ावा नहीं, भाव देखते हैं…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jun 28, 2025
  • 3 min read

June 28, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है...

दोस्तों चलिए आज के लेख की शुरुआत एक प्रश्न से करते हैं। चलिए बताइए, भक्ति का असली रूप क्या है? और क्या भगवान को प्रसन्न करने के लिए सोने-चाँदी, हीरे-जवाहरात, भव्य पूजा-पाठ या फिर विशाल यज्ञ की आवश्यकता होती है? मेरी नजर में तो नहीं क्योंकि ईश्वर तो उन चीजों को प्रिय मानते हैं, जो दिखती नहीं है। उदाहरण के लिए सच्चा भाव, सेवा और समर्पण। चलिए, अपनी बात को मैं आपको गुजरात की एक रियासत की राजमाता मीलण देवी से जुड़े एक किस्से से समझाने का प्रयास करता हूँ, जो हमें इस बात की प्रेरणा देती है कि ईश्वर को मनाने और पुण्य कमाने के लिए धन-दौलत नहीं, दिल की सच्चाई चाहिए।


एक बार मीलण देवी ने सोमनाथ मंदिर में जाकर विधिवत रूप से भगवान शिव का पूजन-अर्चन किया और उसके पश्चात विधि-विधान से स्वर्ण का तुलादान किया। सोमनाथ वासी और उनकी पूरी रियासत के लोग इस भव्य आयोजन को देख चकित थे और इसीलिए मीलण देवी की आस्था के गुणगान कर रहे थे। इस वजह से मीलण देवी के मन में अहंकार का बीज उग गया और वे सोचने लगी, “संभवतः मुझ जैसी शिव सेवा और दान तो किसी ने किया ही नहीं होगा।”


लोगों के जयकारों के बीच अपने इसी अहंकार के साथ वे उसी रात अपनी रियासत में वापस आ गई। रात्रि विश्राम के दौरान भगवान सोमनाथ ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, “राजमाता! एक गरीब महिला ने आज जिस भाव से सेवा की है, उसके पुण्य अमूल्य हैं। तुम चाहो तो स्वर्ण मुद्राएँ देकर उससे कुछ पुण्य खरीद सकती हो, जिससे परलोक में तुम्हारा कल्याण होगा।” स्वप्न देखते ही मीलण देवी चौंक कर उठी। वे हतप्रभ थी और सोच रही थी कि इतना भारी स्वर्ण दान करने के बाद भी भगवान ने उन्हें नहीं, बल्कि उस निर्धन महिला को पुण्य का अधिकारी बताया। आख़िर क्यों? वे इस तरह के अनेकों विचारों की वजह से व्याकुल थी। इसलिए उन्होंने अपने सेवकों को आदेश दिया कि वे इसी वक्त उस महिला को उनके समक्ष लेकर आयें।


कुछ ही देर में डरी-सहमी निर्धन महिला राजमाता के समक्ष थी। उन्हें देखते ही राजमाता ने उन्हें प्रणाम किया और उनसे प्रश्न करते हुए बोली, “माता, तुम्हारे पास ऐसे कौन से पुण्य है, जो भगवान को मेरे द्वारा किए गए स्वर्ण तुलादान से बेहतर लगे?” निर्धन महिला हाथ जोड़कर बोली, “महारानी जी, मैं तो भिक्षुक हूँ। कल मंदिर के बाहर किसी ने एक मुट्ठी भर सत्तू दान में दिया था। मैंने उसमें से आधा सत्तू एक भूखे ब्राह्मण को दिया और आधा मुट्ठी सत्तू भगवान को अर्पित कर दिया। बस यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी भक्ति है।” उसकी बातों ने राजमाता की आँखों को आँसू से भर दिया था। वे समझ गई थी कि ईश्वर को दिखावे से भरे स्वर्ण का तुलादान नहीं, निष्काम सेवा और भाव चाहिए।


दोस्तों, यह अद्भुत कथा हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण पाठ सिखाती है।

पहला पाठ - भक्ति में भाव प्रधान होता है, दान नहीं।

दूसरा पाठ - सेवा का मूल्य धन से नहीं, नीयत से तय होता है।

तीसरा पाठ - अहंकार से किया गया दान-पुण्य, पूजा-पाठ पुण्य नहीं देता है।

चौथा पाठ - मन से किया गया छोटे-से-छोटा कार्य भी आपको ईश्वर का प्रिय बना सकता है। और

पाँचवाँ पाठ - जीवन का सर्वोच्च धर्म सेवा है।


दोस्तों, अंत में इतना ही कहना चाहूँगा कि ईश्वर को प्रसन्न करना है तो दिखावे और ढकोसलों को छोड़कर सच्चे मन से दया और सेवा का भाव रखते हुए कार्य करो क्योंकि सच्ची भक्ति धन या ढकोसलों से नहीं, दिल से होती है। इस आपाधापी भरे जीवन में भी किसी दुखी को सहारा देकर, भूखे को भोजन कराकर भी हम ईश्वर की सच्ची पूजा कर सकते हैं क्योंकि ईश्वर धन नहीं, भाव देखते हैं और सच्चे भाव से किया गया छोटा सा कार्य भी जीवन का सबसे बड़ा पुण्य बन सकता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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