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ईश्वर हमें हमारी सोच से बेहतर बना रहा है…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Sep 9, 2023
  • 3 min read

Sep 9, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

आइये दोस्तों, आज के शो की शुरुआत चार धड़ों की एक प्यारी सी कहानी से करते है। बात कई साल पुरानी है, गाँव में एक कुम्हार ने बहुत सुंदर और अच्छे मिट्टी के घड़ों का निर्माण किया। शीत ऋतु के चलते अत्यधिक सुंदर एवं उपयोगी होने के बाद भी उन घड़ों का कोई खरीददार कुम्हार को मिल नहीं रहा था, इसलिए कुम्हार ने उन चारों घड़ों को एक ख़स्ता हाल, कबाड़ रखने वाले अंधेरे कमरे में रख दिया। घड़े वहाँ रखे जाने के कारण बड़े उदास थे और अपनी क़िस्मत को दोष दे रहे थे।


एक दिन इसी तरह दोष देते हुए पहला घड़ा बोला, “जाने किस मनहूस घड़ी में, मैं इस कुम्हार के हाथ लग गया, असल में तो मेरा सपना बहुत बड़ी और सुंदर मूर्ति बनने का था, ताकि मैं किसी मंदिर या अमीर घर की शोभा बढ़ा सकता। दूर दूर से लोग मुझे देखने आते, मेरी तारीफ़ करते, मेरी फोटो खींचकर अपने साथ ले जाते, लेकिन मेरी मनहूस क़िस्मत का खेल तो देखो, घड़ा बनाकर इस कमरे में पटक दिया।”


पहले घड़े की बात सुन, दूसरा घड़ा बड़े दबे दबे स्वर में लगभग रोते हुए बोला, “बात तो सही कह रहे हो बड़े भाई, मेरी भी क़िस्मत तुम्हारे जैसे ही फूटी हुई है। मेरे हाल भी तुम्हारे जैसे ही थे, मैं बचपन से ही दीया बनने का सपना देखा था, ताकि मैं अंधेरे घरों को रोशन कर सकूँ अथवा किसी मंदिर में जलाया जाकर, किसी के मन में आस्था या आशा पैदा कर सकूँ। लेकिन समय का खेल देखो, मैं भी यहाँ घड़ा बन पड़ा हुआ हूँ।”


दोनों घड़ों की नकारात्मक बातों के कारण कमरे का माहौल अब पूरी तरह नकारात्मक हो गया था। इसी वजह से तीसरा घड़ा, जो अब तक ठीक ठाक लग रहा था, वह भी दुखी हो गया। उसने उदासी भरे स्वर में अपना राग अलापते हुए कहा, “भाइयों मेरे हाल भी तुमसे जुदा नहीं है। सपना तो मैंने भी एक गुल्लक बनने का देखा था, ताकि मेरे पास कभी पैसों की कमी ना हो और मुझ पैसों भरी गुल्लक को देख देख कर; जाने कितने बच्चे अपने सपनों को याद कर खुश होते। लेकिन अपनी फूटी क़िस्मत के कारण मैं भी तुम्हारे साथ यहाँ इस अंधेरे कमरे में पड़ा हुआ हूँ।”


चौथा घड़ा तीनों घड़ों की बात सुन मंद मंद मुस्कुरा रहा था, जो तीनों घड़ों को बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। उन्होंने मायूसी भरे स्वर में लगभग एक साथ पूछा, “अरे भाई!, तुम्हारा कोई सपना नहीं था, क्या? क्या तुम्हें घड़ा बनने का दुख नहीं है?”, तीनों घड़ों का प्रश्न सुन चौथा घड़ा माफ़ी माँगते हुए बोला, “माफ़ करना भाइयों!, मेरा मक़सद तुम्हें दुख पहुँचाना बिलकुल भी नहीं था। सच कहूँ तो मैं भी कभी घड़ा नहीं बनना चाहता था। मेरा सपना तो खिलौना बनने का था। जिससे मैं हमेशा बच्चों के बीच रह सकूँ और उनका भी मन बहला सकूँ और ख़ुद भी ख़ुश रह सकूँ। मैं तो लोगों को ख़ुशी देकर, ख़ुद खुश रहना चाहता था। लेकिन कोई बात नहीं खिलौना नहीं भी बन पाया तो क्या फ़र्क़ पड़ता है क्योंकि ईश्वर ने मुझे अपने उद्देश्य में असफल कर, किसी बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए घड़ा बना दिन होगा। मेरा तो हमेशा से मानना है कि ईश्वर हमें वह नहीं देता, जो हमें अच्छा लगता है, बल्कि वह तो हमें वह देता है, जो हमारे लिए अच्छा होता है।”


बात तो दोस्तों, चौथे घड़े की बिलकुल सही थी, जीवन में कई बार ईश्वर हमें असफल, हमारे लाभ के लिए ही करता है। घड़ों की इस बात को अभी एक माह भी नहीं बिता होगा कि ग्रीष्म ऋतु आ गई और चारों घड़ों को बहुत अच्छी क़ीमत पर एक अमीर सेठ ने ख़रीद लिया और एक सुंदर से प्याऊ में पानी भरकर रख दिया। अब उन बेकार से अंधेरे कमरे में पड़े घड़ों को लोगों की दुआयें मिल रही थी और वे लोगों की प्यास बुझाने जैसा नेक काम कर रहे थे।


असल में दोस्तों, तात्कालिक तौर पर मिली किसी एक सफलता या असफलता से ईश्वर की योजना को समझ पाना असंभव ही है। अगर आप वाक़ई आनंद में जीना चाहते है, तो आपको चौथे घड़े के समान ईश्वर पर आस्था और विश्वास रखते हुए, नियति को स्वीकारना होगा और यह तभी संभव होगा; जब हम अटूट विश्वास और धैर्य के साथ अपने अस्तित्व को यह सोचते हुए स्वीकार सके कि ईश्वर हमें हमारी सोच से ज़्यादा बेहतर बना रहा है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

 
 
 

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