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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

उड़ें लेकिन ज़मीन से जुड़े रहकर…

Mar 2, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, हाल ही में मुझे व्यवसायिक कार्य के चलते नई दिल्ली जाने का मौक़ा मिला। कार्य पूर्ण होने के पश्चात मैंने अपनी टैक्सी के ड्राइवर को अपने कज़िन के घर चलने के लिए कहा। बड़े भाई (कज़िन) के साथ मेरे रिश्ते की गहराई देख लौटते समय ड्राइवर मुझसे बोला, ‘सर, लगता है आप अपने बड़े भाई को काफ़ी मानते हैं।’ मेरे हाँ में सर हिलाते ही उसने मुझ पर दूसरा प्रश्न दागते हुए कहा, ‘आपके भैया क्या करते हैं?’ मैंने लगभग टालते हुए उसे जवाब दिया, ‘वे एक बड़े सरकारी अधिकारी थे, अब रिटायर हो गए हैं।’


मेरा जवाब सुनते ही वह कुछ पलों के लिए एकदम शांत हो गया, फिर गम्भीर स्वर में बोला, ‘एक आपके बड़े भाई हैं जो सगे ना होते हुए भी आपके विषय में इतना गम्भीरता पूर्वक सोचते हैं। आप भी उनकी उतनी ही इज्जत करते हैं। लेकिन एक मेरा सगा भाई है जिसने सरकारी विभाग में नौकरी लगते ही हम सब से दूरी बना ली। अब उसे किसी को भी यह बताना अच्छा नहीं लगता है कि उसका एक भाई ड्राइवर है और दूसरा किसान।’


दोस्तों, ड्राइवर द्वारा कम लेकिन गम्भीर शब्दों के साथ कही गई यह बात, उसके दर्द को दर्शाने के साथ-साथ, लोगों की गिरती सोच को दर्शाने के लिए काफ़ी थी। असल में दोस्तों, इंसान चाँद पर तो पहुँच गया है लेकिन अपने भाई, अपने परिवार, अपने करीबी रिश्तेदारों के दिल तक नहीं पहुँच पाया है। इसकी मुख्य वजह हमारी बदली हुई प्राथमिकताएँ हैं। आज हमारे लिए अंतरिक्ष में उड़ना, समुद्र की गहराइयों में कुछ नया खोजना, तो एवरेस्ट को नापना याने विज्ञान में तरक़्क़ी कर ऊँची-ऊँची उड़ानें भरना इतना महत्वपूर्ण हूँ गया है कि हम ज़मीन पर रहना भूल ही गए हैं। हमने गगनचुंबी इमारतें या बड़े घर तो बना लिए हैं, पर अपने दिल को छोटा कर लिया है।


जी हाँ दोस्तों, आज शहर भर के रास्ते तो चौड़े हैं लेकिन नज़रिया एकदम संकरा। इन्हीं बदली हुई प्राथमिकताओं के कारण आज हर व्यक्ति साधन सम्पन्न तो होता जा रहा है, लेकिन अंदर से खोखला है। उसके पास अच्छे विचार तो बहुत से आ गए है, लेकिन पुराना आचरण कहीं दूर चला गया है। आज वह पहले से अधिक शिक्षित है, उसने सही तरीक़े से बोलना सीख लिया है, लेकिन शिक्षा की गलत समझ ने उसे अपनों से मीठा और प्रिय बोलना छुड़वा दिया है।


दूसरे शब्दों में कहूँ दोस्तों, तो 21वीं सदी की प्रगति में इंसानियत की या सीधे-सीधे कहा जाए तो हमारी दुर्गति हुई है। जी हाँ साथियों, प्रगति का अर्थ यह कभी नहीं होता कि आप पुरानी बातों, पुराने रिश्तों को छोड़ जीवन में आगे बढ़ जाएँ। याद रखिएगा साथियों, धरती को अपनी माँ मानते हैं इसीलिए धरती वासी कहलाते हैं। हमारा स्वर्ग धरती पर ही है जिसका भोग हमें इस जीवन में ही करना है। इसके लिए हमें आसमान में उड़ते वक्त याद रखना होगा कि हमारे पैर ज़मीन पर टिके रहें। जीवन के अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आईए दोस्तों, आज से हम अपने जीवन को जीवन के उन मूल्यों के साथ जीना शुरू करते हैं जो हमें हमारे वरिष्ठों द्वारा सिखाए गए हैं। याद रखिएगा, जीवन को आनन्दमय बनाने के लिए हमें अपने सम्बन्धों, जीवन मूल्यों, कर्तव्यों के बोध को याद रखना होगा।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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