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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

एक साधे, सब सधे। सब साधे, सब जाए !!!

Mar 6, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…



दोस्तों, ईश्वर ने हमें यह जीवन देते वक़्त कोई गारंटी नहीं दी थी कि आपको जीवन में कभी विपरीत परिस्थितियों या चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ेगा या सब कुछ आपकी इच्छा या योजना के मुताबिक़ घटेगा। जीवन तो दोस्तों निश्चित तौर पर अनिश्चितताओं से भरा होगा और यह अक्सर आपका सामना अप्रिय प्रसंगों से करायेगा। याद रखियेगा, जीवन में परिस्थितियाँ कभी भी अनुकूल नहीं होती हैं और ना ही आपके संपर्क में रहने वाले सभी लोग आपके अनुकूल व्यवहार करते हैं। इसलिए जीवन में लाभ-हानि, सुख-दुख, रोग, शोक, बिछोह, अपमान, घाटा, असफलता, आपत्ति, विपत्ति, सुख, संपत्ति आती-जाती रहेगी। इनका आना और जाना दोनों ही सामान्य है। इस दुनिया में आजतक कोई भी इन विविधताओं से नहीं बचा है। जिसने इन विविधताओं के बीच, अपने विवेक को काम में लेते हुए, ख़ुद की मनःस्थिति को संयमित बनाया है, उसने ही इस जीवन को जीना सिखा है।


जी हाँ साथियों, ज़िंदगी इन्हीं उतार-चढ़ाव के बीच ख़ुद को संतुलित बनाए रखने का नाम है। इसी बात को थोड़ा गहराई से समझने का प्रयास करें तो प्रतिकूलताओं याने विपरीत परिस्थितियों के आने पर जो घबराते हैं, अधीर होते हैं या किंकर्तव्यविमूढ़ बनते हैं, वे अपनी इस दुर्बलता को भी एक नई विपत्ति के रूप में ओढ़ते हैं और अपना कष्ट दोगुना कर लेते है। इसके ठीक विपरीत साहसी और धैर्यशील लोग, कठिन से कठिन परिस्थिति या विपरीत समय को भी अपने साहस और विवेक के बल पर अपने लिए लाभप्रद बना लेते हैं और अगर स्थिति बहुत ही ज़्यादा गंभीर हो तो यह लोग निराशा के दौर में अपने विवेक और साहस से पहले आशा का वातावरण बनाने के लिए प्रयास करते हैं और फिर स्थितियों को पहले कामचलाऊ बनाते हैं और फिर बीतते समय के साथ धीमे-धीमे उसे अपने लिए शांतिपूर्ण और फ़ायदेमंद बना लेते हैं।


उपरोक्त आधार पर कहा जाए तो जरा सी बात पर घबराना, चिंतित हो जाना, डरना, रोना, निराश होना, उत्तेजित होना, क्रोधित होना, अपना संयम खो देना और अंत में हार मान कर बैठ जाना मेरी नज़र में कमजोर या विवेकहीन होने की निशानी है। इस आधार पर कहा जाए दोस्तों, तो जिसका हृदय बड़ा है, जो विपरीत बातों और असफलताओं को तवज्जो नहीं देता है, जो दूरदृष्टि के साथ सही दृष्टिकोण रखता है, वह विपरीत दौर, प्रतिकूल स्थितियों और असफलताओं को सफलता की राह में आने वाले छोटे से गतिरोध की माफ़िक़ मानता है। वह जानता है कि उपरोक्त सभी नकारात्मक भाव उसके जीवन में क्षण भर ठहर कर ठीक वैसे ही निकल जाएँगे जैसे पूर्व में अच्छे दिन या अनुकूल परिस्थितियाँ निकल गई थी। जीवन के प्रति यह सकारात्मक दृष्टिकोण उसे हंसते-मुस्कुराते हुए नकारात्मक स्थितियों को सरलतापूर्वक पार करने में मदद करता है।


दोस्तों, सुनने में साधारण सी लगने वाली यह बात, सिर्फ़ तभी संभव है जब आप अपने मन को जीत पाएँ। अर्थात् आप अपने मन को वश में रख पायें; उसे प्रसन्न रख पाएँ। तभी वह आपको संतुलित रखने के लिए तैयार होगा। दूसरे शब्दों में कहूँ तो प्रसन्न मन के बिना उपरोक्त आशा रखना बेमानी ही है। इसके विपरीत अगर आप अपने स्वयं के सहयोगी बन जाएँ; ख़ुद का विरोध करना बंद कर दें; ख़ुद को कोसना और सताना बंद कर दें याने अपने मन को प्रसन्न रखना शुरू कर दें, तो आप स्वयं ही सोच कर देखिए कि जीवन के प्रति नज़रिए को बदलने में; ख़ुद का स्वभाव अच्छा बनाने में कितनी देर लगेगी और अगर आपने नज़रिया अच्छा कर स्वभाव अच्छा बना लिया तो आप अपने जीवन को पैसों से अमीर लोगों से भी अच्छा बना लेंगे। जी हाँ दोस्तों उपरोक्त स्थिति अमीरी भोगने से भी बढ़कर है।


जी हाँ दोस्तों, मन को प्रसन्न रखकर भौतिक जीवन को आनन्दमय और सुसंपन्न बनाना हमारे स्वास्थ्य; हमारे ज्ञान और हमारे स्वभाव को उत्कृष्ट बनाता है और जब मन, स्वास्थ्य, ज्ञान और स्वभाव उत्कृष्ट होता है तब हमारे जीवन में अपने आप ही धन, यश, ख़ुशी, प्रसन्नता, सुख, संतोष, प्रेम, उल्लास, अपनों से सहयोग आदि सभी कुछ अपने आप ही मिलने लगता है। कुल मिलाकर कहा जाए तो हमारे लिए सफलता के द्वार हर दिशा में खुल जाते हैं। अर्थात् दोस्तों मन को जीतते ही हम जीवन में सुख, उन्नति और लक्ष्य सभी पाने लगते हैं। वैसे भी दोस्तों, हमारे सबसे समीप, हमारा मन है। वही है जो हर पल हमारे साथ रहता है, वही हमसे सबसे अधिक संबद्ध एवं हमारा विश्वस्त है इसीलिए हमें सबसे पहले, सबसे अधिक इसी पर ध्यान देना चाहिये और इसे साधना चाहिये। इसीलिए तो कहा गया है दोस्तों, ‘एक (मन को) साधे, सब सधे। सब साधे, सब जाए।।’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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