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ओनरशिप मेंटालिटी के साथ जिएँ जीवन…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Sep 25, 2025
  • 3 min read

Sep 25, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, जीवन जीने का असली मज़ा ग़ुलामी में नहीं बल्कि मालिक बन कर जीने में है। जी हाँ जब आप स्वयं को परिस्थितियों का शिकार मानने के स्थान पर, अपनी ज़िंदगी का निर्माता मानने लगते हैं, तब ही आप अपनी असीम क्षमताओं को पहचान पाते हैं। 'पीड़ित मानसिकता’ याने विक्टिम मेंटेलिटी से ‘जिम्मेदार मानसिकता’ की यह यात्रा ही हमारे अंदर दृढ़ता पैदा करती है, जिसकी वजह से हम हर मुश्किल को अवसर में बदलना सीख पाते हैं।


दूसरे शब्दों में कहूँ तो पीड़ित याने विक्टिम से निर्माता याने क्रिएटर बनने की यह यात्रा ही हमारे अंदर वह लचीलापन ला पाती है जो हमें चुनौतियों को अवसर में बदलने लायक़ बनाता है। इसके विपरीत निर्भर याने डिपेंडेंट या थोड़े कड़क शब्दों में कहूँ तो पैरासाइट याने उत्तरजीवी बन कर जीना ही लोगों को विक्टिम याने पीड़ित मानसिकता का शिकार बनता है। बहुत से लोग यह जानने के बाद भी अपने करियर, जीवनशैली या रिश्तों के फैसले खुद नहीं लेते; वे समाज की अपेक्षाओं, परिवार की चाहतों या दूसरों से तुलना के आधार पर चलते हैं। यह “उधार के सपनों” पर आधारित जीवन कुछ समय के लिए तो आकर्षक लग सकता है, लेकिन अंततः भीतर खालीपन और असंतोष छोड़ जाता है क्योंकि लगातार दूसरों से तुलना करना और भीड़ का अनुसरण करते हुए जीवन जीने के प्रयास करने में इंसान से उसकी पहचान खो जाति है।


इसलिए मैं सभी को जिम्मेदारी पूर्ण जीवन याने अपने जीवन का मालिक बन जीवन जीने की सलाह देता हूँ। लेकिन यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि ओनरशिप के साथ जीवन जीने का मतलब दोष अपने सर पर लेना नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार बनना है। निर्णय लेकर किसी राह को चुनना और उस राह पर चल कर मिले परिणाम को स्वीकारना आपको ख़ुद के प्रति उत्तरदायी याने रेस्पोंसिबल बनाता है। हमें अपने जीवन का नियंत्रण अपने हाथ में लेने लायक़ बनाता है।


इसी बात को आसान शब्दों में कहूँ तो ‘मेरे साथ हमेशा गलत होता है।’ के भाव के साथ जीना पीड़ित मानसिकता याने विक्टिम मेंटेलिटी है और मुश्किल या विपरीत समय में यह स्वीकारना कि ‘जीवन में आई चुनौती को स्वीकारना और यह सोचना कि इससे मैं क्या सीख सकता हूँ और जीवन में आगे कैसे बढ़ सकता हूँ?’, ओनरशिप मेंटेलिटी है।



दोस्तों, मैंने स्वयं ने जीवन में तभी प्रगति की है जब मैंने बहानों की बजाय जिम्मेदारी को चुना है। सहमत ना हों तो अपने आसपास मौजूद सफल उद्यमियों को देख लीजियेगा, वे सब जीवन में तभी सफल हो पाएँ हैं जब उन्होंने अपने असफल प्रोजेक्ट को “सिस्टम की गलती” कह कर दोष दूसरों पर डालने के बजाय ओनरशिप के भाव के साथ असफलता की जिम्मेदारी ख़ुद पर ली है और फिर उस असफलता से सीख कर, अपनी रणनीति बदलकर जीवन में आगे बढ़ें हैं और अंततः सफल हुए हैं। यही स्वामित्व याने ओनरशिप का जादू है।


जी हाँ दोस्तों, असफलताओं को अवसर माने बिना जीवन में सफल होना सम्भव नहीं है। जीवन में असफलता निश्चित है, लेकिन उस पर ‘विक्टिम’ अथवा ‘ओनरशिप’ मेंटेलिटी आधारित प्रतिक्रिया देना हमारा चुनाव है। स्वामित्व याने ओनरशिप हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि “यह बाधा मुझे क्या सिखाना चाहती है?” यह सोच आपको आलोचना, अस्वीकृति या असफलता की स्थिति में टूटने के बजाय मजबूत बनाती है। कुल मिलाकर कहूँ तो जीवन बदलने के लिए, दृष्टिकोण बदलना ज़रूरी है।


याद रखियेगा दोस्तों, यह जीवन वाक़ई में बहुत छोटा है, इसलिए इसे प्राथमिकताओं के आधार पर ज़िम्मेदारी के साथ जीना जरूरी है। याद रखिएगा, बाहरी दबाव से मिली प्रेरणा अस्थाई होती है। जीवन में असली ऊर्जा और प्रेरणा तभी आती है, जब हम अपने जीवन की जिम्मेदारी ख़ुद पर लेते हैं क्योंकि जिम्मेदारी लेना आपका आत्मविश्वास बढ़ाता है और आत्मविश्वास आगे बढ़ने का जोश देता है। याद रखिएगा दोस्तों, दृढ़ता केवल कठिनाइयों को झेलने का नाम नहीं, बल्कि यह समझने का साहस है कि मैं अपनी ज़िंदगी का निर्माता हूँ। जब हम दूसरों की अपेक्षाओं से मुक्त होकर अपनी राह चुनते हैं, असफलताओं से सीखते हैं, और अपने समय को सही प्राथमिकताओं पर लगाते हैं, तभी जीवन में संतोष, सफलता और सच्चा आत्मविश्वास मिलता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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