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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

‘कथन’वीर नहीं, कर्मवीर बनिए…

June 5, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, बातें करना और बातों को कर्म में बदलकर अंजाम तक पहुँचाना दो बिलकुल अलग-अलग बातें हैं। उदाहरण के लिए विपरीत परिस्थितियों और परेशानी के दौर में आपको सहानुभूति दिखाने वाले तो कई मिल जाएँगे लेकिन विपरीत या परेशानी भरे समय में मदद करने वाले चुनिंदा ही होंगे। जी हाँ दोस्तों, किसी बात को कहना और कही हुई बात को पूरा करने का भाव होना दो बिलकुल अलग-अलग बातें हैं। अपनी बात को मैं आपको महाभारत के एक किस्से से समझाने का प्रयास करता हूँ।


महाभारत के दौरान एक बार भगवान श्री कृष्ण को बार-बार कर्ण की प्रशंसा करता देख अर्जुन को बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा। उन्होंने भगवान कृष्ण को बीच में ही टोकते हुए कहा, ‘मधुसूदन, आप काफ़ी देर से कर्ण की दानवीरता और उदारता की प्रशंसा कर रहे हैं। जबकि आप भी जानते हैं कि इस दुनिया में हमारे ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर से बढ़कर कोई उदार या दानवीर नहीं है। अर्जुन की बात सुन कृष्ण मुस्कुराए और बोले, ‘इसमें कोई शक नहीं कि हमारे भ्राता श्री दानवीर और धर्मराज हैं। लेकिन फिर भी कर्ण तो कर्ण ही है। समय आने पर मैं तुम्हें इसका प्रमाण भी दे दूँगा।’


एक दिन भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को साधु का वेश धारण करके साथ चलने को कहा। अर्जुन ने तुरंत वैसा ही किया। कुछ ही पलों बाद साहुओं के वेश में भगवान श्री कृष्ण, अर्जुन रूपी साधु को साथ ले युधिष्ठिर के पास पहुंचे और बोले, ‘महाराज, हमें हवन करने हेतु एक मन चंदन की सुखी लकड़ी चाहिए।’ महाराज युधिष्ठिर ने साधुओं को यथोचित सम्मान देकर अतिथिगृह में रुकने के लिए कहा और खुद लकड़ियों के इंतज़ाम के लिए दरबार में पहुँचे और सेवकों को आदेश देते हुए बोले, ‘जाओ, कहीं से भी एक मन सुखी चंदन की लकड़ी लेकर आओ।’


चूँकि उस वक्त वर्षाकाल चल रहा था इसलिए दरबारियों को पूरे राज्य में कहीं भी एक मन सुखी चंदन की लकड़ी नहीं मिली। कुछ घंटों बाद सभी दरबारी जितनी भी लकड़ी जुटा सके थे, लेकर युधिष्ठिर जी के पास आ गए और उन्हें सारी स्थिति से अवगत कराया। उनकी बात सुन युधिष्ठिर जी साधुओं के भेस में आए श्री कृष्ण और अर्जुन के पास पहुंचे और बोले, ‘महात्मन, आज मैं आपके कहे अनुसार एक मन चंदन की लकड़ी की व्यवस्था करने में असमर्थ हूँ। आप चाहें तो कुछ और मांग सकते हैं।’ इस पर साधु के भेस में खड़े श्री कृष्ण बोले, ‘धन्यवाद वत्स, हमें यज्ञ के लिए चंदन की लकड़ी चाहिए थी। अगर वह नहीं मिल पा रही है तो कोई बात नहीं, हम कही और से व्यवस्था कर लेंगे।’


इतना कहकर कृष्ण भगवान अर्जुन को लेकर वहाँ से चल दिए और सीधे कर्ण के पास पहुँच गए और अपनी मांग दोहरा दी। कर्ण ने दोनों साधुओं का यथोचित सत्कार किया और बोले, ‘महात्मन, वर्षा काल के कारण 1 मन सुखी चंदन की लकड़ियों की व्यवस्था करना अभी सम्भव नहीं है। अगर आप मुझे एक-दो दिन का समय दें तो मैं व्यवस्था कर सकता हूँ। इस पर कृष्ण बोले, ‘राजन, हमें वर्षाकाल में अभी यज्ञ करना है, इसलिए हमें लकड़ियाँ आज ही चाहिए। अगर आप दे सकें तो ठीक है अन्यथा हम कहीं और से व्यवस्था कर लेंगे।


इतना सुनते ही कर्ण ने अपने तरकश में से तीर निकाला और बोले, ‘महात्मन, ऐसी बात है तो मैं अभी व्यवस्था किए देता हूँ।’ और तीर से अपने महल के दरवाज़े, खिड़कियाँ और छत आदि सब निकाल दिए और पलंग व चंदन की लकड़ी से बने अन्य सामान निकाल कर कृष्ण को देते हुए बोले, ‘महात्मन, आपकी आवश्यक्तानुसार लकड़ी का इंतज़ाम हो गया है।’ लकड़ी लेते हुए कृष्ण बोले, ‘कर्ण, तुमने हमारे यज्ञ के लिए इतनी क़ीमती चीजों को क्यों तोड़ दिया?’ दोनों हाथ जोड़े कर्ण बोले, ‘महात्मन, यह सभी चीजें तो फिर बनाई जा सकती हैं। लेकिन अगली बार आप मेरे द्वार आएँगे या नहीं, मुझे नहीं मालूम। इसलिए मैं अतिथि को अपने द्वार से ख़ाली हाथ नहीं जाने देना चाहता हूँ। यह सुनकर भगवान श्रीकृष्ण ने कर्ण को आशीर्वाद दिया और वहाँ से चल दिए।


दोस्तों, अगर आप उपरोक्त कहानी पर गौर करेंगे तो पाएँगे कि जो सामान देकर कर्ण ने भगवान श्री कृष्ण की माँगों को पूरा किया था वह सब चीजें युधिष्ठिर के पास भी थी, किंतु मना करते समय उन्हें उनका ख़याल नहीं आया। इस आधार पर देखा जाए तो महाराज युधिष्ठिर विचार से दानी थे और कर्ण कर्म और स्वभाव से दानी और उदार था। हममें से अधिकांश लोगों का स्वभाव ऐसा ही होता है। लोग दान-धर्म, उदारता, मदद आदि की बातें तो बहुत करते हैं लेकिन मौक़ा आने पर पीछे हट जाते हैं। इसीलिए मैंने पूर्व में कहा था, ‘किसी बात को कहना और कही हुई बात को पूरा करने का भाव होना, दो बिलकुल अलग-अलग बातें हैं।’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर


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