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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

कर्मों की शक्ति…

Oct 17, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, महत्वाकांक्षी होना निश्चित तौर पर अच्छी बात है लेकिन किसी भी अन्य वस्तु की अति के समान ही इसकी भी अति सामान्यतः ख़तरनाक या चुनौतीपूर्ण रहती है क्योंकि किसी भी चीज को अति में पाने के लिय ेआपको उस पर अतिरिक्त फ़ोकस और समय लगाना पढ़ता है, जिसकी पूर्ति के लिए आपको अपनी किसी अन्य प्राथमिकता की बलि देनी पढ़ती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ग़रीबी में जीते हुए अमीरी को मारना है। अपनी बात को मैं आपको एक कहानी के माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ।


एक व्यापारी बड़ा ही महत्वाकांक्षी था, वह हर पल सिर्फ़ और सिर्फ़ पैसा कमाने के विषय में सोचा करता था। उसका मानना था कि पैसा साम, दाम, दंड या भेद किसी भी तरह क्यों ना आए वह लोगों की निगाह में आपकी क़ीमत बढ़ाता है। एक दिन जब व्यापारी व्यवसायिक कार्य से पड़ोस के गाँव जा रहा था तभी रास्ते में पड़ने वाले जंगल में उसका ध्यान एक पहुँचे हुए संत की समाधि और उसके पास रखे शिलालेख पर गया। वह उत्सुकता वश शिलालेख के पास गया और उसे पढ़ने लगा। उस शिलालेख पर लिखा था, ‘इस समाधि के नीचे ८४ हाथों की गहराई पर मैंने अनमोल ख़ज़ाने का नक़्शा छुपा रखा है। जो भी इस ख़ज़ाने को पाना चाहता है वह यहाँ खोद कर ख़ज़ाने का नक़्शा ले जाये। बस इसके लिए शर्त इतनी है कि ख़ज़ाने को पाने के इच्छुक इंसान को इस स्थान पर बिना कुछ खाये-पिये अकेले ही गड्ढा खोदना होगा।


इस शिलालेख को पढ़ उस महत्वाकांक्षी व्यापारी के अंदर लालच जाग गया और वह अगले दिन सुबह ४ बजे अकेला ही वहाँ गड्ढा खोदने के लिए पहुँच गया। कई घंटों तक मेहनत करने के बाद वह व्यापारी ८४ हाथ गड्ढा खोद पाया। गड्ढे में थोड़ा टटोलने पर उसे एक और शिलालेख मिला जिसे पढ़ते ही इस महत्वाकांक्षी व्यापारी के होश उड़ गए और अक़्ल ठिकाने आ गई। असल में उस शिलालेख पर लिखा था, ‘हे मूर्ख इंसान मुझे लगता है इस संसार के सबसे लालची प्राणी तुम ही हो। पैसे के लिए भूखे प्यासे रहकर अकेले ही ८४ हाथ का गड्ढा खोदते वक़्त तुम यह भूल गये कि तुम कितना भी पैसा इकट्ठा कर लो अंत में तुम्हें ख़ाली हाथ इसी मिट्टी में मिलना है। मुझे तुम्हारी यह दशा देख हंसी आ रही है। वैसे इस हंसी का एक और कारण है, तुमने इस दौलत को इकट्ठा करने के जतन में अपनी अगली ८४ लाख योनियों की यात्रा को सुगम बनाने के लिए कुछ किया ही नहीं है। याद रखना जिस तरह तुमने रोटी-पानी को छोड़ अकेले ही ८४ हाथ कुआँ अकेले खोदा है ठीक वैसे ही तुम्हें अकेले ही ८४ लाख योनियों से पार पाना है।’ इस शिलालेख ने व्यापारी को झकझोर कर रख दिया क्योंकि उसने व्यापारी को एहसास करा दिया था कि एक दिन उसे भी इसी मिट्टी में ख़ाली हाथ दफ़्न होना है। वह किसी तरह उस गड्ढे से बाहर आया और आज तक इकट्ठी की गई धन-दौलत से दान-पुण्य कर अपनी अगली यात्रा की तैयारी करने लगा।


इस सीधी सी कहानी से मिली सीख तो दोस्तों सौ टका सही है, जब रावण क्या राम, कंस क्या कृष्ण शक्तिशाली, सत्ताधारी होते हुए भी सदा के लिए इस धरती पर नहीं रह पाये तो हमारे जैसे साधारण जीव का क्या मोल है? हम सब तो बड़े साधारण से लोग हैं। इसलिए हमें हमेशा याद रखना चाहिये कि यह मिट्टी हम जैसे साधारण लोगों यानी हम में से किसी को भी छोड़ने वाली नहीं है। यह एक ना एक दिन हम सभी को अपने अंदर मिला लेगी, हाँ यह ज़रूर संभव है कि मिट्टी में मिलाने का इसका तरीक़ा हर किसी के लिये थोड़ा अलग हो। इसलिए साथियों ग़रीबी में जीकर अमीर मरने से अच्छा है कि अपना समय, ऊर्जा और ध्यान ऐसे कर्मों में लगाओ कि अच्छे कर्मों की असली दौलत को मिट्टी में मिलते समय अपने साथ ले जा सको। एक बार विचार कर देखियेगा ज़रूर दोस्तों…


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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