कर्म अच्छे तो बैकुंठ यहीं पर…
- Nirmal Bhatnagar

- Jun 4
- 3 min read
June 4, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, बचपन में हम सभी ने अपने घर के बुज़ुर्गों से एक बात अवश्य सुनी होगी, “अच्छे कर्म करोगे तो बैकुंठ जाओगे।” उस समय हम बैकुंठ को बादलों के ऊपर कहीं स्थित एक दिव्य लोक मानते थे, जहाँ केवल पुण्यात्माओं को प्रवेश मिलता है। लेकिन जैसे-जैसे जीवन को समझने का अवसर मिला, मुझे लगा कि शायद इस कथन का अर्थ केवल मृत्यु के बाद मिलने वाले किसी लोक तक सीमित नहीं है। संभव है कि हमारे ऋषि-मुनि इस सूत्र के ज़रिए हमें जीवन जीने का एक गहरा सूत्र समझाना चाहते थे कि स्वर्ग भी यहीं है और नर्क भी। इसी तरह बैकुंठ भी यहीं है और ब्रह्मलोक भी। चलिए, अपनी समझ के हिसाब से इसे मैं आपको समझाने का प्रयास करता हूँ-
दोस्तों, वास्तव में “वैकुण्ठ” शब्द का अर्थ ही है, “जहाँ कुंठा न हो।” अर्थात् ऐसी जगह जहाँ निष्क्रियता न हो, अकर्मण्यता न हो, निराशा न हो, हताशा न हो, आलस्य न हो और अभाव की मानसिकता न हो। याने ऐसी स्थिति जहाँ मनुष्य अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा, सकारात्मकता और कर्मशीलता के साथ जीवन जी रहा हो। चलिए, इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए, कोई व्यक्ति दिन-रात शिकायतों में डूबा रहता है, हर परिस्थिति को दोष देता है, कुछ नया करने का साहस नहीं करता, अपने भाग्य को कोसता रहता है और जीवन को बोझ समझकर जीता है, तो क्या वह किसी नर्क से कम जीवन जी रहा है? और दूसरी ओर, यदि कोई व्यक्ति कठिनाइयों के बीच भी आशा बनाए रखता है, अपने कर्तव्यों को निष्ठा से निभाता है, दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाता है और हर दिन को एक अवसर मानकर जीता है, तो क्या वह बैकुंठ में नहीं रह रहा?
दोस्तों, पुराणों में कहा गया है कि बैकुंठ में रहने वाले अजर और अमर होते हैं। पहली नज़र में यह बात असंभव लगती है, क्योंकि इस संसार में हर व्यक्ति को एक दिन शरीर छोड़ना ही पड़ता है। लेकिन यदि हम गहराई से देखें तो इंसान वास्तव में तीन बार मरता है। पहली मृत्यु तब होती है जब वह अपनी ही नज़रों में गिर जाता है। जब उसका आत्मसम्मान, उसका चरित्र और उसके जीवन का उद्देश्य समाप्त हो जाता है। दूसरी मृत्यु तब होती है जब वह अपने नश्वर शरीर को छोड़ देता है और तीसरी मृत्यु तब होती है जब उसे याद करने वाला अंतिम व्यक्ति भी इस संसार से चला जाता है। यही कारण है कि कुछ लोग शरीर से विदा होने के बाद भी जीवित रहते हैं। उनके विचार, उनके कार्य, उनका योगदान और उनकी प्रेरणा समाज की स्मृतियों में जीवित रहती है। वे अमर हो जाते हैं। लेकिन यह अमरता धन, पद या प्रसिद्धि से नहीं मिलती। यह अमरता सेवा से मिलती है। यह अमरता तब मिलती है जब हमारा जीवन केवल “मेरे लिए” नहीं बल्कि “हमारे लिए” बन जाता है। जब हम किसी निराश व्यक्ति को आशा देते हैं, किसी विद्यार्थी को दिशा देते हैं, किसी ज़रूरतमंद की सहायता करते हैं, किसी का आत्मविश्वास बढ़ाते हैं, तब हम केवल एक अच्छा कार्य नहीं करते, हम अपनी अमरता का बीज बोते हैं।
इसलिए दोस्तों, यदि सचमुच बैकुंठ जाना है तो मृत्यु के बाद की प्रतीक्षा मत कीजिए। आज ही अपने भीतर की कुंठा, आलस्य, निराशा और अकर्मण्यता को विदा कीजिए। अपने जीवन को सेवा, सृजन, सकारात्मकता और कर्मयोग से भर दीजिए क्योंकि बैकुंठ कोई स्थान नहीं है जहाँ हम मरने के बाद पहुँचते हैं। बैकुंठ वह अवस्था है जहाँ हम जीते-जी पहुँच जाते हैं। इसलिए ही मैं कहता हूँ, “अमर वह बनता है जो अपने लिए नहीं, लोगों के लिए जीना सीख जाता है।”
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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