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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

कर्म से बनाएँ तक़दीर…

Jan 10, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…



दोस्तों, कहते हैं ना सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं। ठीक इसी तरह अच्छे कर्म कभी बर्बाद नहीं जाते अर्थात् उसका परिणाम देर से ही सही मिलता ज़रूर है। सुनने-पढ़ने में यह बात आपको बड़ी किताबी लग सकती है क्योंकि इसे सुनते समय आपके मन में सत्य और अच्छे कर्मों का बेहाल परिणाम घूमने लगा होगा। लेकिन दोस्तों निराश होकर लड़ना छोड़ना, डर कर पीछे हटना या भाग जाना किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। अगर आप सही हैं, आपने उचित कर्म किए हैं तो यक़ीन मानियेगा उसका सकारात्मक परिणाम देर-सबेर आपको मिल ही जाएगा। अपनी बात को मैं आपको गुजरात के सूरत शहर में अपने दो बच्चों महेश और सुरेश के साथ रहने वाले धनसुख भाई की कहानी से समझाने का प्रयास करता हूँ। आगे बढ़ने से पहले साथियों मैं आपको बता दूँ कि निजता का सम्मान करते हुए मैंने इस लेख के सभी किरदारों के नाम बदल दिए हैं।

धनसुख भाई वैसे रत्नों के व्यापारी थे और उनका कारोबार पूरी दुनिया में फैला हुआ था। इसी कारण सूरत में उनकी साख और मान-सम्मान दोनों ही ज़बर्दस्त थे। पिता के रुतबे और मुनाफ़े को देख बड़े बेटे महेश में अहंकार ने जन्म ले लिया था और इसी कारण बीतते समय के साथ उसमें घमंड, ईर्ष्या, द्वेष, लालच आदि जैसे नकारात्मक भावों या अवगुणों ने जन्म ले लिया था। इन्हीं के चलते अब वह कई बार बेईमानी कर अतिरिक्त मुनाफ़ा भी कमा लिया करता था। वहीं दूसरी ओर छोटा बेटा सुरेश एकदम सरल, शरीफ और सुलझा हुआ इंसान था।


एक दिन अचानक अल्प बीमारी के बाद धनसुख भाई का देहांत हो गया और व्यापार चलाने की सारी ज़िम्मेदारी दोनों भाइयों के ऊपर आ गई। कुछ दिन तो सब कुछ ठीकठाक चलता रहा। लेकिन जल्द ही महेश ने बड़ा भाई होने के नाते व्यवसाय में अपनी मर्ज़ी चलाना शुरू कर दिया और ज़्यादा मुनाफ़े के लालच में बेईमानी और मक्कारी भरे फ़ैसले लेने लगा। जैसे असली रत्न के नाम पर लोगों को नक़ली रत्न देना, आदि।


जब यह बात सुरेश को पता चली तो उसे पहले तो बड़ा दुख हुआ और उसने बड़े भाई को समझाने का प्रयास करा। लेकिन इसपर सुरेश एकदम बिफर गया और उसने पिता की जायदाद और व्यापार का बँटवारा करने का आदेश सुना दिया। इस कार्य में भी महेश की नीयत अच्छी नहीं थी। उसने किसी तरह मुख्य व्यवसाय को अपने नाम करवा कर सुरेश के हिस्से पर भी क़ब्ज़ा कर लिया। भाई के व्यवहार से दुखी सुरेश ने शहर के दूसरे कोने में शून्य से रत्नों का व्यवसाय शुरू किया। ईमानदारी की नींव पर शुरू हुआ यह व्यापार जल्द ही चल निकला।


एक ओर जहाँ ईमानदारी की वजह से सुरेश की ख्याति देश-विदेश में बढ़ने लगी, जिसकी वजह से उसका व्यवसाय दिन दूना, रात चौगुना बढ़ने लगा। वहीं दूसरी ओर महेश की करतूतों की पोल खुलने लगी और उसके व्यवसाय का दायरा सिमटने लगा। अंततः स्थिति एक दिन इतनी विकट हो गई कि महेश को कर्जा उतारने और खर्चा चलाने के लिए अपना घर, दुकान, सामान आदि सब कुछ बेचना पड़ा और जल्द ही वह परिवार सहित सड़क पर आ गया।


राजा से रंक बने महेश को अब अपने किए पर पछतावा हो रहा था। लेकिन सिर्फ़ पछतावे से होना क्या था, महेश को तो अब अपने कर्मों का फल भोगना था, जो उसकी तक़दीर बन, उसके सामने था। किसी तरह वह एक-एक दिन कर अपना जीवन काट रहा था। दूसरी ओर सुरेश की तक़दीर अब पलट चुकी थी। अब वह अपनी ईमानदारी के कारण रंक से राजा बन गया था। जब उसे अपने भाई महेश की स्थिति की खबर मिली तो वह बहुत दुखी हो गया। वह दौड़ता हुआ तुरंत अपने बड़े भाई के पास गया और उनके लाख मना करने के बाद भी अपने साथ ले आया। यह तक़दीर का खेल ही तो था कि जिस भाई को आपने सड़क पर पहुँचाया था आज उसी ने आपको सहारा दिया।


दोस्तों, तक़दीर कब किसके साथ क्या खेल खेल दे, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता। हाँ, इतना ज़रूर है कि आपके कर्म ही आपकी तक़दीर लिखते हैं। जैसा कि खेल महेश और सुरेश के साथ कर्म आधारित तक़दीर ने खेला था। इस लिए दोस्तों हमेशा अच्छे कर्म करते रहना चाहिए क्या पता कल तक़दीर आपके साथ क्या खेल खेल जाये।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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