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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

कुशल चालक की तरह चलाएँ अपने जीवन की गाड़ी को…

Oct 3, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, हँसना, खुश और शांत रहना, वर्तमान में जीना, सच बोलना, समभाव रखना आदि कुछ ऐसे भाव हैं, जो ईश्वर के आशीर्वाद से हम सब इस दुनिया में जन्म लेते वक़्त साथ लेकर आते हैं। लेकिन रोज़मर्रा के जीवन में मिलने वाले अनुभवों के कारण कई बार हम उन्हें भूल जाते हैं और दुखी, परेशान, बेचैन रहकर अपने अतीत को कोसते हुए, भविष्य की अनिश्चितताओं में खो जाते हैं। जी हाँ साथियों, हँसना, खुश और शांत रहना, वर्तमान में जीना, सच बोलना, समभाव रखना आदि हमारे कुछ निज स्वरूप हैं अर्थात् यह सब हमारे अंदर जन्म से मौजूद हैं। लेकिन मन की चंचल प्रवृति और उसकी वजह से उपजी इच्छाओं, अपेक्षाओं के कारण इन सब को भूलकर हम अशांत रहने लगते हैं।


पढ़ने में आपको थोड़ा अजीब लग रहा होगा ना साथियों? लेकिन आप स्वयं सोचकर देखिए क्या आपने आज तक किसी को ग़ुस्से में पैदा होते देखा या सुना है? नहीं ना! इसीलिए मैंने पूर्व में कहा कि हँसना, खुश और शांत रहना, वर्तमान में जीना, सच बोलना, समभाव रखना आदि हमारे कुछ निज स्वरूप हैं। इन्हें पाने के लिए आपको बाहर से कुछ करने की ज़रूरत नहीं है अपितु अपने अंदर झांककर इसे एक बार फिर खोजने की आवश्यकता है। अपनी बात को मैं आपको एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ।


चलिए बताइये, क्या कपड़े पर चमक उसे साबुन से धोने की वजह से आती है? नहीं ना, चमक तो कपड़े में होती है, बस साबुन अगर उस पर कोई दाग या गंदगी लगी हो तो उसे हटाने के लिए काम आता है। सही कहा ना साथियों? ठीक इसी तरह हँसने, खुश और शांत रहने, वर्तमान में जीने, सच बोलने, समभाव रखने आदि के लिए हमें कुछ अतिरिक्त प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है। यह सब तो हमारे अंदर ही मौजूद है; ईश्वर ने यह सब तो हमें पहले से ही दे रखा है। हमें तो बस अपनी इच्छाओं, अपेक्षाओं, आकांक्षाओं पर क़ाबू पाकर सहज रहते हुए इसे नित्य अपने अंदर खोजना है।


जी हाँ साथियों, जिस तरह दवाई बीमारियों को दूर करने के लिए होती है, स्वस्थ शरीर बनाने के लिए नहीं। स्वस्थ शरीर तो हमें ईश्वर ने पहले से ही दिया था, हमने ही उसका सही तरीक़े से ध्यान नहीं रखा इसलिए वह अस्वस्थ हो गया। अब उसे ठीक करने के लिए दवाई की मदद ली जा सकती है, लेकिन वह भी उसे पहले जैसा या उससे बेहतर नहीं बना सकती। ठीक यही स्थिति हमारे अंतर्मन की भी होती है। ईश्वर ने हमें एकदम स्वस्थ मन दिया था लेकिन हमने ही उसे अशांत, उदास, निराशा, हताशा या किसी भी तरह की नकारात्मकता देने वाले विचारों से बचाना होगा।


इसका अर्थ यह क़तई नहीं है कि जीवन में अशांत, उदास, निराश, हताश करने या नकारात्मक अनुभव देने वाली घटनायें घटना बंद हो जायेंगी या हम किसी तरह उसे रोक लेंगे। वह सब अपनी जगह चलता रहेगा लेकिन जिस तरह एक कुशल वाहन चालक रोड पर चलते समय अपने वाहन को दुर्घटना से बचाता है ठीक वैसे ही हमें जीवन में घटने वाली तमाम नकारात्मक घटनाओं से अपने अंतर्मन को बचाना होगा। इसके लिए हमें अशांत, उदास, निराश, हताश करने या नकारात्मक अनुभव देने वाले कर्मों से बचना होगा।


जी हाँ साथियों जिस तरह विवेक से गाड़ी चलाना हमें दुर्घटना से बचाता है, ठीक वैसे ही हमें क्लेश, कलह, विवाद आदि की स्थितियों से बचना होगा। हालाँकि यह स्थितियाँ बार-बार, नये-नये रूप में हमारे सामने आयेंगी और हर बार हमें कुशल वाहन चालक की तरह समझदारी से अपने जीवन की गाड़ी को रोज़ इनसे बचाते और वर्तमान में समभाव से जीते हुए अपने लक्ष्य याने हंसी, ख़ुशी, शांति, सच्चाई आदि की ओर ले जाना होगा।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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