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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

क्रोध से बचना हो तो अपनायें यह उपाय…

Nov 2, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

आईए साथियों, आज के लेख की शुरुआत महात्मा बुद्ध के एक क़िस्से से करते हैं। महात्मा बुद्ध रोज़ की ही तरह अपने शिष्यों को जीवन की सही राह दिखाने के लिए प्रवचन दे रहे थे। ठीक उसी समय प्रवचन स्थल के बाहर से एक व्यक्ति ऊँची आवाज़ में लगभग चिल्लाते हुए बोला, ‘भंते(गुरुजी), आज आप मुझे धर्म सभा में में आने की अनुमति क्यों नहीं दे रहे हैं?’ महात्मा बुद्ध ने उस व्यक्ति की बात को सुन कर भी अनसुना कर दिया। वह एक बार फिर थोड़ा और ज़ोर से चिल्लाते हुए बोला, ‘भंते, मुझे धर्म सभा में क्यों नहीं आने दिया जा रहा है?’ महात्मा बुद्ध ने इस बार भी उसकी आवाज़ को नज़रंदाज़ करते हुए, अन्य शिष्यों के साथ अपनी चर्चा जारी रखी। उन्हें ऐसा करते देख वहाँ मौजूद एक अन्य शिष्य बाहर खड़े शिष्य का समर्थन करते हुए महात्मा बुद्ध से बोला, ‘भंते! बाहर खड़ा आपका शिष्य आपसे बार-बार धर्म सभा में आने देने की गुज़ारिश कर रहा है। आप उसे अंदर आने की आज्ञा क्यों नहीं दे रहे हैं? कृपया उसे अंदर आने की आज्ञा देकर, सत्संग का लाभ लेने दें।’


इतना सुनते ही महात्मा बुद्ध एकदम दृढ़ स्वर में बोले, ‘नहीं, आज उसे धर्म सभा में आने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। वह अछूत है।’ महात्मा बुद्ध का जवाब सुन सभी शिष्य दुविधा में पड़ गए और सोचने लगे महात्मा कब से छूत-अछूत, जात-पात, ऊँच-नीच मानने लगे। वे तो हमेशा हर इंसान को एक नज़र से देखा करते थे और यही बात अपने सभी शिष्यों को भी समझाया करते थे।


शिष्यों की दुविधा या यूँ कहूँ मन के भावों को महात्मा बुद्ध तुरंत भाँप गए और अपनी बात को दोहराते हुए बोले, ‘हाँ! तुमने सही सुना है वह अछूत है क्योंकि आज वह अपनी पत्नी से लड़ कर आया है।’ महात्मा बुद्ध की बातों से शिष्य और ज़्यादा उलझन में पड़ गए और वे प्रश्नवाचक निगाहों से बुद्ध को देखने लगे। बुद्ध ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘क्रोध मानसिक शांति को भंग करता है और अशांत मन मानसिक हिंसा करता है और मानसिक हिंसा ही शारीरिक हिंसा में परिवर्तित हो जाती है। इसलिए मेरा मानना है कि क्रोध के कारण ही शारीरिक हिंसा होती है। इतना ही नहीं क्रोधित व्यक्ति की मानसिक तरंगें आस-पास मौजूद लोगों को भी प्रभावित करती है, इसलिए मैंने उसे अछूत कहा।’ इतना कहकर महात्मा बुद्ध कुछ पलों के लिए एकदम चुप हो गए फिर पूर्ण दृढ़ता के साथ बोले, ‘आज उसे धर्म सभा के बाहर खड़े रहकर ही पश्चाताप करना चाहिये। पश्चाताप की अग्नि उसे तपा कर शुद्ध करेगी।’


कहने की ज़रूरत नहीं है साथियों कि महात्मा बुद्ध के वचनों को सुन सभी शिष्यों को छूत-अछूत, जात-पात, ऊँच-नीच याने सामाजिक अस्पृश्यता का असली मतलब समझ आ गया होगा और साथ ही घर पर झगड़ कर धर्म सभा में आए व्यक्ति को भी बहुत पश्चाताप हुआ होगा और उसने कभी क्रोध ना करने का प्रण ले लिया होगा।


असल में दोस्तों, क्रोध वाक़ई में ही इतना नकारात्मक भाव है, यह आपको सिर्फ़ और सिर्फ़ दर्द ही दे सकता है। खुशहाल जीवन जीने के लिए इससे दूर ही रहना बेहतर है। अगर आप वाक़ई इससे दूर होना चाहते हैं तो निम्न दो बिलकुल साधारण सी बातों को हमेशा याद रखियेगा जिनकी वजह से सामान्यतः किसी भी व्यक्ति को क्रोध आता है। पहली, आपके सही होने के बाद भी दूसरों द्वारा आपको ना स्वीकारना और दूसरी, ग़लत हो जाने पर क्रोध करना। ऐसी स्थिति में सिर्फ़ एक छोटी सी बात याद रखियेगा, अगर आप सही हैं तो क्रोध करने की आवश्यकता ही नहीं हैं और अगर आप ग़लत हैं तो आपको क्रोध करने का अधिकार ही नहीं है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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