क्षमा करने वाला कभी हारता नहीं…
- Nirmal Bhatnagar

- Jan 27
- 3 min read
Jan 27, 2026
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

यकीन मानियेगा दोस्तों, हम सब अपने जीवन को सर्वश्रेष्ठ तरीक़े से जी पाएँ, इसलिए ईश्वर ने हमें कई विशेष शक्तियों के साथ इस दुनिया में भेजा है। क्षमा याने फॉरगिवनेस भी एक ऐसी ही शक्ति है, जो दिखाई तो नहीं देती, लेकिन इंसान को भीतर से हल्का, मुक्त और शांत बना देती है। लेकिन हममें से ज़्यादातर लोग इस शक्ति का कभी लाभ ही नहीं उठा पाते क्योंकि हमें लगता है कि लोगों को माफ़ करना कठिन है। इसकी मुख्य वजह इस सोच का होना है कि, “मैं तो कभी गलती करता ही नहीं हूँ” या “मैं तो 90% सही हूँ ज़्यादा गलती तो उसी की है।” या फिर “उसने जो किया, वह सर्वदा अनुचित था।” याने कुल मिलाकर ख़ुद को हर हाल में सही मानना ही अपनी शक्ति का फ़ायदा ना उठा पाने का मुख्य कारण है और जब आप हमेशा दूसरों को ग़लत मानते हैं तब आप दूसरों के कर्मों का बोझ अपने मन पर ढोने लगते हैं। याने गलती किसी और की होती है, लेकिन क्रोध, पीड़ा और कड़वाहट हम अपने भीतर पाल लेते हैं, जो बीतते वक्त के साथ हमारे स्वाभिमान या कई बार अहंकार को चोट पहुँचाता है।
दोस्तों, जब हमारा स्वाभिमान या अहंकार आहत होता है, तो हम न्याय और सुधार की अपेक्षा रखने लगते हैं या कम से कम बदला नहीं तो स्वीकारोक्ति की अपेक्षा रखते हैं और बार-बार मन ही मन कहते हैं, “मैं सही हूँ।” “मेरे साथ गलत हुआ है।” पर दोस्तों, इस बात पर कभी ध्यान नहीं देते हैं कि हम इस “सही होने” की क्या कीमत चुका रहे हैं? यकीन मानियेगा; इस सही होने की क़ीमत हम बेचैनी, नींद का टूटना, मन का भारी होना और रिश्तों में दूरी जैसी बातों से चुकाते हैं।
आइए, इस बात को हम महात्मा गांधी के जीवन में घटी एक सच्ची घटना से समझने का प्रयास करते हैं। दक्षिण अफ़्रीका में, एक बार गांधी जी को रंगभेद के कारण ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। यह निश्चित तौर पर अपमानजनक था और उनके पास इसपर क्रोध करने का पूरा अधिकार था। लेकिन उन्होंने क्रोध करना या बदला लेने का विकल्प नहीं चुना, उन्होंने क्षमा को चुना। बाद में इस विषय पर चर्चा करते वक्त उन्होंने कहा, “अगर मैं उस अपमान को अपने भीतर पाल लेता, तो स्वतंत्रता की लड़ाई शुरू होने से पहले ही मैं भीतर से गुलाम बन जाता।” सोचिए दोस्तों, जिस व्यक्ति ने पूरे देश को आज़ादी का रास्ता दिखाया, वह जानता था कि बिना क्षमा के कोई भी सच्चा परिवर्तन संभव नहीं।
दोस्तों, क्षमा का अर्थ यह नहीं है कि जो हुआ, वह सही था। क्षमा का अर्थ यह है कि आप अब उस घटना को अपने वर्तमान और भविष्य को ज़हर बनाने की अनुमति नहीं देंगे। जब हम दिल से क्षमा करते हैं, तो हम झुकते हैं, नर्म होते हैं, और भीतर से मजबूत बनते हैं। हम किसी से बड़े नहीं बनते, हम अपने बोझ से मुक्त हो जाते हैं।
दोस्तों, क्षमा करने से सिर्फ़ रिश्ते ही नहीं सुधरते, हम स्वयं सुधरते हैं। जब हम माफ़ कर देते हैं, तो न कोई पछतावा बचता है, न कोई गुस्सा, न कोई भारीपन। हम हल्के हो जाते हैं और मन से हल्का इंसान ही जीवन में आगे बढ़ पाता है। एक बात और याद रखियेगा, दया कोई रणनीति नहीं है, दया जीवन जीने का तरीका है। यह इस उम्मीद में नहीं की जाती कि सामने वाला बदलेगा। यह इसलिए की जाती है कि आप भीतर से मुक्त रह सकें।
दोस्तों, अगर क्षमा और दया की शक्ति से आप अपने जीवन को बेहतर बनाना चाहते हैं तो आज अपने आपसे कुछ छोटे से प्रश्न करियेगा, पहला, “मेरे जीवन में क्या कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसे मैंने अब तक माफ़ नहीं किया? दूसरा, क्या उस व्यक्ति को माफ़ न करने की कीमत मैं हर दिन चुका रहा हूँ? दोस्तों, अगर इन प्रश्नों के जवाब ‘हाँ’ में आए, तो आज ही उस व्यक्ति को माफ कर छोड़ दीजिएगा। जो बीत गया, उसे जाने दीजिए। जिसे बदल नहीं सकते, उसे पकड़कर मत रखिए क्योंकि क्षमा करने वाला हारता नहीं, वह आगे निकल जाता है। हल्के मन से, खुले दिल से, और शांति के साथ। यही सच्ची शक्ति है।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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