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क़िस्मत नहीं कर्म बनायेगा आपको महान…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Sep 10, 2023
  • 3 min read

Sep 10, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, इस दुनिया में लोग अक्सर असफल इसलिए नहीं होते हैं कि उनमें योग्यता या किसी अन्य चीज की कमी होती है। इसकी मुख्य वजह तो उसकी आदतों में छुपी होती है। मेरा मानना है कि हमारा जन्म कब, कहाँ, किन हालातों में होगा और हमारी मृत्यु कब होगी यह ज़रूर ईश्वर तय करता है। याने यह बातें ज़रूर हमारी क़िस्मत का हिस्सा हो सकती हैं लेकिन जन्म और मृत्यु के बीच के समय में आप अपना जीवन कैसे जियेंगे यह १०० प्रतिशत आपके कर्म पर निर्भर करता है। इसीलिए आलस्य, कार्य टालने की प्रवृति आदि को दुर्गुण माना गया है।


मेरी इस बात को आप इस छोटी सी कहानी से भी समझ सकते हैं। बात कई साल पुरानी है, गाँव में रामू नाम का एक बहुत ही अनुभवी, अपने काम में दक्ष, बड़ा भला आदमी रहता था। सब कुछ अच्छा और योग्य होने के बाद भी वह जीवन में बड़ा मुक़ाम हासिल नहीं कर पाया जिसका उसे बड़ा मलाल था। एक दिन वह एक पेड़ के नीचे बैठ कर अपनी क़िस्मत को कोसते हुए ईश्वर से शिकायत कर रहा था कि तभी वहाँ से गुजर रहे एक संत ने रामू की बात सुन ली। वे उसके पास गये और उसे समझाते हुए बोले, ‘वत्स, ईश्वर हर इंसान को बराबर क्षमता और मौक़े देता है। बस कुछ लोग उन मौक़ों को पहचानकर अपनी पूरी क्षमता से उसपर कार्य कर क़िस्मत वाले बन जाते हैं, तो कुछ लोग उन्हें गँवाकर क़िस्मत को दोष देते हुए जीते हैं।’ इतना सुनते ही रामू ने संत से बहस करना शुरू कर दिया।


संत ने उसे शांत करते हुए कहा, ‘वत्स, हो सकता है तुम्हारी और मेरी सोच में अंतर हो। चलो एक काम करो, मैं अपना पारस पत्थर तुम्हें ७ दिन के लिए देता हूँ। इससे जितना सोना चाहो बना लेना।’ आज पहली बार रामू को लगा कि मेरी क़िस्मत का ताला खुल गया है। वह तुरंत अपने घर गया और घर पर जितना भी लोहा था उसका सोना बनाकर बाज़ार में बेच आया। सोना बेच कर मिले पैसे से रामू वापस से लोहा ख़रीदने की योजना बनाने लगा।


योजना बनाने और सस्ता लोहा बेचने वालों को तलाशने में रामू ने अगले दो दिन बर्बाद कर दिये। तीसरे दिन वह लोहा ख़रीदने के लिए बाज़ार गया लेकिन लोहे का बढ़ा हुआ भाव देखकर यह सोचकर लौट आया कि जब सस्ता होगा तो ख़रीद लूँगा। अब वह रोज़ घर पर पड़े-पड़े ही लोहे का भाव पता करता और फिर महँगा है सोच ख़रीदना टाल देता। उसके मन में तो बस एक ही बात चल रही थी, ‘जिस दिन सस्ता होगा, उसी दिन ख़रीद लेंगे।’


एक दिन सुबह-सुबह वह संत रामू के पास पहुँचे और उससे बोले, ‘वत्स, तुम्हारे सात दिन पूरे हो गये हैं इसलिए मैं अपना पारस पत्थर वापस लेने आया हूँ। आशा करता हूँ अब तुम क़िस्मत वाले बन गये होगा।’ संत की बात सुनते ही रामू के पैर के नीचे से ज़मीन खनक गई। वह संत के पैर पकड़ कर एकदम गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘महाराज, कृपया इस पत्थर को आप मुझे कुछ और दिन के लिये दे दीजिए। लोहे का भाव ज़्यादा होने के कारण अभी तो मैं सोना बना ही नहीं पाया हूँ।’ लेकिन संत इसके लिए राज़ी नहीं हुए और रामू से पारस पत्थर वापस लेकर चले गये।


दोस्तों, जिस तरह काम टालने की अपनी बुरी आदत के कारण रामू ने क़िस्मत बदलने का एक ज़बरदस्त मौक़ा गँवा दिया था, ठीक उसी तरह की गलती अक्सर हम लोग भी करते हैं। आज जब ईश्वर प्रदत्त अच्छे स्वास्थ्य रूपी पारस पत्थर हमारे पास है, तब हम अपनी बुरी आदतों के कारण क़िस्मत बनाने के हाथ आये स्वर्णिम मौक़े को गँवा देते हैं और बाद में रामू की तरह पछताते हैं। उम्र के साथ साथियों, ईश्वर हम सभी को क़िस्मत बनाने के कई मौक़े देता है। जैसे, बचपन में पढ़ने का, युवावस्था में मेहनत करने का आदि लेकिन अपनी बुरी आदतों के कारण मौक़े गँवाना अक्सर आपको समझौता करते हुए जीवन गुज़ारने को मजबूर करता है। याद रखियेगा साथियों, जो इंसान अपने समय का उपयोग करना नहीं जानता है वही दुखी रहते हुए अपना जीवन जीता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

 
 
 

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