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खुद पर विश्वास रखो, राह मिलती जाएगी…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Sep 12, 2025
  • 3 min read

Sep 12, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, जीवन का एक कटु सत्य यह भी है कि लोग हमारी अच्छाइयों को तभी तक याद रखते हैं, जब तक हम अगली गलती नहीं कर देते। याने एक छोटी सी भूल हमारे द्वारा किए सभी अच्छे कार्यों पर भारी पड़ जाती है। लेकिन, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम रुक जाएँ, या हम अपनी ओर से प्रयास करना बंद कर दें या फिर अपने मूल्य और आत्मविश्वास को खो दें। याद रखियेगा, अगर आप वाक़ई में विजेता बनना चाहते हैं, तो आपको प्रशंसा और आलोचना दोनों से ही ऊपर उठकर कार्य करना होगा।


सच्चा विजेता न तो प्रशंसा पर घमंड करता है और ना ही आलोचना से टूटता है। इसलिए ही मैं हमेशा कहता हूँ, ‘ताली के बाद गाली और गाली के बाद ताली मिलती ही है।’ अर्थात्, आलोचना और प्रशंसा, दोनों ही अस्थायी होते हैं। जब कोई हमारी तारीफ़ करता है, तो हमें अच्छा लगता है, लेकिन वह स्थायी नहीं होती। इसी तरह आलोचना भी हमेशा के लिए नहीं होती। जीवन में उतार-चढ़ाव आते ही रहते हैं। इसलिए न तो प्रशंसा पर घमंड करें और ना ही आलोचना से टूटें। याद रखिएगा, दूसरों की राय के बजाय अपने आत्मविश्वास और ईश्वर पर विश्वास को मज़बूत बनाए रखना ही हमें सच्चा विजेता बनाता है।


अपनी बात को मैं आपको क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर के किस्से से समझाने का प्रयास करता हूँ। तेंदुलकर जब अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में लगातार रन बनाते थे, तब लोग उन्हें सिर-आँखों पर बिठाते थे। लेकिन जैसे ही कुछ मैचों में वे असफल हुए, प्रशंसा करने वाले उन्हीं लोगों ने सचिन की आलोचना करना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि कई बार उनसे कहा गया कि अब उनका समय खत्म हो गया है; उन्हें संन्यास ले लेना चाहिए। लेकिन सचिन ने न तो लोगों द्वारा की जा रही प्रशंसा के समय घमंड किया और न ही आलोचना से हतोत्साहित हुए। उन्होंने सिर्फ अपने खेल पर ध्यान दिया, उसमें आवश्यकतानुसार सुधार किया और एक बार फिर मैदान पर लौटकर इतिहास रच दिया। उनकी यह यात्रा हमें सिखाती है कि दूसरों की राय अस्थायी है, लेकिन हमारा आत्मविश्वास स्थायी होना चाहिए।


दोस्तों, यहाँ मैं आपसे जीवन को बेहतरीन बनाने का एक और सूत्र साझा करना चाहूँगा। आपने जहाँ खुशी खोई थी, उसे वहीं ढूँढना बंद कीजिए। जी हाँ, कई लोग बार-बार उसी जगह खुशी ढूँढते हैं, जहाँ उन्हें पहले निराशा मिली थी। उदाहरण के लिए, अगर कोई संबंध टूट गया है या कोई अवसर खो गया है, तो हम उसी चीज़ में लौटकर फिर से उम्मीद करने लगते हैं। लेकिन असली खुशी और प्रगति तभी मिलती है जब हम नई दिशा में कदम बढ़ाते हैं। अगर सचिन पुराने असफल मैचों की निराशा में ही उलझे रहते, तो शायद वे कभी 100 शतक लगाने का अद्भुत रिकॉर्ड नहीं बना पाते।


लेकिन आज के चकाचौंध भरे, दिखावे से पूर्ण युग में कहीं ना कहीं युवा इस सूत्र को भूलते जा रहे हैं। आज अक्सर वे मात्र 20–25 वर्ष की आयु में प्रशंसा पाने और सफल होने के लिए काम करते हैं और इस यात्रा में आलोचना से सामना होने पर डर जाते हैं। मेरा मानना है अगर वे वाक़ई इस उम्र में सफल होना चाहते हैं तो उन्हें यह याद रखना ज़रूरी है कि तारीफ़ और आलोचना दोनों क्षणिक हैं। वास्तविक शक्ति तो अपने अंदर विश्वास रखने में है। अगर वे उस शक्ति को पहचानेंगे तो ही वे तात्कालिक असफलताओं से बाहर निकलकर नए अवसरों की ओर बढ़ पायेंगे और सच्ची सफलता पा सकेंगे।


अंत में दोस्तों, मैं बस इतना ही कहूँगा कि जीवन में न तो प्रशंसा से अंधे बनो और न ही आलोचना से टूटो। बस खुद पर विश्वास रखो, ईश्वर पर आस्था रखो और अपना सर्वश्रेष्ठ देते रहो और याद रखो, खुशी वहीं मत खोजो जहाँ उसे पहले खोया था। हमेशा नई राहों पर बढ़ो, क्योंकि भविष्य हमेशा नए अवसर लेकर आता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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