• Nirmal Bhatnagar

खुश रहना हो तो ‘अटैच्ड डिटैचमेंट’ सीखें…

Updated: Aug 21

Aug 20, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, अक्सर आपने देखा होगा परिवार, रिश्ते, दोस्ती या चीजों से हम इतना प्रगाढ़ रिश्ता जोड़ लेते हैं कि वह रिश्ता ही बीतते समय के साथ हमारे लिए समस्या का कारण बन जाता है। असल में दोस्तों, वस्तुएँ या रिश्ते होना या उनकी चाह रखना कहीं से भी गलत नहीं है, लेकिन जब यह चाह आपकी मालिक बन जाती है, स्थिति तब बिगड़ना या विकराल रूप लेना शुरू कर देती है।


जी हाँ साथियों, इस बारीक से अंतर को समझना महत्वपूर्ण है, किसी रिश्ते या वस्तु से लगाव-जुड़ाव होना ग़लत नहीं है लेकिन अगर यही लगाव आप पर हावी होकर आपके निर्णय, आपकी प्राथमिकताओं को प्रभावित करने लगे, तो यह आपके जीवन की शांति और ख़ुशी छीन सकता है। अगर आप इस स्थिति को गहराई से समझने का प्रयास करेंगे तो आप पाएँगे की समस्या परिवार के लोगों, रिश्तेदारों या दोस्तों अथवा किसी वस्तु से अथाह लगाव होने से नहीं होती है, समस्या कि मूल जड़ तो उस व्यक्ति या वस्तु के प्रति आसक्ति से होती है। अगर हम इस अति आसक्ति से बचना सीख जाएँ, तो समस्या से निपटा जा सकता है। इस आसक्ति से बचने का अर्थ यह नहीं है कि आप जमाने या उपरोक्त बताई बातों से कट जाएँ और ना ही इसका अर्थ कम चाहने या किसी वस्तु के कम उपभोग करने से है। इससे बचने के लिए सबसे पहले तो आपको इस हक़ीक़त को स्वीकारना होगा की समय के साथ चीजें टूट सकती हैं, रिश्तों में खटास आ सकती है और हम अपने लक्ष्यों से भटक सकते हैं।


अगर आप आसक्ति की अधिकता से बचना चाहते हैं तो आपको ‘अटैच्ड डिटैचमेंट’ की कला को सीखना और उसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना पड़ेगा। सुनने में बड़ा विरोधाभासी सा लगने वाला यह विचार ‘अटैच्ड डिटैचमेंट’, असल में बहुत शक्तिशाली और प्रभावशाली होने के साथ आपके जीवन को बदलने की क्षमता रखता है। ‘अटैच्ड डिटैचमेंट’ का भाव हमें ऐसी मानसिक अवस्था को निर्मित करने में मदद करता है, जहाँ आप ज़रूरत से ज़्यादा चीजों या रिश्तों को रखने की इच्छा पर क़ाबू पा लेते हैं। इससे बचने के लिए सबसे पहले हमें इस हक़ीक़त को स्वीकारना होगा की जब हम वस्तु, विचार अथवा लोगों से अत्यधिक जुड़ जाते हैं, तब हम बहुत अधिक दुःख को पैदा करते हैं अर्थात् बहुत सारे ऐसे कारणों को जन्म देते हैं, जो हमें दुखी करने की क्षमता रखते हैं।


याद रखिएगा, जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है, सभी चीजें या वस्तुएँ, फिर चाहे वे अच्छी हों या बुरी, एक दिन समाप्त हो जाती है। जब आप इस भाव को दिल की गहराइयों के साथ स्वीकार लेते हैं, तब आप अपने आप को हर पल जीने की अनुमति देते हैं। अनासक्ति का भाव मुश्किल क्षणों में सही निर्णय लेने में, जीवन को सही दिशा देने में मदद करता है और साथ ही आपके दृष्टिकोण को मज़बूत बनाकर इच्छा या मन को जीतने या बदलने में मदद करता है।


दोस्तों, खुश, संतुष्ट और शांत रहने के लिए ‘अटैच्ड डिटैचमेंट’ की कला सीखने अर्थात् अनासक्ति का अभ्यास करने का मतलब यह नहीं है कि हमें सब कुछ त्यागना है या त्याग देना चाहिए या खुद को पूरी दुनिया से अलग कर लेना चाहिए। इसका अर्थ यह भी नहीं है की आप बिना लक्ष्य के जीवन जीना शुरू कर दें। ‘अटैच्ड डिटैचमेंट’ तो आपको विचार, वस्तु अथवा लोगों से जुड़े रहते हुए, अलग होना सिखाता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो, ‘अटैच्ड डिटैचमेंट’ को जीवन का हिस्सा बनाते हुए अनासक्ति के भाव के साथ जीना अर्थात् हर उस बात या चीज़ से बचना, जो आपके मन को क़ाबू में कर सकता है। ‘अटैच्ड डिटैचमेंट’ आपको हानिकारक लालच, अति के जुनून से दूर रहना अथवा उन आदतों से बचना सिखाता है जो हमारे जीवन के कई पहलुओं को या हमें नुक़सान पहुँचा सकते हैं। एक लाइन में कहूँ दोस्तों तो ‘अटैच्ड डिटैचमेंट’ का भाव आपको वर्तमान पल में जीना सिखाता है अर्थात् आप किसी भी विचार, वस्तु या व्यक्ति से तभी तक जुड़े रहते हैं, जब तक वो आपके पास रहता है या आपको आपकी शांति और ख़ुशी से जीने देता है। जैसे ही वह वस्तु, विचार या व्यक्ति आपकी शांति और ख़ुशी को प्रभावित करता है, आप उसके प्रति अनासक्ति का भाव विकसित कर, उससे दूर हो जाते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

50 views0 comments