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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

खुश रहने के लिए स्वीकार्यता का भाव रखें…

Feb 12, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…



दोस्तों, यक़ीन मानियेगा इस दुनिया में सबसे सुखी इंसान वह है, जो हर परिस्थिति में ख़ुश रहना जानता है। जिस दिन मुझे जीवन का यह महत्वपूर्ण सूत्र समझ आया था, उसी दिन से मैंने किसी ना किसी बहाने ख़ुद को यह याद दिलाना शुरू कर दिया था कि ‘मैं खुश हूँ।’ आपको मेरी बात थोड़ी अटपटी या अधूरी लग रही होगी, तो आगे बढ़ने से पहले मैं आपको याद दिला दूँ कि किसी बात को बार-बार कहना या मन ही मन दोहराना आपके अंतर्मन को उस बात के लिए प्रोग्राम करता है। वैसे भी माना जाता है कि स्वीकार्यता क्रमिक-विकास की सूचक है। अर्थात् जब हम किसी विषय में स्वीकार्यता का भाव रखते हुए आगे बढ़ते हैं, तब हमारा अंतर्मन उसी बात के लिए तैयार होना शुरू हो जाता है और हम पूर्ण मनोभाव के साथ जो भी घटित हो रहा है उसका सामना करने के लिए तैयार हो जाते हैं। इसीलिए मैंने पूर्व में कहा था कि ख़ुश रहने के लिए भी हमें अपने अंदर जीवन में घटने वाली हर घटना के लिए स्वीकारोक्ति का भाव विकसित करना होगा। चलिए, अपनी बात को मैं आपको एक कहानी से समझाने का प्रयास करता हूँ-


बात कई साल पुरानी है, छोटे से गाँव राजपुर में एक वृद्ध किसान, अपने इकलौते पुत्र के साथ रहता था। अपना जीवन चलाने के लिए उसके पास गाँव में एक छोटा सा खेत और एक गाय व एक घोड़ा था। एक दिन उसका घोड़ा कहीं भाग गया। वृद्ध किसान ने अपने पुत्र के साथ उसे खोजने का बहुत प्रयास किया लेकिन घोड़ा कहीं नहीं मिला। इस कारण किसान का पुत्र बहुत दुखी था। वृद्ध किसान के पड़ोसी भी उसको सांत्वना देने आये और कहा, ‘बहुत बुरा हुआ आपके साथ। मुझे लगता है, ईश्वर आपके प्रति बहुत निष्ठुर है।’ पड़ोसी की बात से विचलित होने के स्थान पर किसान पूर्व की तरह ही शांत रहते हुए बोला, ‘यह निश्चित रूप से ईश्वरीय कृपा है।’


इस घटना को अभी दो दिन ही हुए थे कि अचानक ही खोया हुआ घोड़ा वापस आ गया, लेकिन अकेला नहीं। चार अच्छे शक्तिशाली जंगली घोड़े भी उसके पीछे-पीछे आये। अब उस वृद्ध किसान के पास पाँच घोड़े हो गए थे। जिन्हें देख गाँव वालों की धारणा एक बार फिर इस वृद्ध किसान के प्रति बदल गई और वे बोलने लगे, ‘बहुत खूब! तुम तो बहुत भाग्यशाली हो।’ इस बार भी वृद्ध किसान ने बहुत ही समभाव से कृतज्ञ होते हुए कहा, ‘निश्चित रूप से यह भी ईश्वरीय कृपा ही है।’


पाँच घोड़ों को देख किसान का पुत्र भी बहुत उत्साहित था। वह जंगली घोड़े को जाँचने के लिए उसकी सवारी करने लगा, किन्तु वो घोड़े से गिर गया और उसका पैर टूट गया। गाँव वाले एक बार फिर उसके पास पहुँचे और बोलने लगे, ‘हमें लगता है यह घोड़े अपने साथ आपके लिये दुर्भाग्य लाये हैं, इसलिए आपके पुत्र का पाँव टूट गया है।’ वृद्ध किसान इस बार भी पूर्व की ही तरह समभाव वाली स्थिति में था। ऐसा लग रहा था मानो इन सभी घटनाओं का उसपर कोई असर ही नहीं पड़ रहा है। उसने इस बार भी वही कहा, ‘यह भी उस ईश्वर की कृपा ही है।’


इस घटना के कुछ दिनों बाद उस राज्य पर पड़ोसी राजा ने आक्रमण कर दिया। पड़ोसी राज्य की शक्तिशाली सेना से लड़ने के लिए राजा को बहुत सारे युवा सैनिकों की आवश्यकता थी। इसलिए उसने अपने सैनिकों को राज्य के सभी जवान युवकों को ज़बरदस्ती सेना में भर्ती कराने का हुक्म दिया। सैनिक अब गाँव-गाँव में घूम कर युवाओं को ज़बरदस्ती अपने साथ ले जाने लगे। वृद्ध किसान के गाँव में भी सैनिक आए और टूटे पाँव वाले उसके युवा पुत्र को छोड़, गाँव के सारे नवयुवकों को अपने साथ ले गए। जलन के बावजूद भी ऊपरी स्नेह दिखाते हुए गाँव वालों ने किसान को बधाई दी। किसान ने इस बार भी पूर्ववत् अपनी बात दोहराते हुए कहा, ‘निश्चित रूप से यह भी उस ईश्वर की ही कृपा है।’


आईए दोस्तों, अब हम इस कहानी से मिलने वाली सीख पर थोड़ी सी चर्चा कर लेते हैं। एक ओर गाँव वाले जहाँ घटनाओं पर प्रतिक्रिया दे रहे थे, वहीं किसान समभाव के कारण हर स्थिति को अपने लिए, ईश्वरीय योजना का हिस्सा मान, लाभप्रद मान रहा था, इसीलिए वह खुश था। जबकि सामान्य मनुष्य की प्रवृति इसके विपरीत होती है। वह मिथ्या सोच और भ्रम में पड़कर अपनी क़िस्मत को दोष देने लगता है और सोचता है कि ईश्वर मेरे साथ ही ऐसा क्यों करते हैं और इसी सोच के कारण दुखी रहते हैं। लेकिन अगर आप इस मिथ्या सोच और भ्रम से बच कर जीना सीख लें, तो आप निश्चित तौर पर हर हाल में खुश रह सकते हैं। एक बार आज़मा कर देखियेगा…


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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