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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

ख़ुद मरे बिना स्वर्ग नहीं दिखता…

Jan 5, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, हाल ही के कुछ वर्षों में मैंने अनुभव किया है कि आज के ज़्यादातर युवा सफल तो बनना चाहते हैं लेकिन अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलकर मेहनत नहीं करना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो आज के ज़्यादातर युवा आरामदायक परिस्थितियों में रहकर, बिना मेहनत करे ही ढेर सारे पैसे कमा कर सफल होना चाहते है। यह एक ऐसी समस्या जिसे मैं आजकल पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक लगभग हर क्षेत्र में देख रहा हूँ। अगर आप मेरी बात से सहमत ना हों तो कुछ युवाओं से बात कर के देख लीजिए। आपको सभी से दो बातें सामान्य रूप से सुनने को मिलेंगी। पहली, आजकल काम का बहुत अधिक लोड है और दूसरी, जितनी मेहनत करा रहे हैं उसके मुक़ाबले हमारी सेलरी या आमदनी बहुत कम है। इसके विपरीत अगर आप संस्था प्रमुखों से बात कर देखेंगे तो पायेंगे कि वे पैसे देने के लिए तो राज़ी हैं लेकिन उसके बाद भी उन्हें ट्रेंड या सीखने और मेहनत करने के लिए तैयार लोग नहीं मिल रहे हैं। वैसे यह स्थिति सिर्फ़ कर्मचारियों की नहीं है, जो युवा स्टार्टअप या एंटरप्रेन्योर के रूप में अपने व्यवसायिक जीवन की शुरुआत कर रहे हैं वे भी पिछली पीढ़ी के समान जीतोड़ मेहनत नहीं करना चाहते हैं।


मुझे तो लगता है दोस्तों, हमने बीजों से प्रेरणा लेना छोड़ दिया है। चलिए, एक बीज की जीवन यात्रा से मनुष्य की गति को समझने का प्रयास करते हैं। एक बीज अपने जीवन को तीन तरह से जी सकता है। पहला, वह स्वयं को मिट्टी में मिला दे या यूँ कहूँ, स्वयं को एक पौधे के रूप में विकसित कर ले। ऐसा करके वो ना सिर्फ़ अन्य प्रजातिओं को ख़ुशनुमा माहौल दे सकता है, बल्कि अपने जैसे कई बीजों को जन्म दे सकता है, जो अंततः उसके वंश को अनंत काल तक चलायमान रख सकता है। दूसरा, वह बीज ख़ुद को एक खाद्य पदार्थ के रूप में पेश कर दे, जो अंततः किसी प्राणी का पेट भरकर अंत में उसी मनुष्य द्वारा विष्ठा के रूप में त्याग दिया जाये और तीसरा, वह अन्य बीजों को मिटता देख डर जाए और संकीर्ण मानसिकता का परिचय देकर आत्मरक्षा के विषय में सोचे और किसी कोने में छुपकर पड़ा रहे। जहाँ अंततः उसे कीड़े-मकोड़ों द्वारा या फिर सड़न द्वारा नष्ट कर दिया जाएगा।


बीजों के समान ही मनुष्य भी अपने जीवन को तीन तरह से जी सकता है। पहला, ख़ुद के लक्ष्यों को पाने के लिए कार्य करते वक़्त वह सामाजिक हितों का ध्यान रखते हुए जीवन में आगे बढ़ता है और ख़ुद के साथ-साथ समाज को भी बेहतर बनाता है। जब आप ‘वसुदेव कुटुंबकम्’ को मूल मंत्र मान समाज की बेहतरी और संसार की सुख शांति को ध्यान में रखकर जीवन में आगे बढ़ते हैं, तब आप सही मायने में यशस्वी बन पाते हैं।


दूसरा, आप सिर्फ़ ‘मैं और मेरा परिवार’ की अवधारणा को आधार बना कर जीवन जीते हैं। याने, आप ख़ुद के और परिवार के स्वास्थ्य और ऐश्वर्य को प्राथमिकता देते हुए, उचित-अनुचित पर ध्यान दिये बिना पशु समान जीवन जीते हैं। जिसका अंतिम परिणाम सामान्यतः अकेलापन होता है। याने ऐसे मनुष्य अंत समय में विष्ठा समान हो जाते हैं, जिससे पूरा समाज दूर रहना चाहता है।


तीसरा, आप अपनी दुनिया ख़ुद तक ही सीमित कर जीवन जीते हैं। यह स्थिति अति संकीर्णता, अति स्वार्थीपन और अति कृपणता को दर्शाती है। सामान्यतः इसकी तुलना में बीज की तीसरी हालत से करता हूँ। इन लोगों के समाज में होने ना होने से इस दुनिया में किसी को कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता है।


इसलिए दोस्तों, मेरा मानना है कि जब ईश्वर ने हमको सर्वश्रेष्ठ योनि में जन्म देकर मनुष्य बनाया है तब हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम बीज की प्रथम स्थिति समान जीवन जिएँ। याने ख़ुद को मेहनत करते हुए इस तरह गलाएँ कि ख़ुद का जीवन बनाने के साथ-साथ समाज को ऊपर उठायें और इस लक्ष्य को हम बिना जी तोड़ मेहनत करे पा नहीं सकते हैं। इसीलिए तो शायद ईसा मसीह ने कहा है, ‘जो बीज तुम बोते हो, वह गले बिना नहीं उगता।’ इसलिए अगर ख़ुद का जीवन बनाना हो, तो ख़ुद को मेहनत की आग में झोंक दो।’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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