गुस्से का इलाज…
- Nirmal Bhatnagar

- Nov 15, 2025
- 3 min read
Nov 15, 2025
फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

आइए दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत वियतनाम के प्रसिद्ध संत थिक न्हात से जुड़े एक किस्से से करते हैं। एक बार थिक न्हात पूरी तरह एकांत वातावरण में ध्यान करने का निश्चय कर मठ के पास स्थित एक शांत झील के बीच नाव लेकर गए और बीच झील में लंगर डालकर आँख बंद कर गहरे ध्यान में चले गए।
उस वक्त झील बिल्कुल शांत थी और वहाँ ठंडी हवा धीमे-धीमे बह रही थी। याने वहाँ उस वक्त पूर्ण शांति थी। कुछ समय बाद अचानक से आई ‘धड़ाम’ की आवाज़ ने थिक न्हात को चौंकाया, असल में उनकी नाव को किसी दूसरी नाव ने ज़ोर से टक्कर मार दी थी। हालाँकि उस वक्त उनकी आँखें बंद थीं, लेकिन भीतर ही भीतर क्रोध की लहर उठ रही थी। वे मन ही मन सोचने लगे, “कौन है जिसने मेरे ध्यान में बाधा डाली?, क्या लोगों को शांति का भी मूल्य नहीं पता?”
इस घटना से ग़ुस्से में भरकर उन्होंने आँखें खोलीं और चिल्लाने के लिए सिर उठाया, तभी उन्होंने देखा की टकराने वाली नाव खाली थी। वह बस हवा और लहरों के साथ बहकर वहाँ तक आ गई थी। उस क्षण संत ठिठक गए और उन्हें एक गहरा बोध हुआ, “मुझे ग़ुस्सा उस नाव पर नहीं आया, बल्कि अपने भीतर की बेचैनी पर आया। नाव तो केवल एक कारण थी, ग़ुस्सा तो पहले से मेरे भीतर था।” उस दिन के बाद जब भी कोई व्यक्ति उन्हें अपमानित करता, या उनके रास्ते में रुकावट डालता, वे बस अपने आप से कहते, “वह व्यक्ति भी एक खाली नाव है। अगर मैं शांत रहूँ, तो कोई भी मुझे टक्कर नहीं दे सकता; गुस्सा नहीं दिला सकता।”
दोस्तों, यह किस्सा हमें याद दिलाता है कि सच्चा शत्रु बाहर नहीं, भीतर है। हममें से ज़्यादातर लोग यह मानते हैं कि हमें ग़ुस्सा “दूसरों” की वजह से आता है और अपनी बात को सही ठहराने के लिए हम कहते हैं कि “फलाने ने मुझे अपमानित किया”, “उसने मेरी बात नहीं मानी”, “उसने मेरा दिल दुखाया।”, इसलिए मैं नाराज हूँ या गुस्सा हूँ। जबकि सच्चाई यह है कि ग़ुस्सा किसी बाहरी व्यक्ति से नहीं, हमारी अपनी अपेक्षाओं से जन्म लेता है। जब चीज़ें हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होतीं, तो हमारा मन असंतुलित हो जाता है और यही असंतुलन ग़ुस्से के रूप में बाहर आता है। इसी बात को समझाते हुए महात्मा बुद्ध ने कहा था, “क्रोध को पकड़ कर रखना ऐसा है, जैसे किसी गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने के इरादे से पकड़ना, जिसमें सामने वाले का तो मालूम नहीं पर आपके हाथ का जलना तय है।”
दोस्तों, आइए अब हम ग़ुस्से पर विजय प्राप्त करने के 4 साधारण, लेकिन अत्यंत प्रभावकारी सूत्र सीख लेते हैं-
पहला सूत्र - गहरी साँस लें, तुरंत प्रतिक्रिया न दें
जब भी किसी बात पर ग़ुस्सा आए, तब तुरंत प्रतिक्रिया देने के स्थान पर रुक जाएँ और चुप रहें। कुछ क्षणों का यह मौन आपकी ऊर्जा बचा सकता है।
दूसरा सूत्र -दूसरे को “खाली नाव” समझें
जिस तरह थिक न्यात ने खाली नाव टकराने पर एहसास किया था कि ग़ुस्सा उसके ख़ुद के अंदर मौजूद है, ठीक उसी तरह जब भी आपको गुस्सा आए तब ख़ुद को याद दिलायें कि गुस्से का कारण सामने वाला नहीं, बल्कि उसकी परिस्थिति है। याने आपसी टकराहट की वजह सामने वाले व्यक्ति का टकराना नहीं बल्कि उसकी परिस्थिति का टकराना है। वह सिर्फ़ माध्यम है, कारण नहीं।
तीसरा सूत्र - ध्यान और आत्म-जागरूकता बढ़ाएँ
प्रतिदिन कुछ मिनट शांत बैठें और ख़ुद के अंदर झाँके, लिए गए निर्णयों को परखें। याद रखिए दुनिया को समझने से पहले, खुद को समझना सीखना होगा क्योंकि यहीं से आत्म-शक्ति याने सेल्फ कॉन्फिडेंस की शुरुआत होती है।
चौथा सूत्र - क्षमा करें
क्षमा करना मेरी नजर में खुद को अतीत के बोझ से मुक्त करना है। इसलिए मैं क्षमा करने को दूसरों से ज़्यादा ख़ुद के लिए आवश्यक मानता हूँ।
दोस्तों, अंत में इतना ही कहूँगा कि इस दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण आप और आपकी शांति है। इसलिए कभी भी कोई आपको चोट पहुँचाए, तो ख़ुद से पूछियेगा, “क्या यह व्यक्ति वास्तव में मेरे भीतर की शांति को छीन सकता है?” जब आपको अंतरात्मा का उत्तर ना में मिलेगा तब आप अपने आप ही समझ पायेंगे कि “मेरा ग़ुस्सा मेरी ज़िम्मेदारी है।” याद रखियेगा दोस्तों, हमारी शांति किसी बाहरी लहर पर नहीं, हमारे भीतर के सागर पर निर्भर करती है।” और यही है — ग़ुस्से का असली इलाज।
-निर्मल भटनागर
एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर




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