• Nirmal Bhatnagar

ग़ुस्सा थूकें और शांति के साथ जिएँ !!!

Sep 14, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, कई बार छोटी सी बात से शुरू हुई बात इतना गम्भीर रूप ले लेती है कि आपसी रिश्ता या व्यवहार ही संकट में पड़ जाता है। सामान्य तौर पर हमारा ग़ुस्सा या क्रोध साधारण सी बात को इतना गम्भीर बना देता है। मेरा मानना है, बिना ग़ुस्से या क्रोध पर क़ाबू पाए हम अपने जीवन को शांत, खुश और मस्त रहकर जी ही नहीं सकते हैं। अपनी बात को मैं एक महान राजा के जीवन में घटी एक घटना से समझाने का प्रयास करता हूँ।


दुनिया जीतने, उस पर राज करने की अपनी इच्छा पूर्ति के लिए राजा ने अपने रण कौशल के बल पर अपने राज्य का विस्तार दूर दूर तक फैला लिया था। लेकिन इस विस्तार के दौरान लड़ते-लड़ते उनकी सेना काफ़ी थक गई थी और वह बार-बार अपने परिवार से मिलने और अपने देश लौटने के लिए आवाज़ उठाने लगी। राजा ने अपने सैनिकों की इच्छा का सम्मान करते हुए वापस लौटने का निर्णय लिया। राजा महान और समृद्ध संस्कृति का बहुत सम्मान करता था और उससे काफ़ी प्रभावित भी रहता था इसलिए उसने वापस जाते वक्त किसी ज्ञानी व्यक्ति को अपने साथ ले जाने का निर्णय लिया।


इस विषय में जब उसने स्थानीय लोगों से चर्चा करी तो सभी ने उसे उस नगर के समीप ही रहने वाले एक संत के बारे में बताया। वह तुरंत अपने दल-बल के साथ लोगों द्वारा बताए गए संत के स्थान पर पहुँच गया। उसने देखा वहीं पेड़ के नीचे एक बाबा ध्यान लगाए बैठे हुए हैं। राजा ने बाबा के ध्यान को भंग करने के स्थान पर इंतज़ार करने का निर्णय लिया और उस पेड़ के समीप ही एक शिला पर बैठ गया।


लगभग एक घंटे बाद बाबा ध्यान से बाहर आए तो राजा के सभी सैनिक राजा की जयकर के नारे लगाने लगे। दूसरी ओर बाबा सैनिकों को नारा लगाते देख मुस्कुराते रहे। इसी बीच राजा बाबा के समीप पहुँच गए और अपना परिचय देते हुए बोले, ‘मैं आपको अपने देश ले जाना चाहता हूँ। चलिए मेरे साथ चलने के लिए तैयार हो जाइए।’ राजा की बात सुन बाबा जोर से हंसे और बोले, ‘मैं तो यहीं ठीक हूँ क्यूँकि मुझे जो चाहिए वह यहीं आसानी से उपलब्ध है। तुम जहाँ जाना चाहते हो जाओ।’


साधारण संत से अपनी अवज्ञा के विषय में सुन राजा के सैनिक भड़क गए और ग़ुस्से से उनके समीप जाने लगे। उनका मानना था कि कोई इतने बड़े राजा को मना कैसे कर सकता है?’ राजा ने तुरंत इशारे से अपने सैनिकों को रोका और संत की ओर देखते हुए गम्भीर स्वर में बोला, ‘बाबा मैं ‘ना’ सुनने का आदि नहीं हूँ, आपको मेरे साथ चलना ही होगा।’


राजा के धमकी भरे स्वर से भी संत को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा और वे मुस्कुराते हुए बोले, ‘यह मेरा जीवन है, इसलिए मैं ही फ़ैसला लूँगा कि मुझे कहाँ जाना है और कहाँ नहीं।’ संत का जवाब सुनते ही राजा का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया और वो म्यान में से तलवार निकाल संत की गर्दन पर रखते हुआ बोला, ‘अब क्या विचार है? चलोगे या मैं तुम्हारा सर धड़ से अलग कर दूँ।’


बाबा अभी भी उतने ही शांत थे और उनके चेहरे पर वैसी ही मुस्कुराहट बरकरार थी। वे अपने मस्त अन्दाज़ में, पूरी निर्भिकता के साथ बोले, ‘मैं तो कहीं नहीं जा रहा, अगर तुम चाहो तो मुझे मार सकते हो। बस एक काम करना आज से अपने आपको महान राजा कहलवाना बंद कर देना क्यूँकि तुम तो मेरे ग़ुलाम के ग़ुलाम हो।’ दुबले-पतले निर्बल से सन्यासी से अपने विरुद्ध ग़ुलामी का शब्द सुन राजा और ज़्यादा क्रोधित हो उठे और लगभग चिल्लाते हुए बोले, ‘तुम्हारा मतलब क्या है? मैं किसी का ग़ुलाम नहीं हूँ।’


बाबा उसी तरह शांति के साथ मुस्कुराते हुए बोले, ‘क्रोध मेरा ग़ुलाम है और तुम्हारा मालिक है। इसलिए तुम मेरे ग़ुलाम के ग़ुलाम हुए। तुमने बहुत से योद्धाओं को तो जीता, पर अपने क्रोध को नहीं जीत पाए। क्रोध जब चाहता है तुम्हारे सिर पर सवार हो जाता है और तुमसे वह करवाता है, जो करवाना चाहता है। अब तुम ही बताओ तुम ग़ुलाम के ग़ुलाम हुए या नहीं?’ संत की बात सुन राजा स्तब्ध था। वह उनके सामने नतमस्तक हुआ और अपने सैनिकों के साथ उसी वक्त वहाँ से लौट गया।


दोस्तों, ग़ुस्सा एक नकारात्मक भाव है। जितनी बार यह हमारे सर पर क़ाबिज़ होता है, हमारे सुख, हमारी शांति, हमारी मस्ती को खत्म कर देता है। जिस तरह एसिड जिस बर्तन में रहता है उसे ही नुक़सान पहुँचाता है ठीक इसी तरह ग़ुस्सा अगर हमारे कंट्रोल में ना रहे तो हमें ही नुक़सान पहुँचाता है अर्थात् ग़ुस्से का सबसे पहला और सबसे मुख्य शिकार ग़ुस्सा करने वाला ही होता है। आइए आज से शांत, खुश, सुखी और मस्त रहने के लिए उपरोक्त कहानी से सीख लेते हुए अपने ग़ुस्से पर क़ाबू करने का प्रयास करते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com


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