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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

चंचल मन को स्थिर बनाएँ और सफलता पाएँ…

Feb 13, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

धन्यवाद दोस्तों, ‘सकारात्मक दबाव से बढ़ाएँ अपनी उत्पादकता…’ पर ढेरों प्रतिक्रिया देने के लिए। उन्हीं प्रतिक्रियाओं में एक पाठक ने मुझसे प्रश्न किया था, ‘पढ़ाई और व्यवसायिक कार्य के संदर्भ में तो सकारात्मक दबाव समझ आता है, पर क्या, किसी कार्य को ज़बरदस्ती करने से वाक़ई हमारी उत्पादकता बढ़ जाती है?’ क्या यह सूत्र सामान्य इंसान के जीवन को बेहतर बनाने में कारगर है?’ प्रश्न सुनने में बड़ा साधारण सा लग रहा था लेकिन अपने अंदर ढेरों और प्रश्न छिपाए हुआ था।


असल में दोस्तों, सकारात्मक दबाव से हम बच्चों में तो तत्काल परिवर्तन ले आते हैं लेकिन बात जब खुद पर आती है तो सबसे पहली चीज़ जो महत्वपूर्ण हो जाती है, वह है, ‘क्या आप यह परिवर्तन लाने के लिए तैयार हैं या नहीं? कहीं आप अनिच्छा के साथ खुद पर दबाव तो नहीं बना रहे?’ उदाहरण के लिए, स्वयं को फ़िट रखने के लिए घूमने जाने का निर्णय आपने पूरी सजगता के साथ लिया और इसपर अमल करना प्रारम्भ कर दिया। अब अगर किसी दिन, किसी भी कारण से आपको अपना नियम टूटता हुआ सा लगता है तो आप सकारात्मक दबाव से अपने मुख्य लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। असल में साथियों एक लाइन में कहा जाए तो सकारात्मक दबाव अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहने के लिए चंचल मन को क़ाबू में रखने में मदद करता है। चलिए, अपनी बात को मैं सोशल मीडिया पर पढ़ी एक कहानी से समझाने का प्रयास करता हूँ-


बात कई साल पुरानी है गुरुकुल में आए एक नए शिष्य ने संध्या उपासना की परम्परा पर सवाल उठाते हुए अपने गुरु से कहा, ‘गुरुजी, आपके आदेशानुसार में प्रतिदिन संध्या उपासना के दौरान ध्यान लगाने का प्रयास करता हूँ, लेकिन असफल रहता हूँ क्योंकि उसमें मेरा मन बिलकुल भी नहीं लगता है। संध्या वंदन के समय ध्यान लगाने की क्या आवश्यकता है? पूजन-वंदन तो हम बिना ध्यान लगाए भी कर सकते हैं?’


प्रश्न सुन गुरुदेव पहले तो मुस्कुराए फिर बोले, ‘वत्स, पूजन वंदन तो निश्चित तौर पर बिना ध्यान लगाए किया जा सकता है। लेकिन उसके बिना मन को साधना सम्भव नहीं है और चंचल मन को साधे बिना किसी भी कार्य को पूर्ण सिद्धि या अपना सर्वश्रेष्ठ देते हुए करना सम्भव नहीं है। इसीलिए मैंने पूर्व में कहा था कि मन की चंचलता पर क़ाबू पाना ज़रूरी है।’


असल में दोस्तों, जिस तरह घर या ठिकाना ना होने पर इंसान इधर-उधर भटकता रहता है। ठीक उसी तरह जब तक हमारे चंचल मन को कोई स्थाई ठिकाना ना मिल जाए वह भटकता रहता है। जिस तरह इंसान को अपने घर पहुँच कर अनंत संतुष्टि और आनंद की अनुभूति होती है, ठीक उसी तरह जब हम ध्यान के द्वारा अपने चंचल मन को अपने अंदर स्थित प्रभु के अंश के साथ स्थिर बना लेते हैं तो वह असीम और अनंत आनंद की अनुभूति कर पाता है और यही वह स्थिति होती है जब आप स्थिर मन के साथ अपने लक्ष्य को साध उसमें सफल हो पाते हैं।


सीधे सरल शब्दों में कहा जाए तो जिस तरह एक छोटे बच्चे के लाख ना करने के बाद भी आप उसे खाने की चीज़ें चटाकर उसके मन में स्वाद पैदा करते हैं, जो अक्सर उसका मनपसंद स्वाद बन जाता है, ठीक उसी तरह जब आप सकारात्मक दबाव के साथ अपने चंचल मन को स्थिरता का अनुभव कराते हैं तो वह उसका पसंदीदा स्थान बन जाता है और आप एकाग्रता के साथ लक्ष्य साध पाते हैं।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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