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  • Nirmal Bhatnagar

चाहतें हैं सफलता तो रहें हर पल सीखने के लिए तैयार…

Dec 07, 2022

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, आज एक प्रश्न के साथ अपने कॉलम की शुरुआत करना चाहूँगा, ‘क्या आप रोज़ कोई नई कला या कौशल सीखने का प्रयास कर रहे हैं?’ अगर आपका जवाब ना है, तो मैं कहूँगा आप अपने कैरियर या जीवन को बेवजह रिस्क में डाल रहे हैं। अगर मेरी बात से सहमत ना हों, तो आप जिसे भी सफल मानते हैं, उनके जीवन को पलटकर देख लीजिएगा। सफल लोगों की तो पहचान ही यही है कि वे हमेशा नई चीजों को सीखने के लिए खुद को तैयार रखते हैं। तभी तो वे जमाने के साथ चल पाते हैं या फिर समय से पूर्व मौक़ों को पहचान कर आगे निकल जाते हैं।


उपरोक्त बात मुझे अपने पुराने दोस्तों से मिलते समय याद आई जो कुछ समय पूर्व आई॰टी॰ की बड़ी नामी कम्पनियों के साथ काम कर रहे थे। लेकिन आज एक बार फिर उथल-पुथल का शिकार हो, नए कार्य तलाश रहे हैं। अपनी बात को मैं एक सच्ची घटना से समझाने का प्रयास करता हूँ। अपने पुराने परिचित मिस्टर एक्स के साथ हाल ही में हुई मुलाक़ात में जब मैंने उनसे सामान्य तौर पर पूछा कि ‘क्या हाल है?’ तो वे एकदम से बोले, ‘हाल, बेहाल है भाई। नई नौकरी की तलाश में हूँ।’ उनका जवाब मेरी लिए चौकानें वाला था क्यूँकि दीपावली के समय हुई मुलाक़ात के दौरान ही उन्होंने बताया था कि वे एक अंतराष्ट्रीय कम्पनी में बड़े पद पर कार्यरत हैं। इस विषय में हुई विस्तार से चर्चा के दौरान वे कम्पनी की पॉलिसी, उसके प्रबंधन और साथी कर्मचारियों को दोष देते नज़र आए। उनका मानना था कि अभी रिसेशन या मंदी जैसी कोई स्थिति नहीं है, कम्पनियाँ तो बस अपना मुनाफ़ा बढ़ाने के कारण लोगों को निकाल रही है।


मैं उनकी बात से बिल्कुल भी सहमत नहीं था क्यूँकि मेरी नज़र में यह बिलकुल सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। हमारा शरीर भी तो प्रतिदिन कई लाख मरे हुए सेलों को त्याग कर, नए सेल बनाता है। जिससे हमारी शारीरिक ऊर्जा बरकरार रहती है, हम स्वस्थ रहते हैं। ठीक उसी तरह कम्पनी अपनी ऊर्जा, अपनी गति, अपने मुनाफ़े, अपनी साख को बनाए रखने या फिर कुछ नया करने या नए क्षेत्र में हाथ आज़माने की अपनी योजना को मूर्त रूप देने के लिए अपने ‘मरे हुए सेलों’ अर्थात् ‘अनफ़िट’ कर्मचारियों को निकाल कर, अपनी नई टीम तैयार करती है।


हो सकता है साथियों, आपमें से कुछ को मेरी बात चुभ रही हो या आप उससे सहमत ना हों। लेकिन याद रखिएगा हमें बचपन से ही चार्ल्स डार्विन का सिद्धांत पढ़ाते वक्त, हरबर्ट स्पेंसर द्वारा बनाया वाक्यांश घोट-घोट कर पिलाया जाता है, ‘इस दुनिया में विकास ‘स्वस्थतम की उत्तरजीविता’ अर्थात् ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ के आधार पर हुआ है।’ हालाँकि यह सिद्धांत जीव विज्ञान का है, पर अगर आप गहराई से इस विषय पर सोचेंगे तो पाएँगे कि यह हर क्षेत्र के लिए जीव विज्ञान जितना ही सही है।


दोस्तों, निश्चित तौर पर आप भी आई॰टी॰ क्षेत्र में कार्यरत ऐसे कई लोगों को जानते होंगे जिन्होंने हाल ही में रिसेशन के कारण अपनी नौकरी खोई है। इन्हीं में से कई लोगों को अपनी ओर से पूरा प्रयास करने के बाद भी नई नौकरी नहीं मिल पा रही है। ठीक इसी तरह आपको कई ऐसे लोग भी मिल जाएँगे जिन्होंने अपनी किसी अन्य प्राथमिकता की वजह से पहले आई॰टी॰ क्षेत्र छोड़ा था और बाद में अपने कैरियर को फिर से गति देने के लिए आई॰टी॰ में वापस जाने के स्थान पर किसी अन्य क्षेत्र में काम करने को चुना।


दोस्तों, मेरा तो मानना है कि उपरोक्त दोनों ही तरह के लोगों की परेशानी की मुख्य वजह कम्पनियों की नीति या कोई अन्य कारण नहीं बल्कि तेज़ी से बदलती तकनीकी की दुनिया में सीखने की अपनी गति को बरकरार ना रख पाना है। आप खुद सोच कर देखिएगा, ‘क्या कोई भी कम्पनी अपने योग्य, मुनाफ़ा देने वाले कर्मचारी को खोना चाहेगी?’ बिलकुल भी नहीं! याद रखिएगा, कोई भी कम्पनी बिना योग्य श्रम शक्ति अर्थात् मैन पॉवर के सफल नहीं हो सकती है। ठीक इसी तरह सफलता भी उसी इंसान को मिलती है, जो हर पल कुछ नया सीखता है। शायद इसीलिए तो कहा गया है, ‘ठहरा हुआ पानी और रुका हुआ इंसान, दोनों सड़ जाते हैं।’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com


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