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चाह सम्मान की…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Sep 3, 2024
  • 3 min read

Sep 3, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, लोगों में सम्मान की चाह होना बड़ा स्वाभाविक है। इसलिए मुझे तो बाज़ार में एक नया व्यवसायी वर्ग उभरता नज़र आ रहा है जो सम्मान बेचता है। जी हाँ दोस्तों, सुनने में अजीब सी लगने वाली यह बात है सौ प्रतिशत सही है क्योंकि सम्मान की चाह भी इंसान की ५ बुनियादी आवश्यकताओं में से एक है जिसे अब्राहम मास्लो ने मनुष्य की सबसे लोकप्रिय ज़रूरतों के पदानुक्रम के सिद्धांत से समझाने का प्रयास किया है। मास्लो का यह सिद्धांत किसी भी व्यक्ति की ज़रूरतों को दो श्रेणियों में बाँटकर प्रतिपादित किया गया है। इसमें पहली ज़रूरत कमियों पर आधारित है। इसमें शरीर और सुरक्षा से संबंधित ज़रूरतें आती हैं और दूसरी ज़रूरत विकास पर आधारित है, इसमें अपनापन, आत्म-सम्मान और आत्म-साक्षात्कार से संबंधित ज़रूरतें आती हैं।


मास्लो के सिद्धांत में अगर कमी की ज़रूरतें पूरी नहीं होती हैं, तो व्यक्ति कमी महसूस करेगा और इससे उसका विकास बाधित होगा और अगर उसका विकास नहीं होगा तो उसे जीवन में अधूरापन महसूस होगा। मास्लो का सिद्धांत प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता पर ध्यान केंद्रित करता है, न कि उसके जीवन में क्या गलत हुआ है। संक्षेप में कहा जाये तो मास्लो के अनुसार प्रेरणा किसी भी व्यक्ति की पाँच बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के प्रयास का परिणाम है। यह ज़रूरतें शारीरिक, सुरक्षा, सामाजिक, सम्मान और आत्म-साक्षात्कार पर आधारित हैं और व्यक्ति इन्हें इन्हीं क्रम में पाना चाहता है। उनका मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति में अपने आत्म-साक्षात्कार तक पहुँचने की क्षमता होती है। आत्म-साक्षात्कार में, एक व्यक्ति जीवन के उस अर्थ को खोजता है, जो उसके लिए महत्वपूर्ण है।


आज के युग में पहली दो ज़रूरतें याने शारीरिक और सुरक्षा मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए सामान्य है अर्थात् लगभग हर मध्यमवर्गीय परिवार इन्हें पा चुका है और लगभग तीस से चालीस की उम्र तक आते-आते सामाजिक ज़रूरतों को भी पूरा कर लेता है। चूँकि हर इंसान में अपनी सभी ज़रूरतों को पूरा करने की क्षमता होती है, इसलिए वो अपनी अगली ज़रूरत याने सम्मान को जल्द से जल्द पाने की कोशिश करने लगता है और इसी जल्दबाज़ी की वजह से वो सम्मान को ख़रीद कर पाने का प्रयास करता है।


अब दोस्तों आप समझ ही गए होंगे कि मैंने अपने लेख की शुरुआत में यह क्यों कहा था कि हमारे यहाँ सम्मान ख़रीदने और बेचने का एक नया बाज़ार विकसित हो रहा है। वैसे दोस्तों, मेरी नज़र में ख़रीद कर सम्मान पाना आत्मसंतुष्टि से अधिक कुछ नहीं है क्योंकि यह सामान्य लोगों के बीच में आपकी छवि को कुछ ख़ास प्रभावित नहीं करता है। अगर आपका लक्ष्य जीवन में वास्तविक सम्मान पाना है तो याद रखियेगा सम्मान को कभी भी ख़रीदकर या छीन कर नहीं पाया जा सकता है। इसे तो आपको अच्छे स्वभाव, अच्छे व्यवहार, अच्छे कर्मों के द्वारा अर्जित करना पड़ता है। यक़ीन मानियेगा, इस समाज में आजतक जिसको भी सम्मान की प्राप्ति हुई है, श्रेष्ठ व्यक्तित्व के कारण ही हुई है।


इस आधार पर कहा जाए तो, सम्मान पाने की इच्छा और उसे पाने योग्य कर्म के बीच का अंतर ही इस नये बाज़ार को जन्म दे रहा है। अगर आप अपनी इच्छा को सम्मान पाने योग्य करने वाले कार्यों या ऊपर बताये उपायों से जोड़ दें, तो यक़ीन मानियेगा यह आपको सम्मान पाने का वास्तविक अधिकारी भी बना देगा। इसलिए दोस्तों, सम्मान की चाह को पूरा करने के लिए जीवन में सदैव गतिमान बने रहें और याद रखें कि आपकी सद् निष्ठा आपको सम्मान का पात्र भी बना देगी। अर्थात् कार्य में कुशलता, व्यवहार में मृदुलता और स्वभाव में सौम्यता रखना सीखिए, फिर आपको सम्मान माँगना नहीं पड़ेगा, वह तो आपको स्वतः ही प्राप्त हो जायेगा।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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