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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

जब हम कुछ देते हैं, तभी हमें कुछ मिलता है !!!

Oct 21, 2023

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…

दोस्तों, शब्दों में भी जान होती है। जी हाँ, इसका सीधा सा प्रमाण यह है कि अगर ये आपके साथ होते हैं, तो आपकी ऊर्जा, आपकी क्षमता, आपकी ख़ुशी, आपकी शांति सभी को बढ़ाते हैं और अगर ख़िलाफ़ तो इनमें जीवन में निराशा और नकारात्मकता भरने की शक्ति होती है। अपनी बात को मैं आपको एक कहानी से समझाने का प्रयास करता हूँ-


बात कई साल पुरानी है, मुंबई लोकल ट्रेन में एक भिखारी रोज़ विरार से मुंबई सेंट्रल और वापस मुंबई सेंट्रल से विरार तक भीख माँगा करता था। एक दिन भिखारी को ट्रेन में अमीर सेठ यात्रा करते दिखे। वह तुरंत अच्छी भीख मिलने की आस लिए उनके पास पहुँच गया। सेठ ने भीख देने के स्थान पर भिखारी से एक प्रश्न किया, ‘तुम हमेशा माँगते ही रहते हो या कभी किसी को कुछ देते भी हो?’ सेठ का प्रश्न सुन भिखारी अचंभे में पड़ गया। उसने प्रश्नवाचक निगाहों के साथ सेठ को देखते हुए कहा, ‘साहब, मैं तो ख़ुद माँग कर अपना पेट भरता हूँ, मेरी इतनी औक़ात कहाँ कि किसी को कुछ दे सकूँ?’ भिखारी का जवाब सुन सेठ एकदम सपाट लहजे में बोले, ‘जब तुम किसी को कुछ दे नहीं सकते हो तो तुम्हें माँगने का भी हक़ नहीं है।’


सेठ की बात भिखारी के दिल में उतर गई और उसने हर माँगने वाले को कुछ ना कुछ देने का निर्णय लिया। अगले दिन स्टेशन आते वक़्त उसने अपनी झुग्गी के पास उगे सारे फूलों को तोड़ लिया और उस दिन जिसने भी उसे भीख दी, उसने उन्हें एक फूल दिया। उस दिन उसे अच्छी भीख मिली। अब तो उसने इसे अपना नियम ही बना लिया अर्थात् जब भी कोई उसे भीख देता तो उसके बदले में वह भीख देने वाले को कुछ फूल दे देता। उन फूलों को लोग खुश होकर अपने पास रख लेते थे। कुछ ही दिनों में उसने महसूस किया कि अब उसे बहुत अधिक लोग भीख देने लगे हैं।


एक दिन भीख माँगते वक़्त उसे वही अमीर सेठ ट्रेन में बैठे दिख गए। वह तुरंत उनके पास पहुँचा और बोला, ‘सेठ जी आज मेरे पास आपको भीख के बदले देने के लिए कुछ फूल हैं।’ सेठ उसे देख मुस्कुराए और उसे कुछ पैसे देकर उसके हाथ से फ़ुल लेते हुए बोले, ‘वाह, तो अब तुम मेरी तरह व्यापारी बन गये हो।’ आज फिर सेठ की बात उस भिखारी के दिल में उतर गई क्योंकि सेठ के इन शब्दों ने उसके सम्मान को ख़ुद की नज़रों में कई गुना बढ़ा दिया था। उसकी आँखों में आत्मसम्मान के साथ सुनहरे भविष्य की चमक भी थी। वह आज पहली बार अपने सुखद भविष्य के बारे में सोच रहा था; सफलता के सपने को बुन रहा था। उसे आज एहसास हो गया था कि आज सेठ ने उसे बातों ही बातों में सफलता की चाबी दे दी है, जो उसके जीवन को हमेशा-हमेशा के लिए बदल सकती है।


इतनी देर में अगला स्टेशन आते ही भिखारी ज़ोर से चिल्लाता हुआ ट्रेन से नीचे उतरा और खुले आसमान की ओर देखते हुए ज़ोर से बोला, ‘अब मैं भिखारी नहीं, व्यापारी हूँ... फूलों का व्यापारी... मैं भी अब अमीर और सफल बनने का सूत्र जान गया हूँ। देखना जल्द ही मैं तुम सब जैसा बन जाऊँगा।’ स्टेशन पर सब उसे ऐसा करते देख पागल समझ रहे थे। लेकिन आज उसे किसी की भी परवाह नहीं थी। वह तो बस इसी तरह उछलते-कूदते, चिल्लाते हुए अपने घर चला गया। कहते हैं उस दिन के बाद कभी किसी को वह भिखारी ट्रेन में नज़र नहीं आया।


कई सालों बाद एक दिन उसी लोकल ट्रेन में दो अमीर व्यापारी यात्रा कर रहे थे। पहले व्यापारी से आँख मिलते ही दूसरे व्यापारी ने उन्हें प्रणाम किया और उनके पास जाकर बोला, ‘सेठ जी, पहचाने क्या?’ सेठ के ना में सिर हिलाते ही वह बोला, ‘सेठ जी आज आपसे तीसरी बार मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। पहली बार ख़ाली हाथ भीख माँगते हुए, दूसरी बार फूलों के साथ भीख माँगते हुए और आज इस रूप में।’ इतना कहते हुए भिखारी ने अपनी पूरी कहानी सेठ को कह सुनाई और अंत में बोला, ‘आज मैं आपकी दुआ से इस शहर का सबसे बड़ा फूलों का व्यापारी हूँ और व्यापार के सिलसिले में ही आज यात्रा कर रहा हूँ।’


दोस्तों, अब आगे बताने की ज़रूरत नहीं है कि सेठ ने इस भिखारी को अंत में क्या कहा होगा। पर अगर आप इस पूरी घटना पर नज़र डालेंगे तो पायेंगे कि सेठ द्वारा बोले गए शब्दों ने इस भिखारी के जीवन को हमेशा के लिए पूरा बदल दिया था। दूसरे शब्दों में कहूँ तो भिखारी तब तक ही भिखारी था जब तक उसने ख़ुद को भिखारी समझा था, लेकिन जैसे ही सेठ के शब्दों को सुन उसने ख़ुद को व्यापारी माना, वह व्यापारी बन गया।


वैसे भी दोस्तों, अच्छे शब्द दूसरों को देने का एक और फ़ायदा है, यह लौट कर आपके पास ही आते हैं क्योंकि प्रकृति का नियम तो यही है, ‘जब हम कुछ देते हैं, तभी हमें कुछ मिलता है!!!’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

nirmalbhatnagar@dreamsachievers.com

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