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  • Writer's pictureNirmal Bhatnagar

जहाँ चाह, वहाँ राह…

Feb 22, 2024

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, अगर ठान लिया जाए तो इस दुनिया में वाक़ई में कुछ भी असंभव नहीं है। इसीलिए तो कबीरदास जी ने कहा है, ‘जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ ! मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ!!’ चलिए कबीर जी के इस कथन और अपनी बात को मैं आपको एक कहानी के माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ।


गाँव के बाहरी हिस्से में एक वृद्ध साधु रहा करते थे, जो प्रतिदिन अपने नियमानुसार संध्या के समय गाँव के दूसरे छोर पर स्थित कृष्ण मंदिर में जाकर दीपक जला कर, पूजा-अर्चना किया करते थे। उसी गाँव में एक नास्तिक भी रहा करता था। उसने भी अपना एक नियम बना रखा था, ‘दीपक बुझाने का।’ अर्थात् जैसे ही साधु महाराज कृष्ण जी के सामने दीपक जलाकर मंदिर से लौटते, वैसे ही वह नास्तिक मंदिर में जाकर दीपक बुझा दिया करता था। साधु ने उस नास्तिक को कई बार समझाने का प्रयास किया कि ‘तुम ऐसा मत किया करो। अन्यथा किसी दिन कुछ अनिष्ट हो जाएगा।’ पर वह हमेशा इसके उत्तर में कहा करता था, ‘देखो अगर भगवान हैं तो वह स्वयं आकर ही मुझे दीपक बुझाने से क्यों नहीं रोक देते?’ उस नास्तिक के इस प्रश्न का साधु के पास कोई जवाब नहीं था। इसलिए वे ‘बड़ा ही नास्तिक है तू…’ कहते हुए वहाँ से चला ज़ाया करते थे।


यह क्रम कई वर्षों से चल रहा था। एक दिन अचानक ही शाम के समय गाँव का मौसम बहुत ख़राब हो गया और वहाँ तेज आंधी के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। साधु ने ३-४ घंटों तक मौसम साफ़ होने का इंतज़ार किया, लेकिन आँधी और बारिश कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी। कई घंटों तक इंतज़ार करने के बाद साधु ने सोचा, ‘इतने तूफ़ान में अगर मैं भीगता हुआ मंदिर चला भी गया और दीपक जला भी दिया तो रोज़ की ही तरह वह शैतान नास्तिक आकर उसे बुझा देगा। इससे तो बेहतर है मैं आज मंदिर ही नहीं जाता हूँ। कल प्रभु से क्षमा माँग लूँगा। वैसे भी भगवान कौन सा दर्शन देने वाले हैं? इतने दिन हो गये प्रार्थना करते-करते, आज तक तो प्रभु ने दर्शन नहीं दिए।’


विचार मन में आते ही साधु ने मंदिर नहीं जाने का निर्णय लिया और घर में ही रज़ाई में दुबक कर बैठ गया। वहीं दूसरी और उस नास्तिक को पूरा विश्वास था कि कुछ भी हो जाए साधु मंदिर ज़रूर आएगा और दीपक जलाएगा। इसलिए बारिश और मौसम ख़राब होने के बाद भी वह अपने तय समय पर मंदिर पहुँच गया और साधु के आने का इंतज़ार करने लगा। लेकिन जब कई घंटों तक साधु महाराज पूजा करने और दीपक जलाने नहीं आए तो वह परेशान होकर क्रोधित हो गया और साधु को अनाप-शनाप कहने लगा। अंत में उसने क्रोध में ही निर्णय लिया कि मैं तो आज भी रोज़ की तरह दीपक बुझाकर ही दम लूँगा। फिर भले ही पहले मुझे ख़ुद ही दीपक को जलाकर फिर बुझाना पड़े। विचार आते ही पहले उस नास्तिक ने दीपक को तैयार किया, फिर उसे जला दिया। अभी वह फूँक मारकर दिया बुझाने ही वाला था कि तभी एकदम से भगवान प्रगट हो गए और बोले, ‘उस साधु से अधिक अपने कार्य और सोच पर विश्वास व श्रद्धा तुम्हारे अंदर है। इसीलिए तुम इतने ख़राब मौसम में भीगते हुए यहाँ आ गए। मुझे तो यहाँ आना ही था लेकिन तुम्हारे विश्वास ने मुझे दर्शन देने के लिए मजबूर के लिए मजबूर कर दिया।’


दोस्तों, जो भी पूरे विश्वास से आया, उसने पाया। दूसरे शब्दों में कहूँ तो जिसने भी विश्वास के साथ कर्म किया है, उसे फल मिला है। इसलिए दोस्तों, डर कर किनारे पर बैठने के स्थान पर, गहरे पानी में गोता लगाना बेहतर है क्योंकि गोताखोर कभी ख़ाली हाथ बाहर नहीं आता। इसीलिए मैंने शुरुआत में कहा था, ‘अगर ठान लिया जाए तो इस दुनिया में वाक़ई कुछ भी असंभव नहीं है।’


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर



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