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जिएँ ज़िन्दगी जश्न के माफ़िक़…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Sep 19, 2025
  • 3 min read

Sep 19, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है…


दोस्तों, आज के युग में ख़ुद को दौड़ में बनाए रखने के लिए हममें से ज़्यादातर लोग अक्सर शिकायतों और समस्याओं में उलझे रहते हैं। इसी वजह से हमारा मन और ज्यादातर समय ऑफिस के तनाव, घर की जिम्मेदारियों, भीड़ भरे ट्रैफिक या रिश्तों की खटपट में उलझा रहता है। इसका सीधा प्रभाव हमारी सोच पर कुछ इस तरह पड़ता है कि हम ईश्वर से मिली अनगिनत सौगातों याने जीवन में मिले असली आशीर्वादों को देख ही नहीं पाते हैं।


मेरी नजर में इसकी मुख्य वजह हमारा नकारात्मकता से भरा मानसिक पैटर्न है। मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इंसान का दिमाग नकारात्मक घटनाओं को सकारात्मक अनुभवों से ज़्यादा गहराई से याद रखता है। यही कारण है कि छोटी-सी आलोचना हमें लंबे समय तक चुभती रहती है, जबकि हम बड़े-बड़े सकारात्मक अनुभव और सराहनाओं या अनुभव को जल्दी भुला देते हैं। यही प्रवृत्ति हमें शिकायत करने को मजबूर करती है और धीमे-धीमे जीवन के आनंद को नकारात्मक अनुभवों से ढक देती है। अंत में जब हमारा ध्यान केवल समस्याओं पर टिक जाता है, तब जीवन के खूबसूरत उपहार हमें नज़र आना बंद हो जाते हैं।


दोस्तों, ईश्वरीय उपहारों को स्वीकार कर अगर आप आनंद से भरपूर जीवन जीना चाहते हैं तो आपको जीवन में संतुलन बनाना सीखना और स्वीकारना होगा कि संसार में सुंदरता और चुनौतियाँ, अच्छाई और बुराई हमेशा साथ-साथ मौजूद रहती है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे सूरज की रोशनी के साथ धूप की तपिश भी आती है, बारिश की ताजगी के साथ कीचड़ भी बनता है। दोस्तों, खुशियों को स्वीकार करना आसान है, पर उनकी कद्र करना कठिन। इसलिए आशीर्वादों को गिनना और उनका सम्मान करना एक सीखी जाने वाली कला है।


जैसा मैंने पूर्व में बताया था कि मानव मन दुखदायी अनुभवों को पकड़कर रखने में माहिर है। यही कारण है कि हमें दुखद घटना कई महीनों तक परेशान करती रहती है। लेकिन जब हम नकारात्मकता पर ज़रूरत से ज़्यादा फोकस करते हैं, तो जीवन के सबसे बड़े उपहार, हर हाल में जीने को या सिर्फ जीने की खुशी को ही भुला बैठते हैं। असल में हमारी जीवन गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपना ध्यान किस दिशा में लगाते हैं।


दोस्तों, अगर आप जीवन को आनंददायक बनाने के लिए व्यावहारिक समाधान चाहते हैं और खुशियों को पहचानने और मनाने की कला को वापस पाना चाहते हैं तो निम्न छोटे अभ्यासों को अपने जीवन का हिस्सा बना लें:

1) प्रकृति की सुंदरता पर ध्यान दें: सुबह की ठंडी हवा, फूलों की खुशबू, पक्षियों की चहचहाहट—ये सब हमें कृतज्ञ बनाते हैं।

2) दैनिक आशीर्वादों की सूची लिखें: दिन में 5 मिनट निकालकर लिखें कि आपको आज किन-किन चीज़ों ने खुशी दी। यह आदत धीरे-धीरे आपकी सोच बदल देगी।

3) आनंद को प्राथमिकता दें: हर रोज़ कुछ ऐसा करें जो आपको भीतर से संतुष्टि दे. फिर चाहे वो संगीत सुनना हो या बच्चों के साथ खेलना हो या फिर बस कुछ पल शांति से बैठना।


दोस्तों, इंसान के रूप में जन्म मिलना ही ईश्वर का दिया सबसे बड़ा उपहार या आशीर्वाद है, इसलिए कृतज्ञ रहें और हमेशा याद रखें कि हमेशा कृतज्ञता का भाव रखना केवल धार्मिक या आध्यात्मिक अभ्यास नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य की ज़रूरत है। इसी तरह हमें यह समझना होगा कि सकारात्मक दृष्टिकोण कोई प्राकृतिक प्रवृत्ति नहीं है, बल्कि यह एक सचेत विकल्प है। इसलिए चुनौतियों और शिकायतों के बीच भी खुशियों को पहचानें और उनका उत्सव मनाएँ। ऐसा करना आपकी ज़िंदगी को जीने लायक़ नहीं, जश्न मनाने लायक़ बना देगा।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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