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जीवन एक अनुपम उपहार है…

  • Writer: Nirmal Bhatnagar
    Nirmal Bhatnagar
  • Jun 1, 2025
  • 3 min read

June 1, 2025

फिर भी ज़िंदगी हसीन है...

आइए दोस्तों, आज के लेख की शुरुआत एक कहानी से करते हैं। बात कई साल पुरानी है, राजपुर के राजा राजवेंद्र जंगल में शिकार के लिए गए। संयोग से उस दिन काफ़ी कोशिश करने के बाद भी उन्हें शिकार करने में सफलता नहीं मिली। इस सब में वे काफ़ी थक गए और उन्हें प्यास लगने लगी। पास में ही लकड़ी काट रहे लकड़हारे ने राजा की समस्या को समझा और राजा को पीने का पानी उपलब्ध करवाया।


लकड़हारे से मदद पा राजा एकदम प्रसन्न हो गए और उसी प्रसन्नता के साथ लकड़हारे से बोले, “कभी राजधानी आओ, वहाँ मैं तुम्हें पुरस्कृत करूँगा।” लकड़हारे ने हाँ में सर हिलाया और राजा से विदा लेकर अपने काम में लग गया। कई वर्षों बाद राजधानी की यात्रा के दौरान लकड़हारे को राजा की बात याद आई और वह तुरंत राजा के पास पहुँच गया। लकड़हारा कुछ कहता उससे पहले ही राजा ने उसे पहचान लिया और उसका स्वागत-सत्कार करने लगा। अंत में जब लकड़हारा राजा से विदा लेकर जाने लगा तब राजा ने उसे अपने वादे अनुसार उपहार में एक चंदन का बाग दिया। अब लकड़हारा तो लकड़हारा ठहरा, अपनी पुरानी आदत के अनुसार, अगले दिन से उसने चंदन की लकड़ी को काट-काटकर कोयला बनाना और फिर बेचना शुरू कर दिया। कुछ ही वर्षों में धीरे-धीरे करके पूरा चंदन का बाग नष्ट हो गया।


एक दिन अचानक ही राजा के मन में विचार आया कि क्यों ना लकड़हारे से मिला जाये और चंदन के बाग का हाल देखा जाये। विचार आते ही राजा चंदन के बाग पहुँचे और यह देख चकित रह गये कि लकड़हारा इतने कीमती चंदन को सिर्फ कोयले के लिए जला रहा है। राजा ने लकड़हारे को रोका और उसे चंदन की लकड़ी का एक छोटा सा टुकड़ा देकर बाजार में बेचने के लिए भेजा। लकड़हारे को उस लकड़ी की क़ीमत, कोयले के मुकाबले कई गुना अधिक मिलती है। यह देख वह पछताता है, रोता है और अपनी भूल पर दुखी होता है और अंत में राजा के सामने एक और चंदन के वन के लिए गिड़गिड़ाने लगता है।


दोस्तों, यह सिर्फ़ एक कहानी नहीं है, बल्कि हमारे जीवन का सच्चा चित्रण है। हमारा शरीर “चंदन का बाग” है, और हमारी स्वाँस चंदन के पेड़ों के समान अनमोल है। लेकिन दुर्भाग्य से, हम इन साँसों को क्रोध, ईर्ष्या, लालच, द्वेष, झगड़े, तनाव और नकारात्मक सोच की अग्नि में जलाते रहते हैं और कभी भी जीवन की और अपनी स्वाँस की सही क़ीमत नहीं पहचान पाते हैं।


सोच कर देखियेगा दोस्तों, हममें से ज्यादातर लोग यकीनन अपने जीवन रूपी अमूल्य ऊर्जा को उन बातों में बर्बाद कर रहे हैं, जिनका कोई स्थायी महत्व नहीं है। लेकिन जब हमारा शरीर चूकने याने जीवन ख़त्म होता और साँसें समाप्त होती लगने लगती है, तब हमें समझ आता है कि हमने क्या और कितना खो दिया है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।


दोस्तों, अगर मेरी उपरोक्त बात से सहमत हों तो खुश हो जाइयेगा क्योंकि “अभी देर नहीं हुई है!” हमारे पास आज शरीर याने चंदन का बाग और स्वाँस याने “चंदन का पेड़” दोनों सलामत हैं। जिसका सीधा-सीधा अर्थ है कि हम आज और अभी अपने जीवन को सँवार सकते हैं और जो साँसें अभी हमारे पास बची हैं, उनसे एक नया, सुंदर और सकारात्मक जीवन बना सकते हैं। इसके लिए बस आपको योग, ध्यान, आत्मचिंतन, प्रेम, भाईचारा, शांति, और सहयोग के मार्ग पर चलना होगा। जब हम दूसरों की मदद करते हैं; लोगों को सच्चे मन से माफ करना सीखते हैं; नफरत की जगह प्रेम के मार्ग को अपनाते हैं, तो हमारा जीवन भी उसी चंदन की तरह महकने लगता है।


याद रखियेगा, जीवन एक अमूल्य उपहार है और उसे हमें नकारात्मकता की आग में जलाकर कोयला नहीं बनाना है। इसलिए जीवन के सौंदर्य को पहचानिए और उसके हर क्षण को मूल्यवान बनाइए और आज ही निर्णय लीजिए कि आप अपने जीवन के "चंदन" को जलाएँगे नहीं, बल्कि उससे दुनिया को महकाएँगे क्योंकि सकारात्मक सोच, प्रेम और आत्मचिंतन से भरा जीवन – यही असली सफलता है।


-निर्मल भटनागर

एजुकेशनल कंसलटेंट एवं मोटिवेशनल स्पीकर

 
 
 

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